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बाबुल का आँगन

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आज मेरी बाबुल ने कर दी सगाई  हो गई पराई मैं तो हो गई पराई पंडित ने मंत्रों की दे दी दुहाई कर दी विदाई मेरी कर दी विदाई मिल कर के सबने है मण्डप सजाया सखियों ने मिल कर के मेंहदी लगाया पूर कर के चौक और गौरजा बिठाई हो गई पराई मैं तो हो गई पराई छूट गया आज मुझसे बाबुल का अँगना सखियाँ सहेलियां मेरी आज कोई संघना मां की गोदी का वो पलना छूट गया है मेरा बचपना  आज मेरे अपनों ने आँखें चुराई हो गई पराई मैं तो हो गई पराई आज मेरी बाबुल ने कर दी सगाई हो गई पराई मैं तो हो गई पराई ✍️✍️आशीष सिंह Call 112 लखनऊ

बुजुर्गों की सौगात गाँव

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गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का रहते थे जिनमें कभी हम बचपनों की याद लेकर बुझ गया है दीप अब उस खण्डहर का गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का बाबा की गोदी में खेले थे कभी हम मां की डाँटो का कभी था सिलसिला वहां पर चलते थे हम दौड़ कर जिन रास्तों पर मिट गया है अब निशा उन रास्तों का गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का लगती थी चौपाल मेरे गांव में नीम की शीतल हवा उस छांव में थी बहुत सहयोग की एक दूसरे से आस्थाएं सत्य बातें हैं नही है यह कथाएं करते थे मिलकर दुआएँ न बचा है अब समय उन आदतों का गिर गया है घर हमारे पुर्वजों का होली के दिन गांव में संगीत होता हर किसी के दिल मे स्वर्णिम फूल खिलता प्यार और स्नेह का हम रंग लेकर सजता था हर घर हमारे गांव का गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का ✍️✍️ आशीष सिंह Call 112 लखनऊ

प्रकृति

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है प्रकृति सरल सुंदर तरंग मानव जीवन का भिन्न अंग यह वसुधा की फुलवारी है इस पर दुनिया बलिहारी है इससे रोशन हर क्यारी है यह प्राकृति न्यारी न्यारी है यह मौसम की किलकारी है ऋतुएं आती है रंग रंग मानव जीवन का भिन्न अंग है प्रकृति सरल********* प्राकृति वसुधा पर फैली है मानव जीवन की शैली है वन उपवन इसकी थैली है पथ जीवन की यह रैली है इससे न कोई करो जंग मानव जीवन का भिन्न अंग है प्रकृति सरल******** ✍️✍️ आशीष सिंह Call 112 लखनऊ

राधा सीता बनो

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तुम अगर साथ दो राधा सीता बनो मैं तुम्हारा किशन राम बन जाऊंगा तेरे अधरों पे गर नाम मेरा रहे बाँसुरी बनके दिल मे उतर जाऊंगा जिंदगी का है पथ मुश्किलों से भरा चलता हूँ तो मुझे कोशती है धरा हाँथ में हाँथ दो तुम मेरी अपक्षरा पथ कठिन हो मैं फिर भी गुजर जाऊँगा तेरे अधरों पे गर नाम मेरा रहे बाँसुरी बनके दिल मे उतर जाऊंगा तुम अगर******************* था अधूरा तेरे बिन अधूरा हूँ मैं राधिका के बिना सूना कान्हा हूँ मैं जैसे सूना है ब्रज साँवरे के बिना वैसे सूना सा एक ब्रज का ग्वाला हूँ मैं यमुना तट पे मुझे रोज मिलते रहो मैं तुम्हारे लिए श्याम बन जाऊंगा तेरे अधरों पे गर नाम मेरा रहे बाँसुरी बनके दिल मे उतर जाऊंगा तुम अगर******************* इस जहाँ में वफ़ा कोई करता नही अब किसी के लिए कोई मरता नही अब जमाने से भी कोई डरता नही प्यार तो आज का एक ब्यापार है कृष्ण राधा यहाँ कोई बनता नही मन के मधुवन में तुम अपना पहरा करो मैं उसी मन के मधुवन में छुप जाऊंगा तेरे अधरों पे गर नाम मेरा रहे  बाँसुरी बनके दिल मे उतर जाऊंगा तुम अगर****************** ✍️✍️आशीष सिंह Call 112 लखनऊ

पिता अद्भुत है

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शाख के टूटे हुए  पत्ते न समझो मैं तुम्हारे जन्म की  अदभुत कहानी हूँ ढल चुकी है आज  वो मेरी जवानी आने वाला है जो  तुम पर कल बुढापा उस बुढ़ापे की मैं  एक निश्चित निशानी हूँ खेल कर गोदी में मेरी था तूने बचपन गुजारा उंगलियों को थाम कर के अपने जीवन को सँवारा मुश्किलों से जब घिरा तब तूने हमको पुकारा जब फँसा मजधार में मैं जब बना तेरा किनारा  गंगा की तू मौज है  मैं एक रवानी हूँ मैं तुम्हारे जन्म की  अद्भुत कहानी हूँ ✍️✍️आशीष सिंह Call 112 लखनऊ

धड़कनों पे लिखा है जुबानी नहीं

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प्यार मेरा है कोई कहानी नहीं धड़कनों पे लिखा है जुबानी नहीं हाथ थामा था तुमने मेरा एक दिन कसमे खाई थी वादे किए थे बहुत तुम बदल तो रही मौसमों की तरह बनके आंसू तू मुझ पे बरसती रहे मेरा तन तर बतर हो गया भीग कर इन हवाओं ने मन में तो डर भर दिया तेरे अश्कों में कुछ बात तो खास है कहीं इनका तो रंग आसमानी नहीं धड़कनों पे लिखा है जुबानी नहीं रेत पर नाम लिखते मिटाते रहे दिल के जख्मों को ऐसे सजाते रहे याद आई तो हम खुद से रोये बहुत अपने दिल को हम ऐसे मनाते रहे तेरी तस्वीर दिल में बसी है मेरे और इसके सिवा कुछ निशानी नहीं धड़कनों से लिखा है जुबानी नहीं तुमने मुझसे कहा था बिछड़ा जाएंगे तेरी किस्मत के पन्ने पलट जाएंगे चाहकर हम कभी भी न मिल पाएंगे है सजाना मुझे घर किसी और का तेरी दुनिया से हम दूर हो जाएंगे था नशा प्यार का मुझ पे छाया हुआ  फिर भी हमने तेरी बात मानी नहीं  धड़कनों पर लिखा है जुबानी नहीं     ✍️✍️  आशीष सिंह       Call 112 लखनऊ

"कोरोना काल"

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          "प्रचण्ड चंड ज्वाल है!! धरा पे जो सवाल है,विश्व भी"बेहाल"है! मन बहुत अचेत है,कोई नही"सचेत"है!! समय की यह लपेट है,कोरोना की"चपेट"है! अनजान समझ कर के,मुझसे कर रहा"आखेट"है!! निर्बल समझ कर मेरा,बनना चाहता वो"काल"है!            "प्रचण्ड चंड ज्वाल है!! यह राम कृष्ण की धरा,नही चलेगा"बस"तेरा! अनन्त कोटि देवताओं,ने यहाँ"जीवन"धरा!! रुका नही झुका नही,अड़ा रहा"डिगा"नही! यहाँ की है परंपरा वीरों की है"यह"उरबरा!! भौतिक तापों से यहाँ,रक्षक स्वयं"महाकाल"है!              "प्रचण्ड चंड ज्वाल है!!  विज्ञान भी अभिशाप है,मानव का भी"उपवाश"है! फिर भी नही परवाह है,न ही कोई"बदलाव"है!! महामारी का प्रभाव है,सोशलडिस्टेनसिंग का"अभाव"है! पूरे विश्व मे तनाव है, यहाँ मृतु भी अकाल है!!                "प्रचण्ड चंड ज्वाल है!! युवा ये मन मे ठान कर,महाकाल का फिर"जप"कर! जीवन की ईर्ष्या त्याग कर,पुलिस पर"अभिमान"कर!! डॉक्टर नर्स सफाई कर्मी, कोरोना वीर...

"पिता एक अनपढा उपन्यास"

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पिता बच्चों की कहानियों का"अभ्यास"है!               पिता बच्चों के जीवन का अनपढा"उपन्यास"है!! पिता उंगली पकड़कर"चलना"है! पिता बच्चों के झूले का"पलना"है!! पिता बच्चों की दर्द में "सिसकना"है! पिता के बिना बच्चों का हर ख्वाब"सूना"है!! पिता बच्चों के दुखों में सुख का"अहसास"है! पिता बच्चों की कहानियों का"अभ्यास"है!! पिता से होली है दिवाली है ईद है"रमजान"है! पिता अपने नन्हें बच्चों की आत्मा और"प्राण"है!! पिता से ही मां का सिंदूर और सुहाग पर"अभिमान"है! पिता अनपढ़ होकर भी बच्चों का संपूर्ण"ज्ञान"है! पिता बच्चों की सफलता का सबसे बड़ा"प्रयास"है!! पिता बच्चों की कहानियों का"अभ्यास"है! पिता त्याग है समर्पण है अनुराग है बच्चों में"प्रतिफल  राग"है!! पिता है तो मां की गवाही का"प्रमाण"है! पिता से ही बच्चों की सृष्टि का"निर्माण"है!! पिता से ही जीवन में"प्रकाश"है! पिता अपने बच्चों की परिधि का"व्यास "है!! पिता बच्चों ...

मानव एक बला है

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जीवन जीना एक कला है हर व्यक्ति प्रकति में"ढला"है अच्छी बुरी कड़ियों से"जुड़ा"है  इसी अफरा तफ़री में   पल पल"जला"है गिरा ठोकरों से,सम्भलना भी सीखा, खड़ा हो गया और फिर से"चला"है  "जीवन जीना एक कला है" था पथ जिंदगी का भरा"मुश्किलों"से फिर भी कभी भी कहीं न"रुका"है     "क्योंकि ये मानव नही है"         "यह एक बला है"     "जीवन जीना एक कला है" देखा पलट कर के,जीवन के पीछे कमियां बहुत थी,मेरी जिंदगी में लड़कपन से लेकर,जवानी गंवाया जवानी से होकर,बुढापे में आया     बस यहीं तक मेरा"सफर"है बुढापा भी मेरा बहुत मन"चला"है      "क्योंकि ये वो बुढापा है"       "जो जवानी से लड़ा है"      "जीवन जीना एक कला है"    ✍️✍️ आशीष सिंह    Call 112 लखनऊ