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बसंत पंचमी

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 प्रिय बसंत रितु आ गई, बहती प्यारी वात।  फूल वृक्ष सब झूमते, हिले जोर से पात।।  क्यारी न्यारी लग रही, खिले पुष्प सब रंग।  भौंरे गाना गा रहे, प्रिय कलियों के संग।।  हरियाली से भू सजी, झूम रहा है व्योम।   चले बसंती जो हवा, पुलकित होता रोम।।  ऋतु बसंत मन भाविनी, नर नारी हरषाँय।   सुमिरन प्रियतम को करें, धीरज तनिक न आय।।   कोयल गाना गा रही, चहुँदिशि गूँजे गीत।  हर मानव अब झूमता, लिए संग मनमीत।।  फूलों की खुशबू वहे, लेकर संग समीर।  कल कल करती है नदी, आनंदित है नीर।  नव पल्लव विकसित हुए, कलीं रहीं मुस्काय।   है किसान तैयार अब, फसल काटने जाय।।   पीली चादर से ढके, सरसों के यह खेत।  तितली मधुमक्खी सभी, मजा फूल का लेत।।  गीता देवी  औरैया उत्तर प्रदेश

चाय की चाह

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बहुत चाह है चाय की, कोई पिला दे आज। पूस  कड़कती  ठंड  में, जाये मिल अब राज।। सुबह सुबह की ठंड में, हाथ कड़कती चाय। जो सुख मिले शरीर को, गाथा कही न जाय।। लगे चाय मेरी प्रिया, मिल लूँ  कितनी बार। मिलता मन को चैन नहि, करता अतिशय प्यार। सज कर आती सामने, सुगंध तुलसी  वास। वश में कब  यह मन रहे, आलस होता नाश। तीखे नज़रें  ले बना, अदरक सखि के साथ। गले को मिले सुख बहुत, दर्द होत नहि माथ।। घूँट घूँट कर मैं करूँ,  रूप मधुर रस पान। उस सुख की क्या बात हो, कैसे करूँ बखान।। घर जब आये प्रिय सखा, दूँ उससे मिलवाय। देखें आतुर नैन वे  , जब तक न गले जाय।। गर्मी  में  पीते  बहुत, शीतल   ठंडी  चाय। बर्फ डाल पीते इसे, मन को अति है भाय। मौसम हो बरसात का, रिमझिम पड़ती वारि। आनंद लेते चाय  का,नर  हो  या  हो   नारि।। जानी जाती  नाम से, लिए  बहुत है रूप। कड़क, श्वेत या श्याम सी, देती मीठी धूप।। कोई सभा या मंच हो, होती इसकी पूछ। दर्शन   देत न सुंदरी, लगती संगत छूछ। मोटे लोगों की सखी, रखती इ...

दोहा

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श्रृद्धा से भक्ती करे, शक्ती शिव की साथ। देवों  के  महादेव  हैं, मेरे         भोलेनाथ।। गरल हलाहल पान कर, लिया कंठ में थाम। तब से बाबा को मिला, नीलकंठ है नाम।। लाए  थे  बारात  में , भूत प्रेत को  साथ। तब से दुनिया कह रही, हो भूतों के नाथ।। कैलाशी भी आप हो, कहलाते महाकाल। गंगाधर भी नाम है, चन्द्र सम्हाले भाल।। शशिधर भी कहलाओ प्रभु, और उमापति नाम। तुम  बाबा   केदार   हो ,  दुनिया  के  सुखधाम।। बाघम्वर  धारी  तुम्ही,  तुम हो काशीनाथ। विश्वनाथ कहलाओ तुम, देते सबका साथ।। डमरूधर  भी  नाम  है, वर्धा के असवार। औघड़दानी आप हो, दुनिया के करतार।। त्रिपुरारी तुमको कहें, जग के नर अरु नार। द्वादस ज्योतिर्लिंग की, महिमा अपरम्पार।। पशुपति नाथ महान तुम, तुम्ही कहाओ महेश। महादेव   नत   आपको ,   होते   शारद  शेष।। ओमकार भी आप हो, कर में धरे त्रिशूल। रावत को कैलाशपति, कभी न जाना भूल।। रचनाकार ✍️ भरत सिंह रावत भोपाल मध्यप्रदेश

निर्गुण ब्रम्ह उपासक संत कबीर दास(कबीर के दोहों के अर्थ से रचित )

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संत कबीर दासजी हैं काशी में जन्मे। 1398 में नीरू-नीमा से हैं यह जन्मे। घर था बड़ा गरीब  काम था जुलाहा। बचपन में पिता संग लगे रहे जुलाहा। विवाह हुआ लाई नामक  एक स्त्री से। पिता बने पुत्र कमल  कमली पुत्री के। साधु संगत से ईश्वर भक्ति में हुये लीन। निर्गुण ब्रह्म उपासक थे उसमे तल्लीन। जातिप्रथा वर्ण व्यवस्था के थे विरोधी। रूढ़िवाद आडंबर के रहे घोर  विरोधी। कबीर मत है  प्रभु ने मात्र इंसा बनाया। इंसा ने स्वार्थ  हेतु जाति पांति बनाया। पढ़े लिखे नहीं थे बिलकुल यह कबीर। अपनी बातें दोहा गा कहते  रहे कबीर। वे कहते कंकड़ पत्थर जोड़ मस्जिद है। तुर्क करे अज़ान जोर से खुदा बहरा है? पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ  पहाड़। जाँत पीसे अन्न खायें भरे पेट ना पहाड़। हिन्दू कहता है हमें राम है सब से प्यारा। मुस्लिम कहता हमें रहमाना ही है प्यारा। ट लड़ लड़ दोनों मौत के मुँह रोज जा रहे। सच क्या है ?कोई अब तक न जान रहे। सच ये है ईश्वर केवल एक वो है आधार। निरंकार है ब्रह्म है सबका करे बेड़ा पार। मुझे ढूँढ़ने की जरुरत ही नहीं है रे! बन्दे। मैं घट घट में करूँ वास तेरे पास रे!...