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Showing posts with the label आलोक सिंह

प्रकृति

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 बस गया एक और शहर , जंगलो को काट कर  हो गयी सड़कें चौड़ी, पगडंडियों को पाट कर |  उड़ गए पंछी, छोड़ खुद से बनाया  आशियाँ जुड़ गए शहर शहर, दो दिलो को बाँट कर |  एक पल पर पैर रखकर, दूसरा पल दौड़ता  ढूंढ़ता कल के सुकूं को अबके सुकूं को मारकर |  झील नदियां लुप्त होती,प्रकृति अपने रंग खोती,  हो रही बंज़र जमी, सिसकियाँ ले धरती रोती | खेत की किस्मत भी अब, हलों से लिखी जाती नहीं , रसायनिक खादों के उपयोग से, काया निरोगी रह पाती नहीं | कान भी तरसे यहाँ अब, कोकिलों की आवाज को, प्रकृति भी श्रंगार तरसे, संगीत तरसे साज को | काट रहे हम वो ही टहनी, जिस पर हम बैठे हुए, कौन समझाए यहाँ अब ऐसे कालिदास को | कर रहे वो ही प्रदूषित, हो हवा,   ....या  हो पानी , आग सीने में लगाए, जो बने सर्वज्ञ ग्यानी | कौन अब पर्यावरण बचाये, हम भी हैं सहमे हुए , लाएं किधर से अब बताओ, ऐसे प्रकृति के दास को | क्यूँ तपाता सूरज इतना, क्यूँ हवा में है ज़हर  , क्यूँ समंदर उफ़न रहा, क्यूँ धुंधली धुंधली है नज़र ,  पूर्व से पश्चिम में जाओ, या घूमो उत्तर दक्षिण में तुम,   ...

बूढ़ा बरगद

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बस यूँ किसी जानी पहचानी राह पर लिए दिवा ख्वाबों की पोटली चला जा रहा था ...बढ़ा जा रहा था कि अचानक  एक आवाज मेरे कानों के पर्दे से टकरायी  हवा मंद मंद मुस्कुराई  मैंने तुरंत चारो ओर लोचनों को सैर करायी लेकिन द्रष्टि सीमा में कोई भी सूरत  दिमाग के डाटा बैंक से मिल न पायी  लेकिन कानों का सेंसर सुचारू रूप से कार्यरत था  दिमाग कानों के  पास होने के कारण पूर्ण रूप से जाग्रत था  दिल शब्दों के संदेशों को डिकोड कर ही रहा था  कि अचानक फिर से आवाज आयी  अरे बेटा.... मैं हूं वट वृक्ष  वट वृक्ष.... आवाज सुनते ही इतिहास के पन्ने फडड़ाने लगे  आँखों के सामने से कई चलचित्र गुजर जाने लगे वो अम्मा का पूजा करना  कई मन्नतों के धागों  संग फेरे लेना  और बहुत कुछ यादों के धुओं में आकृति बन रही थी  कई दसकों से छाँव उसके क़दमों तले पड़ी थी  मैंने झुकर उसको प्रणाम किया  अरे ये हाल कैसे हुआ सवाल किया  ? आपकी छालों में तो विष्णु  रहते थे  जड़ों में ब्रह्मा तो शाखाओं में शिव दिखते थे  आपको तो अज़र अमर होने ...

उपकार

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जीवन  कई  उपकारों  से ऋणित  जीवन कई हाथों से सृजित  कई बसंत बन गये पतझड़  फिर भी जीवन की बगिया हरित  कभी कर्तव्य तो कभी सीधा उपकार पाया  किसी का साथ तो किसी का ख्यालात पाया  बुलबुले कब फैल गये ताड़ाग में  सुबह को शशांक ,शाम में दिनकर को तनहा पाया  माँ बाप का उपकार तो अनमोल है  गुरु बंधु के आगे तो शब्द मौन हैं  विज्ञान ने भी क्या क्या श्रजन किया  लेकिन बताओ इंसान अब यहां कौन है  सूरज पिघल पिघल कर ऊर्जा लुटाये  मोड़कर कुछ मार्ग चंद रात्रि महकाये  सारी प्रकृति यहां तो उपकार में लगी  लेकिन इंसानियत सारी ऊर्जा  इंसानियत खोने में लगाये  आत्मा जिस्म को जिलाये है रखी  बूंद वारि की तृष्णा मिटाये है रखी  आग खुद को भस्म कर क्या क्या करे  पवन न हो तो दुनिया क्या बने  H2O का यहां लम्बा सफर  गर जमी न हो तो सब कैसे थमें  उपकार ही तो है  कुछ करते भलाई  कुछ की खातिर कुछ यहां करते लड़ाई  लेकिन यहां कुछ लोग ओढें चादर नकली  करें एक उपकार लेकिन बजायें सारा जीवन ढ़प...

“सफलता “

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चार शब्दों में सिमटा सदियों का संघर्ष हूं  मैं तुम्हारी नम आँखों में छुपा हुआ हर्ष हूं  तुम लड़ते हों खुद से तो मैं जीत जाता हूं  मैं अक्सर तुम्हें अपने हाथों से सजाता हूं  ये  ठोकरें,जो तुम्हे  रोकने  की कोशिश तमाम करती हैं  राह के शूल,तुम्हारे हौशले तोड़ने की हजार भूल करती हैं  उन्हें क्या पता,खुद मुसीबतों ने तुम्हे तरासा है  इन बाधाओं को, तुमसे कितनी बड़ी हताशा है  मैं  तुम्हारे अंदर झुपा हुआ जूनून हूं  मैं तुम्हारे अंदर चमकता हुआ नूर हूं  गहरे सागर से जब तुम हिम्मत कर मोती चुन कर लाते हो  मन जिद्दी,  तन जिद्दी कर ,     पर्वत पर चढ़ जाते हों  अंतःमन के द्वंदों पर जब तुम विजय पताका फहराते हो  खुद के कई हिस्सों को   जब तुम पास पास ले आते हो  तब मैं,  मन के अंधियारों का  हाथ पकड़ कर उजियारे तक ले जाता हूं  संघर्षों के कई महाभारत का ,     इतिहास स्वयं बन जाता हूं  तुम एक गीत कर्म का बुनते हो, मैं सदियों तक गुनगुनाता हूं  तुम मरू में भी...