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किसान की दुल्हन

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लहलहाती ये फसल किसान की नहीं दिखती दुलहन कहीं से कम। पीले खिलते है सरसों के ये फूल लटक रहे जैसे कानों से कर्णफूल। घूँघट सी हैं उठती गिरती  जब भी ये गेहूँ की बालियां। लगता है जैसे बैठी हो घेरकर दूल्हे की सैकड़ों ही सालियां लहराते है पवन के झोकों से मक्के के सुनहले फूल ऐसे। गोरे मुखड़े से लटक रहे हो गोरी के घुंघराले बाल जैसे। हिलती हैं बाजरे की ये कुछ गदरायी सी बालें ऐसे। लगता है नवेली दुल्हन ने दिया हो स्वीकृति मौन जैसे। मूंग-उड़द की सूखी फलियां करती है जब भी चन-चन। आंगन में चलती दुल्हन की पायल बजी हो छम-छम। जब पीले-बसंती फूलो से प्रकृति खुद को सजा रही हो। लगता है जैसे दुल्हन कोई अब महावर लगा रही हो। स्वरचित-सूर्येन्दु मिश्र

दें कैसे हम बधाई बोलो पहले की तरह

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मेरे पड़ोस में कुछ बच्चे थे खेला करते गलबहियां बनाते धमाचौकड़ी थे करते जब आयी महामारी तो नजारे बदल गए चंचल-मन बच्चे किसी कोनें में दुबक गये लगती है गली मेरी बियावान की तरह दें कैसे हम बधाई बोलो........... रामू के घर एक दिन बारात जब थी आई खुशियों का था आलम गूंजी थी शहनाई उस पिता के पूरे बाकी अरमान हो रहे थे दिल भाइयों के मानो बांसों उछल रहे थे टूटा तभी था परिवार पर कोरोना का कहर दें कैसे हम बधाई बोलो............. कल्लू का ठेला लगता शहर के चौक पर मजा पूरी-पानी का लेते सभी ठहर कर ठेला बढ़ा कर जब वह घर को लौटता था टॉफी-चप्पल-खिलौने बच्चों को बांटता था पिछले महीने गुजर गया खाली है वो जगह दें कैसे हम बधाई बोलो ................... मंगरु का बेटा शहर में ऑटो चलाया करता उसके पैसों से खर्च माँ बाप का था चलता जब संक्रमित हुआ तो ऑटो भी बिक गया थोड़े दिनों बाद चिराग वो घर का बुझ गया बहती है आंख बुढ़िया की झरनें की तरह देते कैसे हम बधाई बोलो पहले की तरह स्वरचित व मौलिक-  *सूर्येन्दु मिश्र 'सूर्य'

जीना पड़ जाता है

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ये जीवन है, ये चलता ही चला जाता है कोई आके यहां, आँखों मे बस जाता है यादों का क्या है,वो अक्सर टकराती हैं कोई पल ऐसा, जो आके ठहर जाता है कई बार आदमी जब अकेला होता है साथ किसी का दर्दे-दवा बन जाता है भुलाए से ना भूलते वे दिन-सुबह-शाम पर वक्त के साथ हर निशां धुल जाता है लगता था ना जी पायेंगे जिसके बिना हम जीना अक्सर बिना उसके ही पड़ जाता है स्वरचित व मौलिक ~ सूर्येन्दु मिश्र 'सूर्य'

"पानी जरूर डाल देना"

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 •••••••••••••••••••••••                  अभी जब मैं मां के लगाए हुए फूलों के बगीचे में बैठा हूं तो हवा के झोंको से हरसिंगार के छोटे-छोटे फूल टूट-टूट कर गिर रहे हैं.... ऐसा लगता है जैसे वे मां को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। इन छोटे-छोटे फूलों की महक में मैं मां की आत्मा की सुगंध बखूबी महसूस कर रहा हूं। आंखों में उमड़ रहे आंसुओं को रोकना अब मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। गीले हो चुके कागज के पन्नों को हटाकर मैं जब दुबारा लिखने बैठा हूँ तो समझ में नहीं आ रहा है कि कहां से शुरू करूँ? इस छोटे से शहर में पिताजी के द्वारा बनवाए गए मकान में मेरे बचपन का काफी हिस्सा बीता है। इस मकान को पिताजी ने तब बनवाया था जब हम चार भाई-बहन अपनी पढ़ाई कर रहे थे। एक अध्यापक की नौकरी, जो की विशुद्ध रूप से एक नंबर की कमाई की थी, उसमे से मां ने एक-एक पैसा जोड़कर अपना सहयोग दिया था तब जाके यह मकान पूरा हुआ था। धीरे-धीरे समय के साथ हम सभी भाई-बहन बड़े हो गए, बहनों की शादी हो गई और हम दोनों भाइयों ने भी अपनी नौकरी की सुविधा के अनुसार अपने अपने आशियाने बना लिये।...

रूठा है संगीत

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गमों की बारिश में भीगा है तन टूट गए हैं वीणा के वो तार, रूठा है संगीत मन का अभी  पीछा करती हैं तनहाइयाँ बार-बार। इंतजार करना होगा अभी शायद, पुरानें लम्हों के फिर लौट आनें का। अमराइयों में कोयल के गानें का, सावन की घटाओं के घिर आनें का। स्वरचित- सूर्येन्दु मिश्र