क्रंदन



हे मनुज ये बता 
तू क्यूँ करता है इतना क्रंदन 

भूल जा उन बातों को 
जिसमे होता तुझको उलझन 

ये हार जीत तो प्यारे 
होते हैं जीवन का अभिन्न अंग 

क्यूँ उदास सा बैठा है 
क्यूँ बीता रहा यूँ ही जीवन

मत कर मत कर कुछ ऐसा 
जिसमे भूल जाए तू अंतर्मन 

चल उठ और आगे बढ़ 
बुला रहा स्वर्णिम जीवन 

रोक ले उठती लहरों को 
जो दे रही तुझको उलझन 

जा तुझको बुला रही है 
जा थाम ले उम्मीदों भरा दामन 

यूँ ही बैठे बैठे आखिर 
कब तक करेगा तू चिंतन 

अपनी सकारात्मक सोच से 
तू कर खुद अपना निर्वाहन 

हे मनुज अब छोड़ भी दे 
मत कर अब इतना क्रंदन 

वरना बनेगा हास्य का पात्र 
फिर सिहर उठेगा तेरा मन 

इसलिए छोड़, मत कर अब  
क्रंदन क्रंदन क्रंदन 

धन्यवाद 
मुकेश लखनवी

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