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आम कितना खास

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हमारे देश के संविधान की व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री विधायक सांसद महापौर पार्षद सरपंच आदि सभी को आम जनता ही चुनकर इन पदों पर बैठाती है ताकि यह उनकी आवाज बन सके ।यह सारे पद जनता की सुविधा प्रदाता के रूप में होते हैं ।जनता जनार्दन के जनादेश से तख्ता पलट हो जाता है लेकिन वर्तमान परिवेश में हम सभी अपनी ताकत को भूलकर राजनीतिक बिसात के मोहरे मात्र बनकर रह गए हैं ।हम आम आदमी की ताकत को पहचानना ही नहीं चाहते। आम कहलाना  हमें मंजूर ही नहीं हम तो बस खास बनकर झूठी में ही जीना जाते हैं। सिग्नल पर रुकना, टोल नाके पर रसीद कटाना हमारी शान के खिलाफ है। लंबी लाइन में लगकर इमानदारी से सही काम करवाने की बजाय अंदर वाले रास्ते से टेबल के नीचे से काम कराना सही समझते हैं ।आम आदमी बनकर अन्याय के खिलाफ लड़ना हमें गवारा नहीं ।आम आदमी सिद्धांतों पर जीता है शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है पर हमें तो सबसे भले बनकर सिर्फ अपना हित साधना होता है ।हमने स्वयं आम आदमी की शक्ति को कमतर आंका है इसलिए हमारा आकलन दूसरों ने भी वैसा ही किया जबकि समय आ गया है यह बताने का कि जनादेश को नकारना किसी के वश में नहीं ...

दिग्भ्रमित युवा

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 सड़कों पर कभी उत्पात मचाता कभी लोगों पर पत्थर फेंकता तो कभी बेगुनाहों के खून से होली खेलता जी हां यही पहचान है दिग्भ्रमित युवा की ।पथभ्रष्ट होशो हवास खो कर किसी की भी बिछाई बिसात का मोहरा बन जाना युवाओं की आदत हो चुकी है ।पैसा कमाने का शॉर्टकट और निजी स्वार्थों और आवश्यकताओं को पूर्ण करने का भूत  कुछ इस तरह सवार है कि पागल भीड़ का हिस्सा बनने से भी गुरेज नहीं रहा। बुद्धि है, ज्ञान है ,प्रतिभा है, हुनर है ,तकनीकी का ज्ञान है लेकिन कमी है तो सिर्फ धैर्य और स्व विवेक की । अपने ज्ञान और हुनर का उपयोग बहकावे का शिकार होकर गलत दिशा में करना उचित नहीं है ।अपनी शक्ति ,अपनी अपार ऊर्जा अदम्य साहस सबकुछ राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लगा देना सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के प्यादे बनकर यह सरासर नैतिकता का अवमूल्यन है। आज का युवा पहले से ज्यादा समझदार व्यवहारिक ज्ञान की समझ रखने वाला चौकस ,चौकन्ना*अपडेट*युवा है।  लेकिन फिर भी दिग्भ्रमित है यह शर्मनाक चिंतनीय और खेद जनक है। भारत की संस्कृति संस्कार गरिमा का ध्यान रखते हुए युवाओं को इस देश के कर्णधारो को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझने की महती...

छोटी-छोटी आशाएं

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  छोटी-छोटी आशाएं हैं इस जीवन की जान   इनके साथ ही होता है जीना आसान   घटाटोप अंधियारे  से एक नन्हा दीपक लड़ता   जब तक आशा की बाती से टिममटिमकर वह जलता   घनी रात भी पांव पसारे जब खुद पर इतराती   सूरज की एक नई किरण से भोर सुहानी आती   शैशव  से वृद्धावस्था तक कई साल है बीते   नई नई आशाएं पाले हम सपनों में जीते   जब तक आशाएं होती हैं हम भी तब तक जीते   बिन उम्मीदों के सबके दिल हो जाते हैं रीते   आशाएं ही तो हम सबको नई उमंगे देती   कारण भी देती जीने का और निवारण देती   छोटी-छोटी आशाओं से आसमान टिक  जाता है   इन पर जीने वालों का ही इतिहास लिख जाता है         प्रीति मनीष दुबे          मण्डला मप्र

युवाओं में नशे की बढ़ती लत

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 आज का युवा उच्च शिक्षा प्राप्त तेज व पैने दिमाग का धनी, आधुनिक तकनीकी का ज्ञाता ,प्रतिभा संपन्न व तेज रफ्तार से दुनिया के साथ भागता हुआ युवा है ।अगर उसमें कमी है तो सिर्फ धैर्य और सहनशीलता की। त्वरित परिणाम की आकांक्षा रखना और नकारे जाने को सह ना पाना यह दो कमजोरियां उसे दिग्भ्रमित कर रही हैं ।मेहनती तो है पर परिणाम की आतुरता है ।नकारे जाने पर टूट जाता है। पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकीकरण में भी लिप्त है ।नौकरी न मिलने ,पर, माता-पिता  से पर्याप्त देखभाल ना मिलने पर ,प्यार में धोखा खाने पर बहुत जल्दी हताश हो जाता है और फिर नशे की अंधी दुनिया में खो जाता है। संगत के कारण, कभी एडवांस बनने की होड़ कभी पैसों की कमी तो कभी पैसों की अधिकता युवाओं को नशे के मकड़जाल में फंसाने के लिए जिम्मेदार है अभिभावकों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में अव्वल आने का शौक है युवाओं को आवश्यकता से अधिक छूट देकर वे तो स्टेटस मेंटेन कर लेते हैं पर उनके बच्चों को ड्रग माफियाओं के शिकंजे में कब और कैसे धकेल देते हैं खुद भी नहीं समझ पाते ।नशे की लत उन्हें अपराधी बना देती है या तो वे जान ले लेते हैं या जान गवा ब...

सफलता का मूल मंत्र

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ना कोई करिश्मा ना ही कोई यंत्र   कर्म करो निष्काम बस सफलता का मंत्र   जितना लिखा नसीब में कोई सके ना छीन   थोड़ा कम मिल जाए तो मत बन जाओ हीन    मन में रख विश्वास अटल लक्ष्य साधलो अपना   डूब जाओ सब भूलकर पूरा कर लो सपना   मेहनत करो कठोर और चुनो ना छोटा रास्ता   भाग्य भरोसे मत बैठो रखो प्रभु पर आस्था   ईश्वर राह दिखाते हैं पर चलना खुद को पड़ता है   चाहे जो भी हो स्थितियां ढलना खुद को पड़ता है   असफलता को मान चुनौती अपनी भूल सुधारें   कहां कमी रह गई हमारी सोच और विचारे   मेहनत से ही भाग्य सवरते बोल गए सब संत   आशा और विश्वास भरे मन सफलता के मूल मंत्र      प्रीति मनीष दुबे       मण्डला मप्र

बेरोजगारी

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 हर देश के विकास की गति  जिस सुरसा से हारी   सारे प्रयासों पे  पड़ती जो भारी हाय रे बेरोजगारी हाय रे बेरोजगारी   देश के युवाओं के सपने बड़े हैं बड़ी-बड़ी डिग्रियां ले लाइन में खड़े हैं   कभी-कभी तो कोई युवा बस इसीलिए चूकता  की उसमें जरूरत से ज्यादा है योग्यता   प्रतिभा और बुद्धि द्रुतगति से बड़ी है   पर उसके बराबर से बेरोजगारी खड़ी है   युवा वर्ग अफ़सरी की चाहत लगाता   मनचाही मंजिल पर पहुंच ना पाता   निराशा के सागर में गोते वो खाता   धैर्य जब वो खोता  तो सैलाब आता   जो सारे गुणों को बहाकर ले जाता   वह अपराधी बनकर कभी सर उठाता   कभी नशा करके कहर है  वो ढाता   तो आए किसी की ना ऐसी अब बारी   किसी को सताए ना यह बेरोजगारी          प्रीतिमनीष दुबे          मण्डला मप्र

बाबुल का आंगन

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जिस आंगन में खेले कूदे बड़े हुए  उस मिट्टी की महक भरी है सांसों में  छोटा था पर सब सिमट ही जाते थे  उन खुशियों की चमक भरी है आंखों में  धीरे-धीरे सभी सयाने होने लगे  सुख-दुख सबके साथ होने लगे  डोली भी उठी मेरी  उस आंगन से  छूट गए सब  रिश्ते नाते दामन से  मैं भी तो अपनी मां की जाई थी  फिर भी सबके लिए हुई पराई थी  सब ने कहा बहुत पर मैंने ना जाना  उस घर आंगन को बस अपना ही माना  रीत यही सदियों से चलती आई है  भारी मन से सबने यही निभाई है  कड़ी धूप में वह तो छाया होता है  आशीर्वादों भरा वह साया होता है  पर बाबुल का  आंगन पराया होता है।             प्रीति मनीष दुबे               मण्डला(म.प्र)

शादी का लड्डू

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 बीवी तो बन गई आराम से पटेलन   हमको थमा दिया चौकी और बेलन   वह तो खाए अंगूरों के गुच्छे   हमने भी तो कर्म किए थे अच्छे फिर हम पति ही क्यों नजर में है खटके   जो थमा दिए हमें झाड़ू और फ़टके   मेरे हाल देखकर कुंवारों को लगेंगे झटके   पर भैया हम तो आसमान से गिरकर खजूर में है अटके   होता नहीं है हर पति का ऐसा बुरा हाल   यह तो हमारी फूटी किस्मत का ही है कमाल   होती है कुछ पत्नियां ऐसी ही महान हस्ती   जो पापड़ की जगह पति को ही तले तले खाती   इसे देखकर भयभीत मत हो जाना   शादी का लड्डू सब एक बार तो जरूर खाना      प्रीतिमनीष दुबे      मण्डला मप्र

आपबीती

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जाके पैर न फटी बिवाई वह ना जाने पीर पराई   जिसने जमाने से है चोट खाई   यह बात बस उसकी ही समझ में आई   खोखले आदर्शों की बजती है तूती   जब तक कोई बात खुद पर ना बीती   कोई खेल जाता है किसी के सपनों से   किसी को घाव मिले उनके ही अपनों से   यही तो होती है बस दुनियादारी   एक-एक कर आती है सबकी ही बारी   गम है अगर तो खुशी अगली होगी   कड़ी धूप है तो कभी बदली होगी   किसी के दिलों की है गागर नारीति   इसे हम सुनाएं जो हम पर है बीती   सभी की जुबां पर है अब आप बीती                प्रीतिमनीष दुबे                मण्डला मप्र

प्रायश्चित

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 हे गलती के पुतले मानव मत करना नादानी   भूल अगर हो जाए तो फिर मत करना मनमानी   भूल सुधार तभी होती है जब हो मन में ग्लानि   वही बड़ा होता  है जिसने   दिल से गलती मानी   वह इंसान सदा दुनिया में   रहता है बे चित्त   जो गलती करके भी ना करता कोई प्रायश्चित  तन मन पावन रखना है तो बात यह कर लो निश्चित   गलती सबसे होती है बस कर लो थोड़ा प्रायश्चित                   प्रीतिमनीष दुबे                   मण्डला मप्र

भारत की नारी

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जीवन भर संघर्ष करें पर हिम्मत नहीं है हारी   नई नई परिभाषाएं गढ़ती अबला नारी   नहीं रही असहाय पंगु और नहीं है अब बेचारी   बाधाओं को चीर बढ़ रही अब भारत की नारी   मन से है मजबूत बहुत अब नहीं रही सुकुमारी   कोई क्षेत्र अब नहीं अछूता जहां न पहुंचे नारी   बच्चों को वे पाल रही हैं पति के लिए भी ढाल बनिहैं   बुरी नजर जो उस पर डाले उन सब की वह काल बनी हैं   कहीं मुखाग्नि देकर वह बेटे का फर्ज निभाती हैं   कहीं बनी विधवा वीरों की देश का कर्ज चुकाती हैं   अमर शहीदों की जननी बन पूजनीय बन जाती हैं   भले कलेजा मुंह को आए आंसू नहीं बहाती हैं   धीर वीर गंभीर हैं अब तो नहीं है कुछ लाचारी   उन्नति के सोपानोको छूती भारत की नारी            प्रीति मनीष दुबे            मण्डला मप्र

विधवा की व्यथा

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 एक तरफ है सजी संवरी नारी   तो दूजी ओर विधवा बेचारी   जाने किस गुनाह की सजा उसे है मिलती   क्रूर नियति के आगे हाय किसी की ना चलती   माना कि हर सजनी अपने साजन के लिए है सजती  पर कृष्ण कन्हैया की मुरली तो सबके लिए है बजती  बदल गया है दौर सभी को साथ बदलना होगा   सारे जीवन घाव बनाती कुरीतियों को भी ढलना होगा   देश काल और परिस्थितियों से समझौता करना होगा   हर नारी की पीड़ा को अब कुछ तो कम करना होगा   कुप्रथाओं के अंधकार में अपना जीवन हारे   एक सहारा छूट गया अब ढूंढे कहां सहारे   अपनी शक्ति पहचाने और जीवन को सामान्य जिये  कर्मकांड के मकड़जाल उसने सभी अमान्य किए   अपना जीवन जीने का उसको भी पूरा हक है   परिवर्तन की दुनिया का परिवर्तन है कोई शक है।                   प्रीति मनीष दुबे                     मण्डला(म.प्र)

जीवनसाथी

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जीवन साथी का साथ बड़ा होता है, थामने वाला वह हाथ बड़ा होता है, वह है तो मैं हूं, मैं हूं तो वह है। बस उसके होने का सुखद अहसास बड़ा होता है, ना खून का रिश्ता ना पुराना नाता, उस रिश्ते में तो विश्वास बड़ा होता है। कहने को तो कुछ रस्मो का बंधन है, उसमें गुथा हुआ वह जोड़ बड़ा होता है, बिना कहे-समझे जो हर बात, आंखों को पढ़ने का अंदाज बड़ा होता है। अच्छा-बुरा तेरा-मेरा सबसे कहीं बढ़कर सात जन्मों का यह साथ बड़ा होता है... स्वरचित🏹🏹 प्रीति दुबे।

कन्यादान

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 हार गए राजे महाराजे हर कोई रीत निभाता   सब दानों में श्रेष्ठ दान ये कन्यादान कहाता   जाने किसने कैसे और क्यों ऐसी रीत बनाई   घर आंगन की रौनक भी पल भर में होय पराई   मां की पीर समझती बेटी   पिता की मां भी बनती बेटी    पूछो कितनी पीड़ा होती    दान में जब वह देते बेटी   घर आंगन की वह फुलवारी   सारी खुशियां उस पर वारी   आंसू कोई रोकना पाता   विदा होय जब वह सुकुमारी   नाजो से पाले पोसे और चली जाए ससुराल   फिर जीती है वह जैसा भी लिखा हो उसके भाल   बेटी के मात-पिता होना आसान नहीं होता   कन्यादान से श्रेष्ठ और कोई दान नहीं होता       प्रीतिमनीष दुबे      मण्डला मप्र

रोबोट

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 ना रिश्ते ना जज्बात ना अपना पन न एहसास   ना शिकवे  ना शिकायते  ना अपनी सी कोई बात   ना रूठना ना मनाना ना सुनना ना सुनाना   ना अपनी कहना ना किसी से कह लाना   दिल गमो से लबरेज हो तो भी सब सह जाना   आंखों में आंसुओं का समंदर लेकर   बड़ी खूबसूरती से छुपाना   दर्द का सैलाब आंसू बनकर ही बहता है   उस दर्द को छिपाकर होले  से मुस्कुराना   क्या कहें किसी मशीन की मानिंद हो गई यह जिंदगी   दिखावे की दुनिया में खो गई है जिंदगी   जब तक समझ पाते और समझा पाते   इस भरी भीड़ का हिस्सा हो गई जिंदगी   क्या पता कैसे हुआ क्यों हुआ और कब हुआ   सच कहें प्रीति तो रोबोट सी हो गई जिंदगी                     प्रीतिमनीष दुबे                     मण्डला मप्र

दीवारों के कान

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आए दिन लोगों में झगड़े तमाम होते हैं   अब समझ में आया कि दीवारों के भी कान होते हैं   मन के भेद कभी ना खोलो   सोच समझकर ही कुछ बोलो   हर कोई होता नहीं है अपना   राज सभी ना दिल के खोलो   अपने बनकर सब टटोलते  मुंह पर सब मीठा ही बोलते   समझ नहीं पाओगे कोई   कैसे फिर ये जहर घोलते  स्वार्थ सिद्ध करते सब अपना   पूरा करते अपना सपना   आस्तीन में पलते हैं जो   सबसे पहले डसते हैं वो   सावधान रहिए उन सब से   साथ में रह कर ठगते हैं जो         प्रीतिमनीष दुबे         मण्डला मप्र

स्वदेश

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क्यों घूमे रे देश विदेश   सुख देगा बस अपना देश   है स्वदेश की बात निराली   फैल जाए मुख पर खुशहाली माटी दे सुगंध देश की   मन भाए इसकी दिवाली   संस्कारों की गंगा बहती   मर्यादा में नारी रहती   मात-पिता की पूजा होती   हर कन्या देवी सी होती   सब हिलमिल त्यौहार मनाते   दो रोटी भी बांट के खाते   पैसे का रुतबा ना चलता    रिश्तो में विश्वास जताते   लिवइनकी कोई जगह नहीं है गठबंधन आधार हमारा   जीवन साथी बन कर जीते  एक दूजे का बने सहारा   परिवारों की है परिपाटी   सुख दुख के सब होते साथी संस्कृति है सर्वोच्च हमारी   हम सब हैं बस भारतवासी   धर्म जाति का भेद नहीं है   निज भाषा पर खेद नहीं है सुख-दुख सबके साझे होते    हम सब में कोई भेद नहीं है   चाहे जितने घूमो देश चाहे जितने बदलो वेस हम तो प्रीति भारतवासी हैं हमको  अपना भाता देश   मन से सब हो जाओ स्वदेशी चीजें भी अ...

एक लेखक का सपना

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 हर लेखक का सपना उसका अपना होता है   हर घटना पर दृष्टिकोण भी अपना होता है   वह क्या सोचे वह क्या चाहे   हर कोई यह समझ ना पाय  सिक्के के दो पहलू होते   पर लेखक ने कई दिखाएं   उसकी आंखों पर तो अनोखा चश्मा होता है   हर लेखक का सपना उसका अपना होता है   देश समाज विश्व में झांके   हर मिजाज को वह तो भांपें   चले लेखनी एक बार तो   बड़े-बड़े ताकतवर काँपे   कोई वार करे उस पर तो   कलम बने तलवार   अलख जगाने का उसका रंग अपना होता है   हर लेखक का सपना उसका अपना होता है     है इतिहास साक्षी अपना   जब जब बड़ी हुई कोई घटना  रौद्र  वीर श्रंगार रसों पे   कवियों ने की अद्भुत रचना   हर भावों का असर भी उनका अपना होता है   हर लेखक का सपना उनका अपना होता है ।               प्रीति मनीष दुबे               मण्डला(म.प्र)

वाह रे डिजिटल दुनिया

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वाह रे डिजिटल दुनिया क्या है तेरी करिश्माई   सारी भावनाएं अब इन इमोजी में समाई   हंसना रोना गुस्सा होना या मस्ती में चुटकी लेना  आश्चर्य का भाव रहे या उदासीन संवेदना   यह इमोजी समझा देंगे मन की सारी भावना   भावों की अभिव्यक्ति का यह अद्भुत छोटा रूप है   पल में बतला  दें जीवन में छाया है या धूप है   लंबे लंबे पत्र नहीं अब एक बटन चटकाना है   बोलो कितने कैसे-कैसे भाव किसे समझाना है   ना होती कोई रचनाएं और ना होते रचनाकार   पूर्व काल में हो जाता घर इमोजी का अविष्कार।                        प्रीतिमनीष दुबे                        मण्डला मप्र

कोहरे की रात

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 जीवन के इस रंगमंच में खेल खेलते जाना है   जिसको जो भी मिली भूमिका वैसा पात्र निभाना है   कर्म करो जो हो निष्काम   फल देना ईश्वर का काम   कांटे अगर बिछाओगे  तो   फूल तुम्हें क्या देंगे राम   निश कंटक हो  राह हमारी  चहूँ ओर उजियारा हो   हर मानव की चाह  यही है   कहीं नहीं अंधियारा हो   सुख दुख धूप छांव से होते   सबके जीवन मैं यह होते   पापों की गठरी का बोझा  बारी  बारी सब है ढोते   हे मानव तू क्यों घबराए   इस कोहरे की रात से   सारे बिगड़े काम बनेंगे   एक दूजे के साथ से   जो होगा वो अच्छा होगा   भरे रहो विश्वास से   पूरा आसमान टिकता है   बस एक छोटी सी आस से   यह कोहरे की रात तो प्रीति   सब को यूंही सताती है   चलते जाओ बढ़ते जाओ   मंजिल तुम्हें बुलाती है       प्रीति मनीष दुबे       ...