प्रकृति
बस गया एक और शहर , जंगलो को काट कर हो गयी सड़कें चौड़ी, पगडंडियों को पाट कर | उड़ गए पंछी, छोड़ खुद से बनाया आशियाँ जुड़ गए शहर शहर, दो दिलो को बाँट कर | एक पल पर पैर रखकर, दूसरा पल दौड़ता ढूंढ़ता कल के सुकूं को अबके सुकूं को मारकर | झील नदियां लुप्त होती,प्रकृति अपने रंग खोती, हो रही बंज़र जमी, सिसकियाँ ले धरती रोती | खेत की किस्मत भी अब, हलों से लिखी जाती नहीं , रसायनिक खादों के उपयोग से, काया निरोगी रह पाती नहीं | कान भी तरसे यहाँ अब, कोकिलों की आवाज को, प्रकृति भी श्रंगार तरसे, संगीत तरसे साज को | काट रहे हम वो ही टहनी, जिस पर हम बैठे हुए, कौन समझाए यहाँ अब ऐसे कालिदास को | कर रहे वो ही प्रदूषित, हो हवा, ....या हो पानी , आग सीने में लगाए, जो बने सर्वज्ञ ग्यानी | कौन अब पर्यावरण बचाये, हम भी हैं सहमे हुए , लाएं किधर से अब बताओ, ऐसे प्रकृति के दास को | क्यूँ तपाता सूरज इतना, क्यूँ हवा में है ज़हर , क्यूँ समंदर उफ़न रहा, क्यूँ धुंधली धुंधली है नज़र , पूर्व से पश्चिम में जाओ, या घूमो उत्तर दक्षिण में तुम, ...