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Showing posts with the label सुमेधा शर्व शुक्ला

मेरी माँ

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कठोर बनकर घरदारी सिखाती है, अच्छे बुरे की पहचान हर कंदम पर करवाती हैं, मेरी नादानियों पर औरो की डाट चुपचाप सह लेती है, लेकिन इस बात का शिकवा वह कभी नही करती हैं।। जो सपने रह गए थे अधूरे उंसके, फिर से उन सपनो को बुनने लगी है, मुझे क़ामयाब बनाने लिए आज कल मेरे साथ चलने लगी है।। अक्सर रातों को मेरे साथ जगती है, किताबो में लिखी बातों को वह न के बराबर समझती, फिर भी मेरे साथ बैठकर पूरी रात मुझे तकती है।। घर मे लोग चाहे जितने भी हो  लेकिन घर को घर सिर्फ़ वह बनाती है, मैं चाहे जहा से आऊँ सबसे पहले मेरी नज़रे उसे ढूढ़ती है।। मेरी गलती पर सजा भी देती है,, फिर अकेले में सबसे छिपकर आँसू भी बहाती है।। मुझे कामयाब होता देख वो खुद को  कामयाब समझती है मुझे बेहतर बनाने का  प्रयास वह हमेशा करती है।।, दुनिया से नौ महीने ज्यादा वह मुझे जानती है दर्द का रिश्ता है तुझसे मॉ तू बिन बोले मेरे जज़्बात समंझ जाती है।। शब्द नही  है पास मेरे मॉ तेरा गुणगान करने को,,, शब्दो मे तुझे कैसे बाँधू कैसे तेरी तो कोई पार नही है।। रचनाकार,,, सुमेधा शर्व शुक्ला

जीवन एक अग्निपथ

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जीवन है एक अग्निपथ नित नए संघषो का मेला यहा जीने की जिसे चाह यहा भला उसे कौन रोक पाया है।। जीवन मे  न हो यदि सुख दुःख संगम तब तक इसका मोल  कहा कोई जान पाता है जब हुआ चुनौतियों से सामना तब अपनी ताकत का भान हुआ साहस है मुझमें कितना ये  अब कहा मैं जान पाया था अग्नि में जल कर ही कुन्दन तब खरा सोना कहलाता है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

बनकर तूफान वो आया था

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बनकर अपना वो गम ए जिंदगी में आया था शायद कोई सबक हमें जिंदगी का सिखाने आया था बड़े मासूम थे हम जो गैरो पर  यक़ी जल्द कर लेते थे उनकी कही बातो पर भरोसा हो जाया करता था वो भी उनमें से ही था जो दोस्त बनकर हमें छलने आया था बड़े शातिर थे ईरादे उसके हर बात को शांति से सुन लेता था लेकिन हमें क्या पता था  वो तूफान बनकर हमे ही तबाह करने आया है हम तो  हमदर्द समंझकर उल्फ़ते ए जिन्दगी का हर राज बताते रहे और वो अपना बनकर  हर कदम पर  हमे आजमाते रहे सीखा दिया धोखे  ने उसके मत कर यक़ी किसी अज़नबी पर जिन्हें अक्सर हम अपना समंझते है अक्सर वही  ज़ख्म गहरे छोड़ जाते है सुमेधा शर्व शुक्ला

मुहब्बत की साजिश

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बनकर अपना कोई ,बेगाना आया था, मुहब्बत की साज़िश कर हमे भरमाने आया था।। हम भी बनकर कठपुतली उंसके इशारो पर नाचते रहे, कहा जानते थे कि वो दिल बहलाने मेरे गलियों में आया था।। खेल खेला कुछ यूं उसने की,हर कोई उसका बनता गया, लाख खामियां थी उसमें लेकिन जमाना नजर अंदाज करता रहा।। बड़ी चतुराई से वह जाल बुनता था, मैं हूँ  तेरा हमदर्द वह हर किसी के कहा करता था,।। हम भी अपना समझकर उसे हर राज बताते रहे , ज़ख्म मिले थे जो अपनो से उसे सुनाते रहे, लेकिन वो था शिकारी जो अपनी बातों से बहला देता है, करके साज़िश वह फ़रेबी अपनी जीत पर जश्न मनाता रहा,,,।। ठगे से रह गए हम उसकी फेवफ़ाई देखकर, जो हर इल्ज़ाम पर कुसूरवार हमें ठहराता रहा।। सुमेधा शर्व शुक्ला

अखाड़ा

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शब्दो की मर्यादा अब कहा!! कहा बड़ो का सम्मान रह गया!! घर हो बाहर सब  राजनीति का अखाड़ा बनकर रख गया।। पद प्रतिष्ठा की लालसा में , रिश्तों का मोल कही खो सा गया, सहनशक्ति बस शब्दों तक सीमित लोक लाज की परवाह कहा!! क्या अंदर और  क्या बाहर  सब जगह जंग जारी है,,,, जिन्दगी बन गयी है अखाड़ा किसी एक ने भी हार न मानी है।। बुद्धि आवश्यकता नहीँ अब बाहुबली का जमाना है,, जिसके पास ताकत है ज्यादा उसी का बोलबाला है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

पिचासो की रानी निशिडाक

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भाय भाय करती रात घोर अंधकार का डेरा है, आगे पग कैसे धरू  भूतों का बसेरा है।।   सुना  है वो अपनो की आवाज में  सबको रिझाती है , पास जाओ उंसके अगर तो वह जिंदा नही छोड़ती है।। बड़ी बड़ी लाल आँखो से वह सोले बरसाती है, जान हलक में फस कर रह जाती है।।  पायल की छनछन से उंसके दिल दहल जाता है जब वह बन ठन कर रातों को निकलती है।।, इंसान क्या जानवर भी अपनी जान बचाकर भागते है। पिचासो की रानी निशिडाक, जब अपना शिकार करती है।। रक्तपान से उसकी तब  प्यास जाकर बुझती है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

सरहद के पार (मिलन)

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रेगिस्तान की तपती रेत,में एक बुढ़िया अपनी झुकी हुई कमर और कपकपाते हाथो में लाठी टेकते हुए चली आ रही थी,, ये सिलसिला उसका आज से नही पिछले पैसठ सालो से चला आ रहा था,, क्या गर्मी क्या बारिश ,और क्या ही तूफान उसे कभी कोई रोक नही पाया था,,,,मानो उसके आगे सब नमस्तक हो गए थे।।,,,,,,, शन्नो धीरे धीरे चल कर सामने कटीले तारो से बने बाउंड्री के पास आकर  खड़ी हो जाती,,,,देखने मे  ये बाउंड्री कोई आम सी लगती जो अमूमन लोगो के घरों के आस- पास बनाई जाती है,,, , लेक़िन  ये आम सी दिखने वाली बाउंड्री दो देशों को बांटने का काम करती है,,,,, शन्नो रोज तपती दोपहरी में आकर बॉर्डर से कुछ दूर पर आकर खड़ी हो जाती और एक टक अपनी डबडबाई आँखो से , बार्डर के उस पार देखने लगती ,, अब तो कोई फ़ौजी भी उसे न रोकता और न टोकता था,,,,  वह बावरी बुढ़िया घण्टो बैठकर बॉर्डर के उस पार देखती,,, दोनो देशों के सैनिको की भी आंखे नम हो जाती ,,,शन्नो की दशा देखकर,, लेकिन वो भी क्या कर सकते थे,,,वो तो बस अपना फ़र्ज़ निभा रहे थे,,,अपने  देश की सुरक्षा करके,,,, ,  ये जगह  शन्नो  लिए किसी मंदिर से कम ...

नारी का सम्मान

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बधाई नही अधिकार चाहिए मैं नारी हूँ, मुझे संम्मान चाहिए ।,। समान है जब हम दोनों तो फिर ये भेदभाव की बेड़िया क्यो,।। क्यो सब लोकलाज आयी मेरे हिस्से क्यो हर बंधन से आज तू सवाल वही मेरे पुराने है, लेकिन अब हर सवाल का चाहिए यदि मान बढ़ाना चाहते हो मेरा तो एक शुरुआत अपने घर से करो जिसकीं दुनिया तुझमे बसती है, पहले ख़ुद को उंसके नाम करो।। बेटी को भार न समझकर उसे अपना अभिमान कहो।। लक्ष्मी बनकर जिसने जन्म लिया है उसे तुम चंडी कहो, धधकती अंगारों से जब देखे वो, दरिंदों की ओर नजरे सब की झुक जाए उसकी आँखों मे तुम ऐसे सोले भरो।। खत्म करो संघर्ष उसका उंसके अस्तित्व की खोज में वही लक्ष्मी,वही सरस्वती, वही दुर्गा के रूप में, कभी बेटी तो कभी मॉ बनकर तुम्हे सँवारती है एक नारी  होती है गुणों की खान जो सबपर प्यार बरसाती है, दो पंख उसे विश्वास का उन्मुक्त गगन में उड़ने दो सिर ऊँचा जग में वो करेग बस उसे तुम्हारा साथ चाहिए।। सुमेधा शर्व शुक्ला

अंदाज अपना अपना

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इज़हार कुछ तरह हुआ इश्क़ का की अब दुनिया बेगानी सी लगती है जिन्हें कल तक जानतें भी न थे आज उनमें दुनिया हमारी बसती है।। बड़ा मनमौजी है मेरा महबूब मेरी एक नही सुनता है अक्सर करता वही हैं जो दिल उसका कहता है।। मुहब्बत बेसुमार है हमसे उसके जज्बातो से पता चलता है लेकिन जब भुलाने की बात हमे आती है तो पीछे मुड़कर भी नही देखता है।। न जाने क्या अंदाज है उसका!! हर पल मुझे भरमाता है, अगले पल क्या करेगा, ये कोई नही समंझ पाता है।। एक टीस सी उठतीं है दिल के किसी कोने में एक ख्याल मन घर जाता है क्या उसे हमसे मुहहब्बत  हुई है या बातो से सिर्फ  हमे बहलाता है।। अश्क़ बहकर मेरे उसकी याद में रुख़्सरो पर सुख जाते है अब क्या कहे हम उनसे वो हमें कितना याद आते है।। न जाने कैसी चाहत है उसकी जो मेरे जज्बातों को नही समझता है दूर रहकर भी मुझसे वो  अक्सर दूर जाने की  बाते करता है।। लेकिन कुछ दूर जाने के बाद वो खुद ही लौट आते है तेरे बिन जिया नही जाता वो अक्सर फ़ोन पर  कहते है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

संयुक्त परिवार

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संयुक्त परिवार हर गम बाँट लेते है,, तुम हो कितने भी दुःखी तुम्हारा साथ नही छोड़ते है।। बनी रहे तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान, हर सदस्य जतन करता है,, तुम्हारे सुख में सुखी तो, तुम्हारे गम में गमगीन रहता है।। परिवार हो साथ तो  हर दिन त्योहार सा लगतां है न हो गर अपनो का साथ तो होली भी का रंग भी फीका सा लगतां है।। मतभेद कितना भी हो विचारों में बस तुम मन मे भेद कभी न लाना,।। बांधकर रहनी हो गर रिश्तों की डोर तो, तो छोटी छोटी बाते दिल से न लगाना, सब अपने ही है यहां ,लेकिन तुम किसी से गैर न बन जाना।। विपत्ति के समय परिवार ही साथ निभाता है, जो गैर है वो गैर ही रहेगे, वो अपना कहा बन पाता है।। औरो का साथ कुछ पल की खुशियां देता है, लेकिन अपनो का साथ सूना घर भी हर भरा कर देता है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

पत्नी और विज्ञापन

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सुबह सुबह न जाने क्या बात हो गई, श्रीमती सी मुझे खफ़ा हो गई,,,।। पूछ पूछ कर मै थक सा गया हूँ, न जाने क्या ख़ता मुझसे जो हो गयी है।। कब से आगे पीछे श्रीमति के घूम रहा हूँ,, जो गलती नहीं हुई है मुझसे उसकी भी माफ़ी माँग रहा हूँ,।। लेकिन आज वो जैसे ठान कर बैठी है, नही सुनेगी एक भी मेरी, वो कब से मुझे जता रही है।। कुछ तो बोलो मेरी प्राणों से प्रिय रानी ऐसे मौन रहकर न कर अपनी मनमानी जो बोलो वो दिला दूँगा, क्या जयपुर क्या बनारस  सब का बाजार यही लगवा दूँगा,,, सुनकर शॉपिंग की बात  मानो उसमे चेतना आ गयी हो। झट से मेरा हाथ पड़कर मुझे अपने पास बैठा लेती है, और बड़े प्यार से श्रीमती तब मुस्कुरा कर मुझे देखती है।।। सामने चल रहे टीवी के विज्ञापन की ओर   धीरे से इशारा करती है,,, नया खुला शोपिंग मॉल  चलो सजन फिर चलते है आज,,,  तब सारा माजरा मैं समंझ चुका था की चुप रहकर मुझे छला जा चुका था।। वह तो थी विज्ञापन में लीन, मुझे लगा मुझसे हो गयी है  कोई भारी भूल यार लेकिन अब क्या किया जा सकता था, विज्ञापन मुझे ठग जो चुका था  सुमेधा शर्व शुक्ला

युद्ध और शांति

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ख़ामोश थे लब उसके मगर उसकी आँखें उसका हाले ए दिल  बया कर रही थी इन्तज़ार जो आँखो दे गया था  वो आया ही कुछ इस तरह से था हाथो की मेहंदी अभी ताज़ी थी महावर का रंग अभी फीका न हुआ था कलाइयों से भरा चूड़ा था।   सब चीख़कर उसके नए नबेली दुल्हन, होने की गवाही दे रहे थे , पूछ रहे थे कसूर अपना, अभी तो तन पर  उंसके सजे थे ।।  अपने होशो हवास में कहा थी वो अपने  सुहाग को खोने के बाद बस एक टक देखे जा रही थी निर्जीव पड़े अपने प्रियतम को कल तक जिसकी शरारतो से आँगन  महका करता था जिसकी खिलखिलाहट में बूढे माँ बाप की जान बसती थी।। आज वो सब को रोता छोड़ गया दे गया जिंदगी भर का दर्द और  दवा अपने साथ ले गया युद्ध मे कहा कोई जीतता है यहा जीता हुआ शख्स भी हारा है मैदाने ए जंग में, अपनो  की लाशों पर  ख़ुशी कैसे  मनाओगे जलाकर अपनो की चिता  फिर अपना घर कैसे रोशन करोगे।। रोक  सको तो रोक लो इस तबाही  कुछ भी हासिल न होगा वरना अश्क़ तो बहेगे मगर कोई पोछने वाला न होगा।। सुमेधा शर्व शुक्ला

हॉ मैं नारी हूँ।।

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बड़े भाग्य से मैंने नारी तन है पाया,  अलग -अलग रूप लेकर मैंने जीवन को है बचाया।। कभी वकील तो,  कभी शिक्षिका बनकर जीवन को है सवारा।।  कभी मालिन बनकर,  तो कभी मॉ बनकर,  मैंने सृजन का भार उठाया।। विधाता की मैं रचना अनुपम, समंदर सा हृदय रखती हूँ, सब के अवगुणों को अपने   भीतर छुपा लेती हूँ।। पत्नी बनकर सदैव  पति से दो कदम पीछे ही चलती हूँ, लडखडाते है कंदम जहा उनके, मैं आगे बढ़कर सँभाल लेती हूँ,।। कभी मंत्री बनकर, उत्तम सलाह देती हूँ, तो दासी बनकर, घर सवार हूँ।। जीवन मे सब आगे बढे , मैं सर्वदा यही प्रयत्न करती हूँ, सब को आगे बढ़ाने में  मैं खुद पीछे रह जाती हूँ।। अपनो की तरक्की देखकर मै, खुद हो क़ामयाब मान लेती हूँ, हॉ मैं नारी हूँ ये बात मैं गर्व से कहती हूँ।। सुमेधा शर्व शुक्ला      हरियाणा

तेरे बिन मेरा हर श्रृंगार अधूरा साजन

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चूड़ी कंगन,पायल ,बिंदिया, सब गुजरे जमाने की बाते है,,,,, जब से होश संभाला है, खुद को स्वेत रंग में जाना है।। अभी तो गूँजी थी, मेरी चूड़ियो की खनखनाहट, अभी  तो पैजन ने मेरे पूरे घर शोर मचाया था। अभी मेरे साजन ने मेरा का हाथ थामा था।।   करके सोलह श्रृंगार, अभी तो मैं सुहागन बनी थी, आँखो में भरकर सपने नए जीवन के, अभी तो पिया जी अंगना चली थी।। न जाने किसकी नजर लग गयी, मेरे सपनों के संसार को, चूड़ी बिंदिया पायल कगंन,, अब रहे न मेरे किसी काम के, अल्हड़ सी उमर में, मैं जो ब्याही गयी थी, मोल भी न मैं ब्याह का  जान पाई थी। न श्रृंगार का अर्थ समंझ पाई थी,।। छूट गया सब साजो श्रृंगार मेरा एक पल में , तेरे बिन सब अधूरे सजना, अब सब गुजरे जमाने की बात।। सुमेधा शर्व

पूरब और पश्चिम

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अनजानी सी डगर में तुमसे मुलाक़ात हुई, अगल थे हम एक दुजे से, फिर भी आँखो ही आँखो में बात हुई।। तू पूरब तो मैं पश्चिम थी, विचारों का कोई आपस मे मेल न था, फिर भी जाने क्यो तू मेरी निगाहों बसता गया।। टकराव हर कदम पर था, मतभेद हर बात में थी, दुश्मन तू मुझे लगता था, मित्रता की कोई आस न थी।।  फिर भी न जाने कैसा बन्धन , तुझसे यू जुड़ गया, जिनके आपस मिलने की कोई उम्मीद न थी उनसे रिश्ता सा बन गया। माना अलग है हम दोनों  फिर भी एक दुजे की परछाई है, कभी मैं कोशिश करती हूँ  तुझे समझने की और कभी तू  बिन कहे मेरी हर बात समंझ जाता है।। सुमेधा शर्व शुक्ला     हरियाणा

मेरे जीवन साथी

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कल थे जो अंजान मुझसे, आज पल भर में मेरे हो गए, जिनको देखा न था आज से पहले, कभी आज वो जान हमारी बन गए।। मेरे साथी मेरे हमदम तेरे साथ के लिए मैंने बाबुल का आँगन छोड़ा हैं। जिस बगिया में थी जड़ें मेरी, आज मैंने उससे मुँह मोड़ा है।। कभी न छोड़ना साथ मेरा  जीवन चाहें जैसा हो, बनकर सैदेव हौसला मेरा , मेरे साथ तुम खड़े रहना।। नही चाहिए कोई भेंट तुमसे बस तुम मेरा सम्मान करना,।। बना रहे मान मेरा, ये सबसे बड़ा उपहार होगा।। नही माँगती मैं जमाने भर की खुशियाँ, मेरी मुस्कान तो सिर्फ तुमसे है।। फीका है ज़माने रंग यहा, एक तेरे इश्क़ का रंग सबसे गहरा है।। सोना चांदी हीरे मोती ये मेरा श्रृंगार नही,  मिले जो तेरे बाहों हार पूर्ण हो हर श्रृंगार मेरा।। थक हार कर जब तू मेरे कंधे पर अपना सर रखता है, दिनभर की सारी बाते जब तू मेरी सुनता है, इतराती हूँ अपने भाग्य पर मैं की मैंने तुझको पाया है।। तेरे सीने पर सर रखकर हर गम मैं भूल जाती हूँ, ता- उम्र  तेरा साथ रहे यही दुआ मैं करती हूँ।। बनकर सुहागन इस दुनिया से जाऊँ ये मेरा सौभाग्य हो, सुमेधा शर्व शुक्ला(हरियाणा)

गमो का शहर

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गमो के शहर में,  हम मुस्कुराहट ढूढ रहे थे, घना था धूप मगर हम छाया ढूढ रहे थे,  अब हम से न पूछो यारो पता हमारा , हम अपने ही शहर में, अपना मकान ढूढ रहे थे।। सजाया था कभी मुहब्बत से घर अपना, आशिकों के शहर में कभी नाम , हमारा भी हुआ करता था। आज सब गैर हो गए अपने ही शहर में अब हम ग़ैरों के बीच में, अपना रहनुमा ढूढ रहे थे।। खुदक़िस्मत समंझते थे हम खुद को मुहहबत जो तुमसे हुई थी,  दुनिया हसीन हो गयी थी एक तेरे आने से , लेकिन हमे क्या पता था,  की खुदगर्जी के बाजार में हम वफ़ा ढूढ रहे थे।। तन्हा है हम जमाने मे अब, खामोशिया मुझे भाने लगी है, अपने आप मे अब रहता हूँ मै, गमो से रिश्ता कुछ ऐसा जुड़ गया है।।

चलो आज हड़ताल करते है।

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चलो आज हड़ताल करते है, जिम्मेदारियों से लेकर छुट्टी, चलो, आज अपने लिए जीते है।। कहने को घर की मालकिन हूँ मैं, लेकिन मेरी मर्ज़ी कोई पूछता कहा है।। सब की ख्वाईशो का इल्म रखते हुए, मैं अपने ही ख्वाइशों का पता भुल सी गयी हूँ।।  चलो आज अपने मन का करते है, भुलकर दुनियादारी सारी, चलो आज बेख़ौफ़ होकर जीते है।। बन्द करते है आज किचन का द्वार, चौबीस घण्टे की फरमाइशों से , बनाकर अपने चाहतों को मुद्दा चलो आज हडताल करते है।। सुमेधा शर्व शुक्ला

चालबाज (तकदीर का खेल)

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तकदीर का खेल भी निराला है,  जो कल तक हमारे कत्ल का ख़ाब देखते थे, आज हमने उन्हें अपने कदमो में पाया है।। दूर जाकर भी वो हमसे दूर न जा सके , जो नफरत का दावा हमसे बेसुमार करते थे।। लबों पर शोले है उनके, मगर आँखो में अब भी, अहसास दिखाई देता है।। लम्हो की खता थी, मुहब्बत मेरी और सजा सदियो ने पाई थी।। तेरा मेरे कदमो में होना , मुझे कहा सुकून देता है, आज भी मेरा दिल तेरी चालबाजी पर रोता है।। कैसे करूँ रुसवा तुझे,  मेरा दिल दर्द से भर जाता है, जब भी सोचती हूँ सज़ा तेरी मेरी आँख भर आती है।। , रुसवा हम आज भी अपनी  मुहब्बत को न कर पायेंगे तुझे झुकाने से पहले हम खुद ही मिट जाएंगे।। देखो न!! किस्मत ने क्या खेल खेला है, जिसपर एतबार कभी खुदा से बढ़कर किया था आज वही मुज़रिम बन मेरे सामने में खड़ा है।।

बिन पानी सब सून

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जल बिन सब सून सखी,  क्या जग और क्या जीवन।। क्या मानव !!. क्या पशु पक्षी , क्या उपवन के सारे फूल सबकी साँसो का आधार पानी बिन सब काज बेकार।। बिन नीर एक पहर न बीते, फिर भी कोई जतन न जाने।। अनावश्यक पानी बहाए, बूंद बूंद को संचित कर पाए बहता पानी छोड़े श्राप मेरे बाद तेरा होगा क्या हाल!! त्राहि त्राहि करेगा संसार।। दिन दूर नही है वो,  जब तीसरा विश्व युद्ध, पानी के लिए होगा ।।