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बचपन की कश्तियां

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 नन्नू जल्दी अंदर आ अभी के अभी, नहीं आया ना तू तो मैं बाहर आकर खूब मारूंगी...... सुना नहीं तूने, मां की आवाज सुनकर नन्नू को कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा बस एक बार अंदर की ओर झांक कर वापस अपनी नावों को बहते हुए पानी में चलाने लगा कुछ ही देर में सविता बाहर आ ही गई | हाय राम! (खींच के एक थप्पड़ जड़ दिया) फिर क्या नन्नू लगा रोने सविता बड़बडाये जा रही है अपनी ही धुन में अब क्या करूंगी मैं कहां से लाऊंगी तेरे लिए कॉपी और यह किताब इसकी भी नाव बना डाली तूने कितनी मुश्किल से इस बार तेरे शराबी बाप से कुछ पैसे बचाये थे तेरे जूतों के लिए रोज रोज स्कूल में यही कह कर आती हूं कि अगली बार जूते पहनाकर भेजूंगी तुझे,बोलता क्यों नहीं क्यों बनाई इतनी नावे पूरी किताब की (खींच कर अंदर ले आती है) और अब बीमार मत पडना कहां से लाऊंगी दवा डांटते  हुए सविता नन्नू के कपड़े बदलती है, बालों को रगड़ कर पौछती है | सात साल का नन्नू अपनी मां के साथ एक कमरे के मकान में रहता है उसी में पूरी दुनिया है उनकी बाप का मन करे तो घर आ जाता है वरना पड़ा रहता है कहीं पीकर नन्नू को बारिश बहुत पसंद है खासकर पानी में नाव च...

'देह'

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रात के सन्नाटे में  ना धर्म होता है मेरा कोई  पूछे ना जाति कोई  नाम काम से ना कोई वास्ता  चीखे होती है मासूम सी  निरपराध सी आंखें मेरी  तार-तार होती है देह मेरी  उस दिन सच में रात काली  चांद तारों की बिखरती कहानी  सुबह होती है सबकी पर मेरी नहीं  सुर्खियां बटोरती है काली रात मेरी  वो मोमबत्तियां जख्मों पर गिरती है मेरे  घावों को नासूर बना देती है  कभी सोचा है आपने वो पिघलता मोम  मेरी देह को अंदर तक कचोटता है  ना जलाएं इनको विनती है मेरी  राजनीति की आंच पे धर्म की रोटियां भी ना सेंके  वो काली रात बिना धर्म और जाति की होती है  फिर पापियों का धर्म और जाति कैसी  दोष धर्म और जाति का नहीं मानसिकता का है  या तो उसे बदलो या उखाड़ फेंको उसे जड़ से  आभारी रहूंगी सबकी मैं  पर चर्चा का विषय ना बनाओ मेरी देह को  जख्मी हूं मैं रूह तक  नमक ना लगाओ मुझे | प्रिया शर्मा "पंखुड़ी"