अखाड़ा



शब्दो की मर्यादा अब कहा!!
कहा बड़ो का सम्मान रह गया!!
घर हो बाहर सब 
राजनीति का अखाड़ा बनकर रख गया।।

पद प्रतिष्ठा की लालसा में ,
रिश्तों का मोल कही खो सा गया,
सहनशक्ति बस शब्दों तक सीमित
लोक लाज की परवाह कहा!!

क्या अंदर और  क्या बाहर 
सब जगह जंग जारी है,,,,
जिन्दगी बन गयी है अखाड़ा
किसी एक ने भी हार न मानी है।।

बुद्धि आवश्यकता नहीँ अब
बाहुबली का जमाना है,,
जिसके पास ताकत है ज्यादा
उसी का बोलबाला है।।

सुमेधा शर्व शुक्ला

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