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साधना

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गृहस्थ आश्रम तो खुद एक साधना है  जिसमे आकर भगवान भी रम गये है नही जाना पडता हमे हिमालय पर  सारे शुभ कर्मो को करके पुण्य पाते है । हमारी तपस्या भी बहुत अनौखी है  सारी गृहस्थी के लिये प्रार्थना होती  नही चाँहते हम अकेले खुद के लिये  मेरी साधना मे अपनो की प्रार्थना है। अपने माँ बाप की सेवा ही साधना है जैसी कर ली चारो धाम की यात्रा हो  मेरे जन्मदाता ही हमारी उपासना है उनके चरणो मे ही सच्ची साधना है । भगवान की साधना करने को दुनियाँ है दीन दुखी की सेवा भी साधना ही है । कर लो मिल कर सब सच्ची साधना को  जो है बेसहारा ,दीन दुखी ,सहारा दो उनको । मीनाक्षी शर्मा

तराजू

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तुम अकेले खडे हो  एकता तुम मे नही है  हम अम्बर मे उडने वाले  और जमीं पर भी एक है  बडा अहंकार है तुम्हे  अपनी बुद्धि पर  फिर भी मजहब पर लडते हो  समानता जरा भी नही है  जानवर हम कहलाते है  जानवर से तुम लडते हो  एकता का पाठ हमसे क्यो नही पढते हो  तौल लो हमे जी भरकर  हम खरा सोना निकलेगे  छल ,कपट से नही भरे होगे  फिर भी भेदभाव करते हो हमसे  तराजू मे तौलकर देखो  हम भी कम ना निकलेगे। ✍️....मीनाक्षी शर्मा

प्रतीक्षा ..(बुन्देली भाषा)

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★★★★ बडे जतन से  जोरे रूपैया  ब्याह करन को  सयानी बिटिया  आग लगे जा माहमारी मे  सबरे मिट गये हमाय रूपैया  कासे लाय दान दहेज  कैसे निपटाय सियानी बिटिया  चूल्हे की आग जलाये काय से  कछु समझत नही आवै भैया  गरीबी मे कर द ओ  आटा गीलो मोरो भैया  रोजनदारी छूँटी सारी  फटे उन्ना पहने फिरे बाल बच्चा  नैक दया दो करो गिरधारी  दैखात नही तुम्हे विपदा हमाई  कैसे पालनहार कहावत  आँखे मीचे बासुँरी बजावत  सुन लो अरज नोने से मोरी  हे बंशीधर बाँकेबिहारी । ✍️,,,मीनाक्षी शर्मा

मेरे पिता मेरा गुरूर (कहानी भाग एक)

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पापा मेरे पापा कितने प्यारे प्यारे तुम ... मुन्नी मेरी मुन्नी आँखो का तारा तुम .. पापा ओ पापा ....मेरे पापा..... ..... बस कर बेटा ,बहुत नाच गा लिया आज हमने और तुमने ,चलो चलते है जरा किचन मे अब अपनी प्यारी बिटियां के लिये आज क्या स्पेशल डिश बनाऊँ मै । नही पापा ,रूको मै बनाती हूँ आज ,आपके लिये कुछ स्पेशल आपकी पंसद का नाश्ता । पाँच बर्षीय मनु ने अपने पापा के गले मे बाँहे डालते कहा ...और मन ही मन अपनी माँ की तरह रौब जमाने लगी पापा पर । राघव गुप्ता जो पेशे से इंजीनियर है और घर ,आँफिस दौनो को बखूबी सभाँलते है अभी दो महीने पहले उनकी पत्नी रजनी कैंसर,की  बीमारी  से चल बसी ।तब से राघव माँ और पिता का दायित्व बखूबी निभा रहे है । पापा ओ पापा ,कहा खो गये आप ,...मनु  ने कहा - अरे कुछ नही बेटा । तो फिर चुप क्यो हो गये हो ,मम्मी की याद आ रही है क्या  बोलो ,बोलो ,पापा  दादी अम्मा मेरी अब बस भी करो ,और चलो किचन की ओर जहाँ बनाते है आज गुलाब जामुन मजेदार । मनु  खिल खिलाकर हँसती है और पापा के साथ किचन मे जाती है । पापा आपको गुलाब जामुन बनाना आता है ।मनु ने कहा.- राघव ने...

मेरे पिता मेरा गुरूर

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पापा कहाँ जाते है  देह से विलग  आत्मा मे समाये रहते है  जब भी घबराता है मन मेरा  विचारो से हिम्मत भरने  चले आते है । मन की आँखो से देख लेती हूँ  जैसे समझाते थे ,समझ लेती हूँ  और मन ही मन हल ढूँढ लेती हूँ  पापा,हर आदत मे ,स्वभाव  झलक आते है ,और पास होने का  आभास करा देते है । ये जो लिख रही हूँ लेखनी से मै  ये उन्ही का गुण है जो हमे मिला  वरिष्ठ कवि ,लेखक ,मंच संचालन  सभी खूबियो से सुशोभित थे  भावनाये हमे भी दे दी और  कहते थे ,मेरी याद आये तो मेरी  कविताये तुम पढ लिया करो  भावो से मिलता रहूँगा तुमसे  दूर कहाँ जाऊँगा .... लेखनी से लिखने का हुनर दे दिया  भावो से मेरा मन ऐसा भर दिया  पता ही नही चलता  कैसे लिख जाती है कविता ... बस मन मे अपार खुशी दे जाती कविता  जैसे पापा मिलने आ जाते हमसे  मेरे हाथो से भाव सजा जाते हो जैसे  पापा ..कहाँ जाते है ,देह से विलग  आत्मा मे समाये रहते है  पल पल याद रहते है ,अपनी आदतो  मे ,हँसी मे ,चेहरे मे झलक आते है  हौल...