बुजुर्गों की सौगात गाँव


गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का
रहते थे जिनमें कभी हम बचपनों की याद लेकर
बुझ गया है दीप अब उस खण्डहर का
गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का
बाबा की गोदी में खेले थे कभी हम
मां की डाँटो का कभी था सिलसिला वहां पर
चलते थे हम दौड़ कर जिन रास्तों पर
मिट गया है अब निशा उन रास्तों का
गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का

लगती थी चौपाल मेरे गांव में
नीम की शीतल हवा उस छांव में
थी बहुत सहयोग की एक दूसरे से आस्थाएं
सत्य बातें हैं नही है यह कथाएं
करते थे मिलकर दुआएँ
न बचा है अब समय उन आदतों का
गिर गया है घर हमारे पुर्वजों का

होली के दिन गांव में संगीत होता
हर किसी के दिल मे स्वर्णिम फूल खिलता
प्यार और स्नेह का हम रंग लेकर
सजता था हर घर हमारे गांव का
गिर गया है घर हमारे पूर्वजों का


✍️✍️ आशीष सिंह
Call 112 लखनऊ

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