दें कैसे हम बधाई बोलो पहले की तरह

मेरे पड़ोस में कुछ बच्चे थे खेला करते
गलबहियां बनाते धमाचौकड़ी थे करते
जब आयी महामारी तो नजारे बदल गए
चंचल-मन बच्चे किसी कोनें में दुबक गये
लगती है गली मेरी बियावान की तरह
दें कैसे हम बधाई बोलो...........

रामू के घर एक दिन बारात जब थी आई
खुशियों का था आलम गूंजी थी शहनाई
उस पिता के पूरे बाकी अरमान हो रहे थे
दिल भाइयों के मानो बांसों उछल रहे थे
टूटा तभी था परिवार पर कोरोना का कहर
दें कैसे हम बधाई बोलो.............

कल्लू का ठेला लगता शहर के चौक पर
मजा पूरी-पानी का लेते सभी ठहर कर
ठेला बढ़ा कर जब वह घर को लौटता था
टॉफी-चप्पल-खिलौने बच्चों को बांटता था
पिछले महीने गुजर गया खाली है वो जगह
दें कैसे हम बधाई बोलो ...................

मंगरु का बेटा शहर में ऑटो चलाया करता
उसके पैसों से खर्च माँ बाप का था चलता
जब संक्रमित हुआ तो ऑटो भी बिक गया
थोड़े दिनों बाद चिराग वो घर का बुझ गया
बहती है आंख बुढ़िया की झरनें की तरह
देते कैसे हम बधाई बोलो पहले की तरह


स्वरचित व मौलिक-
 *सूर्येन्दु मिश्र 'सूर्य'

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