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Showing posts with the label Manju Ratre

" बारिश की बूंदे "

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रिमझिम - रिमझिम सी बूंदे , जग कर ,आंगन में आई ... अपने लघु उज्जवल तन में, कितनी है सुंदरता लाई... मेघों ने भी गरज गरज कर, मादक संगीत है सुनाया... ठंडी ठंडी हवा है चलती, चारों तरफ हरियाली छा जाती... वर्षा के यह मनमोहक बादल , लाते हैं रिमझिम बारिश का जल... रिमझिम बारिश की छंटा निराली, दे खुशियां , भर दे सबकी झोली.... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" सांझा चूल्हा "

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सांझा चूल्हा की बात निराली, संयुक्त परिवार की निशानी... जहां रिश्ते हैं बसते, माला सी पिरोए, संग संग है रहते, खुशी ,संग मुस्कुराते... चाची ,दादी ,मां संग, पकाती रोटियां, परस्ती सबको, निभाती जिम्मेदारियां... तीज त्योहारों पर पकवान है बनते संग संग खुशियों के गीत है गाते... खुशियों का हो आंगन, प्रेम से भरे हो द्वार एक साथ जो पीते चाय की प्याली, मिलकर करते सुंदर विचार.. सुख-दुख जहां संग संग है बांटते, सांझा चूल्हा, परिवार को है संवारते.... मंजू रात्रे (कर्नाटक )

" आशा की किरण "

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" आशा " जीवन में एक आशा की किरण, होना है जरूरी निराशा को हटाकर आशाओं के दीप जीवन में जलाए रखना है जरूरी.... मिटाकर मन के अंधेरे को, नव जीवन की ज्योति से जीवन को महकाना है सत्कर्म की राह में चलकर सद्भावना को हर जगह फैलाना है.... सारी बुराइयों को मार कर हम, आशाओं के दीप जलाएं करे बुलंद हम खुद को इतना हर चुनौतियों को पार कर जाए.... जीवन के हर संकटों से लड़ कर विजय का गीत हम गाये जीवन में आशाओं की किरण लाकर जीवन सफल हम बनाएं... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" सुहानी भोर "

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पीली सी चादर में, लिपटा हुआ नभ नवप्रभात लेकर आई भोर सुहानी... मध्यम मध्यम सूरज ने, लालिमा है बिखेरी आगाज हुआ सुहानी भोर का लेकर आई मन में उमंग तरंग... कुहू कुहू के गीत कोकिला फिरती गाती मोर का नव नृत्य हृदय को भाती पुष्प मंद मंद मुस्कान लिए स्वतंत्रता का कर रही आव्हान... देखो सुहानी भोर, फैला उजियारा चारों ओर सुख समृद्धि लेकर आए नई सुबह सुहानी भोर.... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" वृक्ष की आत्मकथा "

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बीज से पौधा बना, पौधे से बना पेड़ जमीन से जुड़कर फला फूला , मैं प्यारा सा पेड़... ईश्वर द्वारा प्रकृति का अमूल्य हूं वरदान, हरी भरी हरियाली, का हूं मैं प्रमाण... खाद मिली पानी पाया, ऐसे जीवन आया ऊपर बड़ा इधर, धरती के नीचे उधर समाया... तने, डालिया, फूल और पत्ते आए, पौधे से बना वृक्ष धरती पर लहराए... पत्थर खाकर भी फल मैं देता, प्राण वायु हर पल देता... खुद धूप में खड़ा रहता, पथिक, पक्षियों को छाया मैं देता... आओ मिलकर वृक्ष लगाएं कर्मवीर बन, धरती को स्वर्ग बनाए... जीवन सुखी बनाए हम आओ पेड़ लगाएं हम.. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" गरीबी "

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गरीबी इंसान को, लाचार है बनाती जो दिन ना देखें वो सब है दिखाती... चार दिवारी है, उन पे ना कोई छत ना ही कोई उम्मीद हवा के झोंके डंक चुभाये कुदरत की अपनी जिद... ना होते, तन ढकने को कपड़े, ना ही कोई बिस्तर ओस की ठंडी चादर ओढ़े  फुटपाथ पर है सोते... कहीं है लूट मचाते कहीं चोरी है करते एक निवाले की खातिर चारों ओर है भटकते... अपनी मन की इच्छाओं को, आसुओ में है छुपाते पड़े ना , रहना भूखा कल इस चिंता से डर जाते... गरीबी इंसान को, लाचार है बनाती जो दिन ना देखें वो सब है दिखाती... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" गोधूलि बेला "

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सूरज की किरणें, समेटे  अपने घर चला... प्यारी सी मुस्कान लिए दिखाएं अपनी कला.. धन्य हैं  गोधूलि बेला, थके हारे चरवाहों का घर जाने को है मन मचला.. पशुओं के पैरों से उड़ती धूल, धुंधला सा आकाश हुआ देख मन हर्षित हुआ... गोधूलि बेला, जो होती पक्षियों जो चहचहा रही लौटती अपने घर साथी के संग संग.. सिंदूरी लालिमा लिए, आसमान है सजा दृश्य प्रकृति का अनोखा मानो, अनंत आकाश पर प्रेम छवि दर्शा रहा.. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" हादसे "

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जिंदगी तजुर्बे की एक गठरी होती है, जिसमें जीवन जीने का अनुभव होता रहता है । जिंदगी का सफर तो यूं ही चलता है लेकिन, ना जाने किस मोड़ पर कब, कहां हादसे हो जाया करते हैं । जीवन में दुर्घटनाएं अनिश्चित होती हैं फिर भी इंसान अपना जीवन जीता है । जीवन और मृत्यु जिंदगी के दो पहलू हैं एक पल सुख तो दूसरे पल दुख का सामना करना पड़ता है । कभी कभी जिंदगी में कुछ, ऐसे हादसे भी होते हैं जिसे हम याद करना नहीं चाहते जो दुख और आंखों में नमी का कारण बनते हैं । हादसे, जिंदगी के लम्हों का  एक आईना होता है, जो हमें जीवन जीने का एक सही रास्ता दिखाता है । मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" बीता हुआ कल "

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बीता हुआ कल, चाहे हो सुख के या दुख के वापस नहीं आते रह जाती हैं बस उनकी यादें... बीते हुए कल में, याद जो आती है बातें सोचते ही मन में एक अलग सी मुस्कान है, आती... जीवन के इस दौर में, सुख-दुख के कितने पल है आते उन पलों को लेकर आज हम इस मोड़ तक है आते.. जीवन का यह चक्र निरंतर जीवन में है चलता बीते हुए कल को याद ना करके जिओ जी भर के, आज का दिन हर पल एक अलग अनुभूति है होती जो हमें जीवन जीना है सिखाती.... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" बेरोजगारी '

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आज का युग, बेरोजगारी से है तंग हर पढ़े-लिखे पर देते हैं सब व्यंग... आज का नौजवान,  नौकरी पाने की इच्छा है रखता नौकरी की तलाश में, दर-दर है भटकता... बेरोजगारी ने कर दिया, युवा जीवन को बर्बाद नशे की लत में डूब गया आज का समाज... बेरोजगारी ने पैसे का, मोल है बतलाया  बिजली,पानी, राशन हो गया महंगा सबको है समझाया... महत्वपूर्ण है शिक्षा, युवाओं को है समझाना उन्नत देश हो तभी हमारा बेरोजगारी की समस्या से हमे मुक्ति है पाना .. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" अभिमान "

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मत कर अभिमान, जीवन जो आया है कल वापस चले जाना है धन, दौलत, रूप ,ऐश्वर्य एक दिन छुट जाना है ... आज जो तेरा है, फिर कल किसी का हो जाएगा फिर किस बात का है गुमान तुझे मत कर अभिमान... अहंकार, झूठ, कपट से, भरा है, तन तेरा सुख कहां, तू पाएगा ना जाने कब क्या हो जाए मत कर अभिमान.… मानव तन, अनमोल मिला है ह्रदय को कर निर्मल प्रेम भाव मन में बसा ना कर किसी से बैर... जीवन में कर्म कर अच्छे, वही मार्ग बनाएगा रे बंदे, मत कर अभिमान... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

बाबूल का आंगन

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पापा की प्यारी परी, नन्हे नन्हे कदमों से घर आंगन को सजाती चांद सा चेहरा लिए मीठी मुस्कान से, मेरी बगिया को खिलाती ... हाथ पकड़ चलना, मैंने उसे सिखाया हर ख्वाहिशों को, उसने मुझसे पूरा है करवाया.. हो चली है अब बड़ी, थोड़ी सी नादान, थोड़ी है भोली मेरे आंगन की प्यारी सी चिड़िया अब पराई हो चली... दूर नहीं मैं तुझसे, साथ हूं तेरे है शुभ आशीष सदा, ससुराल की शोभा, तुम बनना मान सभी का बनना रिश्ते नाते संजोकर तुम सदा रखना.. जीवन में अपने , कर्तव्यों को पूरा तुम करना मेरी प्यारी परी, मेरा गुमान तुम बनना... मंजू रात्रे

" मां "

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" मां " शब्द में पूरी कायनात है समाती, मां जो  हजारों दर्द सह कर देती वो बच्चे को जन्म सुन, उसकी किलकारियों की आवाज  हो जाता पुलकित उसका मन... नम होती आंखें जब, हाथों में उसे लेती खुशी से तृप्त हो जाता उसका मन... " मां " जो चलना है सिखाती, अच्छे बुरे की समझ शिष्टाचार ,संस्कार ,सभ्यता है सिखाती ... जिंदगी के सफर में आती जो मुश्किलें, थाम कर हाथ, हौसले को है बढ़ाती... " मां " जो होता उसका मन निश्चल प्रेम से भरा, आशीष देने सदा बाहें है फैलाती... हम तो एक शब्द हैं, वो तो है पूरी भाषा हम कुंठित हैं, वो होती है एक प्यारी सी अभिलाषा... शब्द नहीं ऐसे , जो मां की महिमा कर पाए, क्योंकि " मां " शब्द में पूरी कायनात है समाए .. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" भूखमरी "

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कैसे वो अपनी जिंदगी, जिए जा रहे हैं ... आंखों में आंसू और दर्द, लिए जीवन जिए जा रहे हैं .. एक समय की रोटी के लिए, दरबदर है भटकते भूखमरी का है जाल ऐसा अपनी आंखों में बयां किए जा रहे हैं... गरीबी का है मंजर, चारों ओर है फैला, वो बच्चे अक्सर भूखे सो कर आसमां को ओढ़ें लिए जा रहे हैं .. भूखमरी जो कहीं पर, ऐसे हालात हैं पैदा कराते.. आत्महत्या, चोरी, लूटपाट के लिए मजबूर हैं किये जाते.. आखिर कब तक भुखमरी और गरीबी, इंसान के साथ रहेगा.. कब तक वो गरीब बच्चा खाने को तरसेगा.. एक  युद्ध हम सबको भूखमरी के नाम करना होगा.. पूरा देश हो सुरक्षित ऐसा काम करना होगा.. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" आप बीती "

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जिंदगी की राह में, कुछ ऐसे मोड़ आते है कुछ दर्द, कुछ हादसे धुंधले से बनकर रह जाते हैं .. जीने की एक नई उम्मीद में, कदम तो आगे बढ़ते हैं पर उस दर्द और हादसे की परछाइयां जीवन जीने नहीं देती... इंसान फिर भी जीता है, और अपनी आपबीती से निकल जीवन की नई शुरुआत करता है... मंजू रात्रे  ( कर्नाटक )

" हम तुम "

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मिले जो जिंदगी में " हम तुम " बन गए दोनों हमसफर... मंजिलें अब हमारी एक है जाना अब हमको एक डगर... यूं ही कटती रहे जिंदगी तेरी बाहों में साथ, हंसी चांद तारे हो, और हो लंबी रातें.. पलकें जब भी खोलू , सामने हो चेहरा तेरा कर ले बातें हम तुम, बूने ख्वाब सुनहरा... जीवन में जो आए तुम , बन गई तकदीर मेरी तुमसे ही मेरी खुशियां हो, तुमसे जिंदगी पूरी.. मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" भारतीय परिधान "

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हम भारतीयों की परिधान अनमोल, इनका किसी से नहीं तोल.. अलग-अलग संस्कृति हमारी पहचान, चाहे हो गांधी टोपी ,पगड़ी, फेटा और साफा .. हर देश में होता सुशोभित भारतीय परिधान, हर प्रांत का पहनावा, होती उसकी शान... सदियों से चला, पारंपारिक भारतीय परिधान, भाषा , भेष भोजन से हमारी पहचान.. परंपरा, उत्सव ,पर्व को शोभित है करते, लाज, सम्मान ,परिचय ,पहचान है कराते... रंग बिरंगे हमारे भारतीय परिधान, भारत को है सजाते... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" विरह की बेला "

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जाने की तारीख, नजदीक आते आते बेटे का मन यू चुपचाप से सोचे मां का आंचल छूट रहा व्याकुल मन है घबराया... शहर ,गलियां, घर छूट रहा, किताबें और कपड़े को सहेजता मन को है मनवाया... चला सपनों की उड़ान भरने मां , मैं हूं अब तैयार आंसुओं को अपने छिपाएं ले रहा मां का आशीर्वाद... मां बिल्कुल है स्तब्ध खड़ी , अपने लाल का माथा चूम रही अपने आंसुओं को छुपाए मां दुआएं बेटे को दे रही... कदम तेरे ना डगमगाए, मन को अटल कर रखना बाधाएं तो आएगी जीवन में हौसले बुलंद कर आगे कदम बढ़ाना... ख्वाब जो देखे है तूने, उन्हें पूरे कर, सफलता की सीढ़ी चढ़ते जाना मां की दुआएं साथ रहे सदा, जीवन में अपना जीवन सफल करते जाना... मंजू रात्रे  ( कर्नाटक )

" किस्मत "

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इंसान जो कोसता है, अपनी किस्मत को होता उसका भ्रम है.. साथ देती नहीं, हाथों की लकीरें कर्म ही उसका सबसे बड़ा धर्म है... मझधार में फंसी होती है जिंदगी कभी कभी.. खुद पतवार बनकर, साहिल तक पहुंचना पड़ता है.. जिंदगी तो एक पहिए के समान हैं, जो निरंतर चलता  जाता है.. इंसान अपनी किस्मत, अपने कर्मों से बदलता है... कर्म, धर्म और भाग्य, जिंदगी का रोचक खेल है.. जीवन में सबसे बड़ा होता है कर्म और धर्म होती है उसकी मजबूती दोनों अगर साथ हो तो बन जाता है, इंसान का नसीब... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )

" प्रयास "

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करो प्रयास अंतिम क्षण तक, फिर चाहे जो हो अंजाम जीवन के पथ में चलकर तुम पाना अनुभव का ज्ञान... पथ मुश्किलों से है भरे, पीछे ना रखना पावं आगे कदम बढ़ाते जाना लगा देना जीवन का दाव... उम्मीदों के पंख लगा कर, भर ले अपनी उड़ान वक्त आएगा ना दोबारा रखना जीवन में ध्यान... जितना तुम संघर्ष करोगे, उतना मिले परिणाम निरंतर चलना जीवन का चक्र है सफलता रूप, मिले इनाम... मंजू रात्रे ( कर्नाटक )