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Showing posts with the label मुकेश "लखनवी"

तिरंगा बोलेगा

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हर्षित, पुलकित ये तन मन आज तिरंगा बोलेगा  ह्रदय मे बहती तेज धार ये अविरल गंगा बोलेगा  बोलो वन्देमातरम हाँ बोलो वन्देमातरम....... 2 आन रहे सम्मान रहे जब तक शरीर मे जान रहे  शान रहे हाँ शान रहे देश प्रेम अभिमान रहे  देश भक्ति से ओत प्रोत दिल आज ये चंगा बोलेगा  ह्रदय मे बहती तेज धार ये अविरल गंगा बोलेगा  बोलो वन्देमातरम हाँ बोलो वन्देमातरम....... 2 जो आंख उठाए देश की अस्मिता पर आओ उस नापाक का दमन  करें  जिस राह भी जाएं हमारे वीर सैनिक हम उस राह को नमन करें  देश हमेशा आगे ही रहे आज हर एक बंदा बोलेगा  ह्रदय मे बहती तेज धार ये अविरल गंगा बोलेगा  बोलो वन्देमातरम हाँ बोलो वन्देमातरम....... 2 झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा  एक बने हम, नेक बने हम एकता बना रहे हमारा  इस माटी का तिलक करें हम हर एक पुलिंदा बोलेगा  हृदय मे बहती तेज धार ये अविरल गंगा बोलेगा  बोलो वन्देमातरम हाँ बोलो वन्देमातरम.......2 जय हिन्द जय भारत  वन्दे मातरम 🙏🙏🌹🌹 मुकेश लखनवी

आता ही नही

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दिल को बहलाना मुझे आता ही नही  अब उनको भुलाना मुझे आता ही नही कैसे कहें उनसे अपने मन की बात  अब उनको फुसलाना मुझे आता ही नही बात बात पर हो जाते हैं वो खफा  अब उनको रिझाना मुझे आता ही नही कैसे कहें की उनसे कितनी मोहब्बत है हमें  अब उनको समझाना मुझे आता ही नही अब दूर हो जाएंगे हम उनसे "लखनवी" अब उनको इश्क निभाना आता ही नही मुकेश लखनवी

ग़ज़ल

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क़ाफ़िया :- अर  रदीफ़ :- को चला  पहले दोनों मिसरो मे क़ाफ़िया और रदीफ़ एक समान यानी जिसे मतला कहते हैं  बर्बाद ए इश्क लिए आज इक सफर को चला  आज फिर लौटकर मैं अपने घर को चला इक आस थी की वो आएंगे पल दो पल के लिए  यही उम्मीद लिए आज उनके दर को चला मगर न वो आए न उनकी कोई उम्मीद आयी  जब उनसे मिलने मैं आज उनके शहर को चला अब तन्हा हूं मैं अब मेरा यहाँ कोई नही  न जाने क्यूँ मैं इस अनजान सफर को चला मैं बहता ही गया उससे दूर तलक "लखनवी"  जब बेवजह रोकने मैं उस लहर को चला

तीज

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आया तीज त्योहार, खुशियाँ बढ़ी अपार, देखो देखो आज बड़ी शुभ घड़ी आयी है  लेकर हांथों मे थाल, चन्दन सिंदूर डाल, बड़े ही जतन से आज थाल को सजायी हैं  रखकर खुद पर आस, कर पूजा और विश्वास, पति की लम्बी उमर की ज्योति वो जलायी हैं  बड़े ही अरमानो से,  बड़े शुभ कामों से, वो ऐसा जीवनसाथी पायी हैं  रहे बस उनका साथ, डाल हाथों मे हाँथ, यही सोच सोच वो अत्यंत हर्षायी हैं  रहेंगी निहार मुख, मिले जीवन का सुख, साथ रहे हर पल यही अर्जी लगायी हैं रहे वो चाहे जिधर, रहे बस लम्बी उमर,उनकी सुरक्षा की आस दिल मे समायी हैं आओ आओ सुहागिनों आओ,  इस तीज को मनाओ, जिनके मनाने  से ये खुशियाँ अपार आयी हैं मुकेश लखनवी

लखनऊ थप्पड़ कांड पर आधारित

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शहर सुरक्षित नहीं है लखनवी दियो बताय  न जाने किस राह मे लरिका जाय पिटाय  लरिका जाय पिटाय खाय थप्पड़ पर थप्पड़  कह लखनवी कविराय अब काहू से ना लड़  "लखनवी" सीधे जाइये, रख अपने काम से काम  इधर उधर न ताकिये, हो जाओगे बदनाम  हो जाओगे बदनाम, होगा गुत्थिम गुत्था  इधर पड़ेगा थप्पड़, उधर पड़ेगा जूता  इस तरह की बेइज्जती, कोउ देख न पाए  संस्कार माँ बाप के, जो नहीं वो हाँथ उठाए  जो नहीं वो हाँथ उठाए, रह गया उसका सम्मान  इखलाक ही बस, बन गयी उसकी पहचान  चलते चलते रुक गया, लगी न एक भी खरोंच  खिसियानी बिलरिया फिर  रही है खम्भा नोंच  रही है खम्भा नोंच, नियम का पाठ पढ़ाए  खुद पर रख न संयम, नियम सब भूल ही जाए  मुकेश लखनवी

घर का बंटवारा

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भरे पूरे परिवार मे देखो कैसा नजारा हो गया  देखते ही देखते घर का बंटवारा हो गया  जो  कभी अपने थे पल भर मे बेगाने हो गए  जो जान न्योछावर करते थे आज वो अनजाने हो गए  किसकी नजर लगी इनको किसका इशारा हो गया  देखते ही देखते घर का बंटवारा हो गया  खेत खलिहान बंट गए अपने पराये छंट गए  जो रहते थे पास वो पल भर मे हट गए  ये परिवार अहम का मारा हो गया  देखते ही देखते घर का बंटवारा हो गया छा गई धुंध पलकों पर अपने पराये का ज्ञान नहीं  न प्यार बचा छोटो के लिए और बड़ो का सम्मान नहीं  घर का वो बुजुर्ग मुखिया पल भर मे बेचारा हो गया  देखते ही देखते घर का बंटवारा हो गया अब कहाँ आखिर जाएगा वो  अब कहाँ पनाह पाएगा वो  जिस घर पर खून पसीना लगाया  अब कैसे देख मुस्कुराएगा वो  यही सोच हुई आँख नम सबकुछ ख़सारा हो गया  देखते ही देखते घर का बंटवारा हो गया  हे ईश्वर बस विनती है इतनी कभी किसी को ऐसा दिन न दिखाना  कि जो आज अपने हैं पल भर मे बन जाएं बेगाना  फिर कोई बुजुर्ग ये न कहे कि  "भरे पूरे परिवार मे देखो ...

न मंजिल........न पता

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न मंजिल की खबर न राह का पता  बस चलता ही जा रहा अपनी धुन मे सदा  मिल जाएगी मगर ये यकीं है मुझे अगर इस सफर मे तू साथ दे दे जरा मैं राही हूँ बस पल दो पल का  एक ऐसे सफर पर निकल पड़ा  न मंजिल की खबर न राह का पता  बस चलता ही जा रहा अपनी धुन मे सदा मैं चलूँगा तो लोग भी मिलेंगे  और ये कारवां बढ़ता जाएगा  राब्ता राब्ता ही सही मगर  ये सफर यूँ ही चलता जाएगा बस यही सोचकर मैं चलता रहा  न मंजिल की खबर न राह का पता  बस चलता ही जा रहा अपनी धुन मे सदा मुझे भी हर पल का एहसास है  मंजिल शायद कहीं आस पास है  ये जिंदगी का शाम कब ढल जाएगा  और मेरा वक़्त भी एक दिन संवर जाएगा  बस नदी की धार सा बहता रहा  न मंजिल की खबर न राह का पता  बस चलता ही जा रहा अपनी धुन मे सदा लोग मिलेंगे भी लोग बिछड़ेंगे भी  कभी तो फूलों सा निखरेंगे भी  बस एक दिन ये सफर थम जाएगा  बस मंजिल पर नजर जम जाएगा  बस साथ मिलता रहे तुम्हारा सदा  न मंजिल की खबर न राह का पता  बस चलता ही जा रहा अपनी धुन मे सदा मुकेश लखनवी

हकीकत जिंदगी की

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ये दौलत, शोहरत, उल्फत, चाहत  बस चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात है  हो बस सबके दिलों मे मोहब्बत  सबके पहलू मे बिखरे जज़्बात हैं  हंसना, रोना, पाना खोना  ये तो फलसफा है जिंदगी का  हो बस सबके दिलों मे हुकूमत  जब सब साथ हों तो क्या बात है मिलना, बिछड़ना, उतार चढाव  ये तो सिलसिला है जिंदगी का  हो बस सबके दिलों मे इज़्ज़त  ये तो एहतराम की शुरुआत है जहमत, रहमत, दुर्भाग्य, खुशकिस्मत  ये तो तजुर्बा है जिंदगी का  समझो बस अपने कर्म को इबादत  अभी तो दुवाओं की बरसात है  मुकेश लखनवी

नाजुक है तेरा पाँव

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गोरी हौले हौले चल नाजुक है तेरा पाँव  छाले न पड़ जाएं अब दूर नहीं है गांव  चल सुस्ता ले थोड़ा उस पीपल के छाँव  गोरी हौले हौले चल नाजुक है तेरा पाँव  मैं जानो हूँ तेरे हिय की बात  तू सोच रही कहीं बीत न जाए रात  वहाँ बच्चे है हमारे जिनसे बहुत है लगाव  गोरी हौले हौले चल नाजुक है तेरा पाँव क्यूँ हो तुम घबराती जब मैं साथ हूँ तेरे  संग संग चलेंगे हम जब लिए हैं सात फेरे  मुझको सब सच बता दे छुपा न कोई घाव  गोरी धीरे धीरे चल नाजुक है तेरा पाँव पैदल चल रही हो ये बात मैंने है माना  मैं भी चल लूं साथ इसलिए तेरे संग जाना  संग संग साथ रहने सी बढ़ेगा प्रेम प्रभाव  गोरी धीरे धीरे चल नाजुक है तेरा पाँव मैं श्याम तू गोरी  मैं चंदा तू चकोरी  चल आ जाए उधर जहाँ नदी किनारे नांव  गोरी धीरे धीरे चल नाजुक है तेरा पाँव मुकेश लखनवी

बाबुल का आशीर्वाद

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बड़े अरमानो से मैंने पाला था जिसको  आज देखो वो विदा हो चली है  आज मेरी लाडो जुदा हो चली है  सदा नेकी के सांचे मे ढाला था जिसको  आज देखो वो विदा हो चली है  आज मेरी लाडो जुदा हो चली है  बाबुल का घर अब हुआ बेगाना  नये घर मे परिवार की इज़्ज़त बढ़ाना आज तू उस घर की सदा हो चली है  आज मेरी लाडो जुदा हो चली है तेरा कमरा रहेगा हमेशा सलामत  हमेशा करेंगे हम इसकी हिफाजत   आज मेरी बेटी दुआ ले चली है  आज मेरी लाडो बिदा हो चली है  याद आएगी तेरी वो बचपन की बातें  याद आएगी तेरी मीठी सी शरारतें  मेरे घोंसले की वो लाडली चिड़िया आज देखो कहाँ उड़ चली है  आज मेरी लाडो विदा हो चली है  जा मेरी बेटी आशीर्वाद रहे हमारा  सदा ख़ुश रहे ये जीवन तुम्हारा  आज इस घर की खुशियाँ ले चली है  आज मेरी लाडो जुदा हो चली है   मुकेश लखनवी

लिंग भेद

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चाहे हो कोई महाग्रंथ  या हो कोई अनुच्छेद  या हो कोई गीता पुराण  या हो कोई भी वेद  सर्वत्र वर्जित है लिखा हुआ  केवल एक लिंग भेद  केवल एक लिंग भेद  लड़का लड़की मे भेद क्यूँ  दोनों ही धरा की जरुरत हैं  एक चलाता घर समाज  एक ममता की मूरत है  भला बताओ अगर न हो इनमे से कोई एक  तो वंशावली कैसे चल पाएगी  फिर नहीं होगी कोई लक्ष्मी बाई  जो अपना राज्य बचाएगी  फिर नहीं होगी कोई इंदिरा  जो देश को आगे ले जाएगी  फिर नहीं होगी कोई मदर टेरेसा  जो सेवा भाव दिखलाएगी  अगर तात्या टोपे ने  लिंग भेद किया होता  तो किस लक्ष्मीबाई की  गौरव गाथा गाते हम  और अगर लिंग भेद होता  मदर टेरेसा का तो  ऐसा सेवा भाव कहाँ पाते हम  अगर लिंग भेद होता किरण बेदी का तो बहादुर सख्शियत कहाँ मिलती  अगर लिंग भेद हो किसी नारी का  तो वीरों की गाथा कैसे बनती   अगर बात मेरी समझ आ जाए  तो लिंग मे कोई नहीं भेद है  और अगर नहीं समझ पाए  हो तो "लखनवी" हमें बहुत खेद है  ...

बाघ संरक्षण

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अगर चाहते हो बना रहे पर्यावरण संतुलन  तो करना ही होगा मिलकर बाघ संरक्षण  आज दानवों ने मिलकर इनके वंश का नाश किया  फिर कैसे फले फूलेगा वो प्राणी उद्दान और वो बगिया  हम इनको अपना राष्ट्रीय पशु मानते हैं  फिर कैसे हम इनके जड़ को काटते हैं  जरा सोचो अगर नहीं रहे बाघ  तो वन्य जीवन कैसा होगा  बढ़ जाएंगे छोटे जीव  और जीवन नरक सा होगा  इन छोटे जीवों का संतुलन  बाघ  जैसे बड़े जानवर से बनता है  तभी वन्य प्राणियों का संतुलित जीवन चलता है  मै देश का बड़ा आभारी हूँ  जिन्होंने बाघ संरक्षण का काम किया  उनके जनजीवन बचाने को  तनिक भी न विश्राम लिया  आज बाघ हमारे जनजीवन की जरुरत हैं  इनको बचाने का हमेशा यही शुभ मुहूरत है  बना रहे राष्ट्रीय पशु हमारा  तो आओ मिलकर कसम खाएं  बाघ का हमेशा संरक्षण हो  ऐसा हम एक अलख जगाएं  मुकेश लखनवी

वन्य जीव

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हे धरती के सबसे बुद्धिमान प्राणी, इन वन्य जीवों पर भी दया करो  पर्यावरण का न दोहन करो, अरे कुछ तो हया करो  जरा सोचो अगर ये वन्य जीव नहीं होते तो पर्यावरण संतुलन कैसे होता  और अगर ये न होते तो फिर ये मानव जीवन कैसे होता  न होते घोड़े तो दूर तलक कैसे जाते  न होते घोड़े तो युद्ध कैसे जीत पाते  न होता शेर तो छोटे जानवर भयभीत न होते  करते परेशान तुमको भी और किसी के मीत न होते  ये तो कुछ उदाहरण हैं जो वन्य जीव की महत्ता समझाते हैं  और करो रक्षा पर्यावरण की बस यही सीख दे जाते हैं  हे मानव जिस दिन तुम कोई बाग़ नहीं उजाड़ोगे  मिलेगी उनको भी पनाह और अपना जीवन सुधारोगे  जरा सोचो अगर अंधाधुंध पेड़ पौधे काटते रहे तो ये बेचारे कहाँ जाएंगे और फिर एक दिन ऐसा होगा, जब ये तुम्हारे घर आएंगे  तब सोचोगे की काश मैंने उनका आशियाना न उजाड़ा होता   तो वन्य जीव वहीं रहते और अपना भी गुजारा होता  मुकेश लखनवी

आतंकवाद

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न जाने  कैसा,  ये फैल चुका  उन्माद  सम्पूर्ण विश्व झेल रहा जो,  वो है आतंकवाद  लाखों लोगों का क़त्ल करते हैं, नाम देते हैं जिहाद  ऐसी बीमार मानसिकता को रोक लो,  वरना कर देंगे बरबाद  इनकी बर्बरता से अपाहिज,  न जाने कितने परिवार  सिर्फ रह जाते हैं देखते, बेबस और लाचार  इसको मिटाना है तो,  हर वक़्त तैयार रहे टास्क फ़ोर्स  तभी आएगा इनको,  अपने किये का भी होश  इन आतंकवादियों को क्या,  तनिक भी होता नहीं भान  कि कोई अगर इनके परिवार को मारे तो,  क्या नहीं निकलेगी इनकी जान  ये मुद्दा आज से नहीं, बहुत पहले से गरमाया है  इसमें राजनीति भी कम नहीं, ये कैसा धुंधला साया है  पडोसी मुल्क भी,  इससे बाज आता नहीं  तभी अपने कारगुजारी से, नजर तक मिलाता नहीं  जबकी वो खुद,  इस दंश को झेल रहा है  वो खुद मोहरा बना है जो, दूसरे से खेल रहा है अब इन आतंकवादियों को,  ये खेल ख़त्म करना होगा  जो मौत ये सबको देते हैं,  वही मौत इनको मरना होगा  धन्य है मेरी भारत से...

क्रंदन

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हे मनुज ये बता  तू क्यूँ करता है इतना क्रंदन  भूल जा उन बातों को  जिसमे होता तुझको उलझन  ये हार जीत तो प्यारे  होते हैं जीवन का अभिन्न अंग  क्यूँ उदास सा बैठा है  क्यूँ बीता रहा यूँ ही जीवन मत कर मत कर कुछ ऐसा  जिसमे भूल जाए तू अंतर्मन  चल उठ और आगे बढ़  बुला रहा स्वर्णिम जीवन  रोक ले उठती लहरों को  जो दे रही तुझको उलझन  जा तुझको बुला रही है  जा थाम ले उम्मीदों भरा दामन  यूँ ही बैठे बैठे आखिर  कब तक करेगा तू चिंतन  अपनी सकारात्मक सोच से  तू कर खुद अपना निर्वाहन  हे मनुज अब छोड़ भी दे  मत कर अब इतना क्रंदन  वरना बनेगा हास्य का पात्र  फिर सिहर उठेगा तेरा मन  इसलिए छोड़, मत कर अब   क्रंदन क्रंदन क्रंदन  धन्यवाद  मुकेश लखनवी

गुरु की महिमा

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गुरु पूर्णिमा विशेष  माता भी गुरु है तेरे,  पिता भी गुरु हैं तेरे  दोनों ने तुझे जीवन का आइना दिखाया है   फिर जो गया तू स्कूल,  जो गुरु मिले थे तुम्हे, जीवन का मूल मंत्र उन्होंने सिखाया है  गुरु का एहसान मान, बनेगी तेरी पहचान,दुनिया मे आगे जिसने बढ़ना सिखाया है  कदमो पे झुक जाना,  जहां भी मिलेंगे वो, उन्ही के कटु शब्दों ने तुम्हे मंजिल पर पहुँचाया है  मारते थे, डांटते थे,  फिर समझाते थे वो,  वही आज तुझको तेरे काम आया है  जिंदगी की होड़ मे, ज़माने की भाग दौड़  मे,   कभी उन्हें भूलना न प्यारे जिन्होंने सत्य मार्ग दिखलाया है  ऐसे गुरुवर को लखनवी का प्रणाम है,  जिसे जिंदगी मे मैंने  देवता तुल्य पाया है  ऐसे गुरुवर को लखनवी का प्रणाम है,  जिसे जिंदगी मे मैंने  देवता तुल्य पाया है आपका मुकेश "लखनवी"

लम्हा लम्हा

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वक़्त चलता है लम्हा लम्हा  दिल जलता है लम्हा लम्हा   जब हो जाता है इंसान को गुरुर  तो सीरत बदलता है लम्हा लम्हा महज चार दिन की जिंदगानी अपनी  कहाँ पता चलता है लम्हा लम्हा कर ले खिदमत बुजुर्गों की  दुआ लगता है लम्हा लम्हा  अपना हुनर दुनिया को दिखा  किस्मत बदलता है लम्हा लम्हा आपस मे इखलाख रख  मोहब्बत बढ़ता है लम्हा लम्हा वही सच्चा है इस दुनिया मे  जो बदी से डरता है लम्हा लम्हा परवाने भी आ जाते हैं कभी कभी  जब सम्मा जलता है लम्हा लम्हा आपका मुकेश लखनवी

काश की ऐसा वक़्त हो

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काश की ऐसा वक़्त हो कि, देश मे खुशहाली आ जाए  मै आऊं तुम्हारे पास तो ईद हो, तुम आओ मेरे पास तो दिवाली आ जाए काश की ऐसा वक़्त हो........   आपस मे कोई रंज़िश न हो, हो हर तरफ मुकम्मल माहौल मेरे दर पर अब न कोई सवाली आ जाए  काश की ऐसा वक्त हो........ आपसी रिश्तों मे मिठास हो, हर खुशी का लम्हा सबके पास हो  मेरे घर पर, तुम्हारे घर से मोहब्बत की थाली आ जाए  काश की ऐसा वक़्त हो........ वो वक़्त आएगा जब होगा हर तरफ अमन और चैन,   कहीं दंगा न हो मजहब के नाम पर और बहाली आ जाए  काश की ऐसा वक़्त हो........ कभी आपस मे न टकराए फिर  कोई  भाईचारा हो और पास आ जाए फिर कोई  तुम बोलो राम राम और मेरी जुबां पर या अली आ जाए  काश की ऐसा वक़्त हो......... मैं जानता हूँ ये काश काश ही रह जाएगा ये राजनीति रूपी सर्प डस रहा है और डसता ही रह जाएगा कुछ तुम्हारी तरफ होंगे जिन्हे ये इखलाख पसंद नहीं  और कुछ हमारी तरफ होंगे जिन्हे ये मेरी बात पसंद नहीं  आपका मुकेश "लखनवी"

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

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शैली :- अवधी  उल्टा चोर कोतवाल को डांटे  वहिकी बटवा क रुपया लोगन मे बाँटे  अउर जे ज्यादा बत्तमीजी करै तौ  धर देय वहुक दुइ चार चमाटे  कउन जमाना आई गइल बा  ई देखा उ अब केहुक न सांटे  अउर जे समझावै उ जूता पावै  उल्टा चोर कोतवाल को डांटे आपन कौनो सुध बुध नाही   जे सिखावै तौ करै मनाही   चाहे पैर मे लगे हों काटें    उल्टा चोर कोतवाल को डांटे छोटी छोटी बात म मुँह फुलावै  झगड़ा करै औ गारी पावै   दिल मे बना लेता है गाठें  उल्टा चोर कोतवाल को डांटे    मुकेश लखनवी

बाल विवाह और शिक्षा

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रोक लो सामाजिक कुप्रथा को रोको हर बाल विवाह  वो फूल सी कली मुरझा जाएगी  हो जाएगा जीवन तबाह  अगर देना है तो जीवन मे ये भिक्षा दो  अपने पैरों पर खड़ी हो जाए वो  उसको ऐसी शिक्षा दो   बाल विवाह करके क्यूँ अपना पीछा छुड़ाते हो  अरे अभी मासूम है वो  क्यूँ उसकी जिंदगी मे ग्रहण लगाते हो  अगर जिंदगी ही बनानी है  तो उसको शिक्षा का ज्ञान देना  किसी के आगे वो सर न झुकाए  उसको ऐसा अभिमान देना बाल विवाह एक अभिशाप है जिंदगी बर्बाद हो जाती है ये सबसे बड़ा पाप है  शिक्षा देकर उसको इतना काबिल बना देना  अपना लक्ष्य वो पा जाएगी  उसको ऐसा साहिल दिखा देना आओ सब मिल करके  इस पर विचार भरपूर करो  रहे खुशहाल उसका जीवन  इस समस्या को जड़ से दूर करो  इसको दूर करना है तो  गांव गांव नगर नगर जाना होगा  मिल जाए ज्ञान सभी को  तो शिक्षा का अलख जगाना होगा  बाल विवाह मत करना  जिसका न कोई अभिप्राय हो  दे देना बस अच्छी शिक्षा  शुरू नवजीवन अध्याय हो  धन्यवाद  आपका मुकेश "लखनवी"