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चाँद से नज़र

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     ऐसे शब्दों को तुम पिरोया ना करों.... २) पानी में शराब को मिलाया ना करों....  हम भुल जाते है खुद को भी....२) तुम यूँ सामने आया ना करो....२)       वो आईना तुमको समझ बैठगा.....२) यूँ चाँद से तुम नज़र मिलाया ना करों....२)           सही को सही कहने का हुनर रखो....२) हर बात पे, हर बात पे यूँ सिर हिलाया ना करों.... कोई देख लेगा आते हुए तुमको....२) चांदनी रात में तुम मिलने आया ना करों....२) ऐसे शब्दों को तुम पिरोया ना करों.... २) पानी में शराब को मिलाया ना करों....                  आरती सिरसाट               बुरहानपुर मध्यप्रदेश           मौलिक एवं स्वरचित रचना

ये जिन्दगी

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क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... हम टूटे है हर तरफ से हर तरहां से  क्या क्या अब तुझे बताऊं ये ज़िन्दगी.... कितना सुनाऊं, कितना समझाऊं तुझे ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... जब भी उड़ना चाहूं मैं  तूं मेरे सिर से मेरा आसमां छीन लेती है....२) छांव देखकर जिस राह से मैं चलूं तूं उन राहों में पत्थर गाड़ देती है.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... ज़ख्मों पर मरहम तो लगाना आता नही है तुझे ये ज़िन्दगी.... फिर क्यों हजारों दर्द तूं दे जाती है ये ज़िन्दगी.... कभी मेरी एक भी बात तो तूं सुनती नही है ये ज़िन्दगी.... फिर क्यों इतना मुझे तूं सुना जाती है ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए जा रही है ये ज़िन्दगी.... तेरा मेरा साथ तो है बहुत पुराना ये ज़िन्दगी.... बेपनाह नफ़रत का बीज कैसे बोया तूने ये ज़िन्दगी.... क्यों इतने इंतिहा लिए जा रही है ये ज़िन्दगी.... क्यों इतना परेशान किए...

मुझे पसंद है

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मुझे पसंद है...! पतझड़ का मौसम...!! मुझे पसंद है...! अकेलापन...!! मुझे पसंद है...! उदासीनता...!! मुझे पसंद है...! तन्हाईयां...!! मुझे पसंद है...! खामोशियां...!! मुझे पसंद है...! रेगिस्तान...!! मुझे पसंद है...! काली घनी रातें...!! क्योंकि मुझे पसंद हो तुम...! क्योंकि मुझे पसंद है तुम्हारा हर सितम...!!            आरती सिरसाट         बुरहानपुर मध्यप्रदेश       मौलिक एंव स्वरचित रचना।

बचपन की दोस्ती

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बचपन की दोस्ती कैसे पीछे रह गई.... बातें वो पुरानी न जाने कहा खो गई.... न जाने कहां छूट गया वो बचपन हमारा वो कागज़ की कश्ती और बारिश का पानी..... न जाने कहां छूट गया वो बचपन हमारा वो दादाजी की सीख और दादीजी की लम्बी कहानी.... बचपन की दोस्ती कैसे पीछे रह गई.... वो मासूम सी शैतानियां न जाने कहां छूट गई.... दोस्ती हमारी कही किसी  मोड़ पर जाकर छूट गई होगी.... शायद वो हम से किसी  बात पर रूठ गई होगी.... बचपन की दोस्ती कैसे पीछे रह गई.... बातें वो पुरानी न जाने कहां खो गई....           आरती सिरसाट      बुरहानपुर मध्यप्रदेश मौलिक एवं स्वरचित रचना।

कैसे मान लूँ

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कैसे मान लूं.... कि तूं मेरा नहीं.... कैसे कह दूं कि जो रातों में आता है  वो ख़्वाब तेरा नंही.... कैसे मान लूं.... कि यादों में तूं नहीं.... कैसे कह दूं कि आंखों में मेरी चेहरा तेरा नहीं.... कैसे मान लूं.... कि बातों में मेरी तूं नहीं.... कैसे कह दूं कि आता जाता ख्याल तेरा नहीं.... कैसे मान लूं.... कि अब तूं मेरा नहीं.... कैसे कह दूं कि जो लिखा है वो एक सपना है हकीकत नहीं....       आरती सिरसाट   बुरहानपुर मध्यप्रदेश मौलिक एंव स्वरचित रचना।

जरूरत नही

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मैं तुम से दूर ही सही तुम भी मेरी यादों को खुद से दूर ही रखना, मेरे ख्वाबों में भी अब तुम्हें आने की कोई जरूरत नहीं....! तुम रहने दो अपना मरहम अपने पास मुझे अब इसकी कोई जरूरत नहीं....!! ग़र गलती से भी कोई किया गया वादा तुम्हें याद आएं तो उसे कसम मेरी दे देना तुम्हें मुझे झूठा दिलासा देने की कोई जरूरत नहीं....!!! मैंने कर ली है दर्दों से दोस्ती तन्हाई, उदासी, ये सब मेरी पक्की सखियां अब बन गई है ये सब मेरे साथ ही रहती है मुझे अब तुम्हारे प्यार की कोई जरूरत नहीं....!!!! तुम बना लेना अपना आशियाना, खुशियों की तुम पर बहार हो दुआ मैं यही करती हूं। मैं जी लूंगी बिना तुम्हारे मुझे अब धरती और आसमां की कोई जरूरत नहीं....!!!!!                कु. आरती सिरसाट              बुरहानपुर मध्यप्रदेश        मौलिक एंव स्वरचित रचना।

मोहब्बत हो रही है।

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मुझे तेरी जरूरत हो रही है.... एक तूं ही मेरी आदत हो रही है.... आंखों से तुम्हारी देखो जरा, आंखों से मेरी शरारत हो रही है.... टकराने लगी हूं दिवारों से दिन के उजाले में, न जानूं मन में कैसी ये हसरत हो रही है.... निहारूं मैं आईना रोजाना जमाने में देखो कयामत हो रही है.... जागने लगी हूं अंधेरी रातों में मुस्कुराऊं अकेले में, कहें रातें मुझसे ख्यालों में ही तुमसें बात हो रही है.... क्यों करना मिलने का कोई बहाना नींदों में ही तुमसे मुलाकात हो रही है.... संभालें से ना संभले ये नादान दिल मेरा, मुझे धीरे धीरे तुमसे मोहब्बत हो रही है....               कु. आरती सिरसाट             बुरहानपुर मध्यप्रदेश

कीमत

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आज फिर वही सब्जी..... मम्मी मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि मुझे करेला बिल्कुल भी पसंद नही, फिर भी आप वही मेरे सामने ले आती हो....  जाओ मुझे नहीं खाना, नीता खाने की थाली गुस्से से अपनी मम्मी की तरफ खिसका देती है और वहां से गुस्से से अपने कमरे में चली जाती है। कुछ समय बाद.... जब नीता अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखती है तो उसे दिखाई देता है की एक छोटी सी बच्ची सब्जियां बेंच रही होती है और लोगों से खरीदने की अपील भी कर रही है। नीता यह दृश्य देखकर भावुक हो जाती है और नीता की आंखों में से आंसू निकल आते है। नीता को करेले की कीमत भी आज पता चल जाती है।                     आरती सिरसाट                 बुरहानपुर मध्यप्रदेश

तुम्हारी जुदाई में

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तुम्हारी जुदाई में आंखों से आंसू ही नहीं बहे।। एक वक्त बाद। ! आंसुओ के साथ बहे तुम्हारी यादें.... तुम्हारी बातें.... वो मुलाकातें.... वो जगाती रातें.... और बह गई वो सब उदासियां। बह गई वो सब बैचेनीयां।। बह गई वो सब परेशानियां।।। बह गई वो सब दुरियां।।।। ! और बहते- बहते ठहर गएं वो आंसू मेरी कलम में आकर.... उतरने लगीं वो सारी बातें कागज़ पे समाकर.... और फिर मैं तुम्हें याद करने लगी.... तुमसे बात करने लगी.... अकेले में मुलाकात करने लगी.... सोकर फिर तुममें जागने लगी.... ! मुझे अच्छी लगने लगी उदासियां.... सखी बन गई बैचेनीयां.... समझाने लगी परेशानियां.... पास रहने लगी दुरियां.... फिर मैं प्रेम के उस द्वौर में चली गई जहां प्रेम ने मुझे प्रेम समझायां था। ! और मैं समझ गई कि प्रेम को कभी  समझा ही नहीं जा सकता है....! प्रेम को बस प्रेम से जिया जा सकता है  महसूस किया जा सकता है....!!                आरती सिरसाट              बुरहानपुर मध्यप्रदेश        मौलिक एंव स्वरचित रचना।

कागज़ के फूल

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तुम्हारे प्यार की महक उनमें छाने लगीं है...... कागज के फुल से भी अब खूशबू आने लगीं है...... धूल में लिपटे पड़े थे बरसों से किसी अलमारी में,  छूते ही बोल पड़े, न कर आजाद इस धूल से जान मेरी जाने लगीं है...... रहना चाहूं मैं इसी जेल में, जो लगेगा हाथ तुम्हारा, तुम मुझे तोड़कर फैक दोगें, सोच- सोचकर चाहतें मेरी बिखरने लगीं है...... छेड़ रही है पवन की पुरवाई, टूटने पर मुझे मजबूर कर रही है देखों जुदाई के गीत वो गाने लगीं है...... रहने दो मुझे कागज ही फूल मत बनाओं जज्बातों से भर दो मुझे, कलम भी अब कहने लगीं है...... ये कैसीे मौहब्बत में मोह माया छाईं है गुलाब में काँटे और कागज के फूल से खूशबू आने लगीं है......                   आरती सिरसाट        बुरहानपुर मध्यप्रदेश

तूँ ही तूँ

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तूँ  है मेरी रातों में..... तूँ  ही  तूँ मेरी बातों में...... हो....ओ..... तूँ ही तो है बरसातों में..... हो....ओ..... तूँ ही तो है बरसातों में..... तूँ  है मेरी रातों में..... तूँ  ही  तूँ मेरी बातों में...... हो....ओ...... ****************************** देख रही हूँ ख्वाब तुम्हारा..... नींदों में जागकर..... कर दो ना तुम भी अरमान हमारा..... पूरा करीब आकर...... तूँ ही तो तूँ है मेरे जज्बातों में...... हो.....ओ...।।। तूँ ही तो तूँ है मेरे जज्बातों में...... तूँ ही तो है बरसातों में..... हो....ओ..... तूँ ही तो है बरसातों में..... *********************************** जागी जागी आँखें मेरी  राह तुम्हारी ही तकें..... पलकें बिछाई रखी है मैंने नयन हमारे किसी राह से तो मिल सकें...... हो....ओ...... तूँ  ही  तूँ  है मेरी यादों...... तूँ ही तो है बरसातों में..... हो....ओ..... तूँ ही तो है बरसातों में..... *********************************** तूँ  है मेरी रातों में..... तूँ  ही  तूँ मेरी बातों में...... हो....ओ..... तूँ ही तो है बर...

खूबसूरत है

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खूबसूरत है..... सात रंगों से सजा हुआ इन्द्रधनुष..... खूबसूरत है..... नदियों की कलकल करती आवाज..... खूबसूरत है...... उदय होती प्रभाकर की किरण..... खूबसूरत है...... क्षितिज पर ढ़लता आफ़ताब...... खूबसूरत है...... चाँद की शीतल चलन...... खूबसूरत है...... बरसात की बूंदें खूबसूरत है...... वसुंधरा की हरी चादर खूबसूरत है...... भोर को जगाती कोयल की वाणी...... खूबसूरत है..... पवन की मनभावन लहर...... खूबसूरत है...... गाँव की मिट्टी की खूशबू....... खूबसूरत है...... वन में नाचता मोर...... खूबसूरत है...... पेडों से लिपटी लताओं की डोर....... खूबसूरत है...... तुम्ही से नारायण ये सृष्टि....... क्योंकि.....तुम बसते हो प्रकृति के कण कण में......              आरती सिरसाट           बुरहानपुर मध्यप्रदेश      मौलिक एवं स्वरचित रचना

नादान दिल ‌‌

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ये दिल तूँ फिर क्यों ऐसी इबादत कर रहा है...... इक बेवफ़ा से फिर क्यों तूँ मौहब्बत कर रहा है...... बिखरा बिखरा सा है हर एक पल तेरा फिर क्यों तूँ सँवारने की झूठी हरकत कर रहा है...... मैं तो भुलने की कोशिश में हू उसे फिर क्यों तूं यादों में लाने की शरारत कर रहा है...... देखकर तुम्हें वो तो अपनी नज़र कहीं ओर फेर लेता है फिर क्यों तूँ बात करने की बात कर रहा है...... मान भी जा अब ऐ नादान दिल बार बार क्यों तूँ  उसी से ख्यालों में मुलाकात कर रहा है......            कु. आरती सिरसाट            बुरहानपुर मध्यप्रदेश

विचार

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जब आपको लगे की आप अकेले पढ़ गये हो, आपके पक्ष में कोई भी नहीं है तो तब समझ जाना की जिन्दगी आपको जीना सिखा रही है। और जिन्दगी से सिखने का यह अवसर कभी नज़रंदाज़ न करना। जिन्दगी कभी न कभी तो इंसान को इस मोड़ पर लातीं ही है। इन हालातो का डट कर सामना करे। इन हालातो में आपको बहुत कुछ सिखने को मिलेगा। और सारी दुनिया आपके विरुद्ध होगी। तभी तो आपको अपनी जीत का असली आनंद प्राप्त होगा।                 आरती सिरसाट

सोच रही हूँ

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सोच रही हूँ एक खत लिखूँ तुम्हें....! मन में दबी सारी मौहब्बत लिखूँ तुम्हें....!!   क्या तुम पहचान पाओगें खत मेरा, पता जो मैं मेरी कायनात लिखूँ तुम्हें.... जब भर जायेगा वो कौरा पन्ना आँसुओं से मेरे, उन्हे अल्फाज़ या मेरे जज्बात लिखूँ तुम्हें.... सुनकर आवाज तुम्हारी मैं खो जाती हूँ तुम्ही में, सकून का पल हो तुम या मेरे मन की बात लिखूँ तुम्हें.... पल- पल कैसे बीत रहा है जीवन खबर नही मुझे, सोच रही हूँ मेरी जरूरत लिखूँ तुम्हें....          आरती सिरसाट          बुरहानपुर मध्यप्रदेश

"फकीर तुम्हारे गाँव में"

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आओं लेकर चलें तुम्हें एक ऐसे गाँव में....... जहाँ आज भी खटिया बिछीं रहतीं है नीम की छाँव में...... क्या तुम्हारे गाँव की धरा को भी पुजा जाता है  ऐसे ही बिन पहने चप्पल पाँव में........ क्या फकीर तुम्हारे गाँव में भी ऐसा होता है....... रातें के अंधेरे में मौन रहकर कोई बालक रोता है....... जैसे पुकारते है..... मुझे मेरे दादाजी के नाम से....... क्या तुम्हें भी तुम्हारा गाँव  तुम्हारे दादाजी के नाम से पुकारता है........ क्या फकीर तुम्हारे गाँव में भी ऐसा होता है....... दादी की परीयों वाली कहानी और पेडों पर तोता है...... जहाँ गाती है नदियाँ........ आज भी घोसला बनाती है पेडों पर गौरय्या....... क्या तुम्हारे गाँव की गलियों में भी  बाँसुरी बजाता है कोई कन्हैया....... क्या फकीर तुम्हारे गाँव में भी ऐसा होता है....... पंछी आजाद है और कहां जाता नदियों को माता है...... करती है सौलह श्रृंगार वसुंधरा भी  जब आकाश प्रेम की बरसात करता है...... पत्तों की गोद में जाकर बैठ जाता है  बनकर मोति एक बूंद चमकता है...... क्या फकीर तुम्हारे गाँव में भी ऐसा होता है....... बनकर जुगनू कोई जीव र...

सुन सको तो सुनों

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सुन सको तो सुनों दिल ये मेरा क्या कहता है....! बनकर धड़कन देखों तुझमें ही तो रहता है....! फुरसत से कभी इन हवाओं के झोकों से पूछ लेना,  बस एक तुम्हारा ही तो नाम मेरे मन में भरता है....! रोजाना करता है बातें तुम्हारी न जाने फिर क्यों  ये दिल मेरा, सामने तुम्हारे आने से डरता है....! अब कहाँ से लाए हम तुम्हारी तारीफ़ में कोई शब्द तुमकों देखकर तो खुद आईना भी सँवरता है....! ये सावन की बूंदें सुनों उनसें जाकर ये कहना इश्क़ उनका आज भी आँखों से आँसू बनकर बहता है....!      कु. आरती सुधाकर  सिरसाट       बुरहानपुर मध्यप्रदेश

मैं हिन्दुस्तान से हूँ

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मान मेरा हिन्दी है.... सम्मान मेरा हिन्दी है.... हिन्दी ही तो मेरी भाषा है.... बन जाएँ ये राष्ट्र भाषा इतनी ही मेरी अभिलाषा है.... अंग्रेजी में न मुझसे वार्तालाप करना तुम.... मैं हिन्दुस्तान से हूँ.... मुझसे हिन्दी में ही बात करना तुम.... गर्व से मैं हिन्दू कहलाऊंगा.... पहचान मैं अपनी हिन्दुस्तान ही बताऊंगा.... सजा कर लबों पे अपने हिन्दी की वर्णमाला रखता हूँ.... मैं बार बार यही दोहराते रहता हूँ.... अंग्रेजी में न मुझसे वार्तालाप करना तुम.... मैं हिन्दुस्तान से हूँ.... मुझसे हिन्दी में ही बात करना तुम.... एक लेखक की कलम में है हिन्दी.... कई कौरे कागजों में छिपी है हिन्दी.... हिन्दी से ही तो मेरी पहचान है.... हिन्दी ही हिन्दुस्तान की शान है.... अंग्रेजी में न मुझसे वार्तालाप करना तुम.... मैं हिन्दुस्तान से हूँ.... मुझसे हिन्दी में ही बात करना तुम.... आओं हिन्दी का सार तुम्हें समझा दूँ.... मैं हिन्दी का अर्थ तुम्हें बता दूँ.... अभिमान है हिन्दी मेरा.... स्वभिमान है हिन्दी मेरा.... अंग्रेजी में न मुझसे वार्तालाप करना तुम.... मैं हिन्दुस्तान से हूँ.... मुझसे हिन्दी में ही बात करना त...

"हम ही आज है, कल भी हम ही है"

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हम ही आज है, कल भी हम ही है......! हम ही रीत है, रिवाज भी हम ही है......!! हम ही आजादी है, बेडियां भी हम ही है......! हम ही पंछी है, पिजरा भी हम ही है.....!!    हम ही अभिमन्यु है, चक्रव्यूह भी हम ही है.....! हम ही मोहन है, बाँसुरी भी हम ही है.....!! हम ही पेड़ है, कुल्हाड़ी भी हम ही है......! हम ही नफ़रत है, प्रेम का प्रतीक भी हम ही है......!! हम ही तो आशा है, निराशा भी हम ही है......! हम ही तो पाप है, पून्य भी हम ही है......!! हम ही नदियों की कलकल है, अशुध्दियाँ भी हम ही है......! हम ही आस्तिक है, नास्तिक भी हम ही है......!! हम ही छल है, निच्छल भी हम ही है......! हम ही विध्या है, अनपढ़ भी हम ही है......!! हम ही धूप है, छाँव भी हम ही है......! हम ही शहर है, गाँव भी हम ही है......!! हम ही गीता है, कुरान भी हम ही है......! हम ही अपराध है, कानून भी हम ही है......!! हम ही सत्य है, असत्य भी हम ही है......! हम ही अधर्म है, धर्म भी हम ही है......!! हम ही शहद है, नीम भी हम ही है......! हम ही राजा है, फकीर भी हम ही है......!! हम ही जानकी है, सुपर्णखा भी हम ही है......! हम ही रावण ह...

जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा..

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तुम्हें नफ़रत से भी प्रेम हो जाएगा......! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!! छोड़ दोगें जिद्द हमें पाने की.......!!! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!!!! ना रहेगा जीवन में तुम्हारे......! किसी भी मोह का साया......!! ना कोई दर्द तुम्हारे जीवन में आएगा......!!! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!!!! चाहोगे देकर आजादी हमें......! ना किसी बंधन में बाँधने की कोशिश करोगें......!! सारा समां तब प्रेम के रंग में रंग जाएगा......!!! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!!!! सुनाई देगी तुम्हें बातें भी वो सारी......! जो हमनें मन में कहीं होगी......!! तुम्हारा दिल भी तब गीत हमारा गाएगा......!!! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!!!! समझ जाओगे प्रेम का अर्थ......! बंद आँखों से भी हमें तब देख पाओगे......!! एक दिन समय ऐसा भी आएगा......!!! जब तुम्हें प्रेम हो जाएगा......!!!!      कु.आरती सुधाकर सिरसाट      बुरहानपुर मध्यप्रदेश