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गर्भ संस्कार

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बातचीत तो बहुत लोगों के साथ होती है पर मैं आज माँ और गर्भस्थ शिशु के मध्य होने वाली बातचीत पर कुछ कहना चाहूंगी। आज जब हम पाश्चात्य सभ्यता की ओर दौड़ रहे हैं ,हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को खोने न दें। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध कर चुका है कि गर्भस्थ शिशु माता के माध्यम से सुन-समझ सकता है तथा जीवन भर उसे याद रख सकता है। इसे सिद्ध करने के लिए एक उदाहरण ही काफी है कि यदि सोनोग्राफी करते समय गर्भवती को सुई चुभोई जाए तो गर्भस्थ शिशु तड़प जाता है तथा रोने लगता है। इसे सोनोग्राफी के नतीजों में देखा जा सकता है। हिन्दू धर्म में जिन 16 संस्कारों का उल्लेख किया गया है वे सभी वैज्ञानिक आधार पर खरे उतरते हैं। इनमें गर्भसंस्कार भी एक प्रमुख संस्कार मन गया है।अतः उन्हें व्यर्थ या ढकोसला समझने से पहले उसके महत्व को समझना आवश्यक है।     हरिद्वार के शांतिकुंज से संचालित गर्भसंस्कार को देश विदेश में अपनाया जा रहा है।       चिकित्सा विज्ञान यह स्वीकार कर चुका है कि गर्भस्थ शिशु किसी चैतन्य जीव की तरह व्यवहार करता है तथा ...

सुखद प्रभात

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सतरंगी  अश्वों से सज्जित रथ पर आरूढ़ हो आया रश्मिरथी कुछ संकुचित कुछ खिलखिलाता सा पर्ण पुष्पों का करता आलिंगन शीत वायु को देता कतिपय ऊष्मा तुहिन कणों को अवशोषित कर  शैवाल को भी देता जीवन स्वागत में सुखद प्रभात बेला की  हो गया है रक्तिम  अवनि का भी प्रसन्न आनन रेनु सिंह

संध्याबेला गाँव की

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अस्ताचल गामी अरुणिम पुंज झलक रहा क्षितिज पर , अस्तित्व में आने को  प्रयासरत  अंधकार को पराजित करने  आ रहा शशि शिखर पर , खग विहग चले करने विश्राम अपने अपने घरों को आकाश में पँक्तिबद्ध पक्षी  उड़ चले एक ही दिशा में पढा रहे पाठ संगठने शक्ति   अवनि की रज उसे ही सौंपते धूल धूसरित पशु  चले स्वामी का संकेत लेकर द्वार पर प्रतीक्षारत खड़ी धरनी धीरज रख मन आते होंगे पति  समझा रही व्याकुल उद्गारों को क्रीड़ा से क्लान्त हुए बाल बालक  बलपूर्वक छिप रहे मां के आँचल में निद्रालोक में खो न जायें बालक इस भय से गृहिणी तत्परता से कर रहीं व्यवस्था भोजन  की  प्रकृति ने समेट लिया अपना आँचल  सबको दिया समय विश्राम करने को  रेनु सिंह

पोखर

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इक नदी  बहती जा रही थी कल कल ।उसके किनारे पर अनगिनत व्यक्ति स्नान और पूजन कर रहे थे ।जब कोई पशु उधर पानी पीने आ जाता तो सभी व्यक्ति उसे खदेड़ देते । बहते बहते नदी को एक पोखर मिला ।नदी उससे अपनी शान बघारने लगी ।बोली मेरे पास  रोज कितने व्यक्ति पानी लेने ,स्नान करने आते हैं और तुम यहाँ अकेले पड़े रहते हो । पोखर बोला ,तुम्हारे किनरे से जिन पशुओं को खदेड़ दिया जाता है वे  मेरे पास से पानी पीकर जाते हैं । रेनु सिंह

टूटी फुटी सड़क

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बारिश के कारण सड़कों की बुरी हालत हो गई थी ।सड़क पर बड़े बड़े गड्ढे हो गए थे और कंक्रीट भी इधर उधर बिखरी रहती थी जिससे नागरिकों को  परेशानी होती थी । ऐसी ही सड़को  से सोहनलाल को ठेला लेकर नित्यप्रति निकलना पड़ता था । नागरिकों ने लोक निर्माण विभाग केअफ़सरों से शिकायत भी की पर काम कागजी कारवाही तक काम सीमित रहता था । सोहनलाल एक अधेड़ उम्र का मजदूर था।वह  ठेले पर भरी हुई बोरियों का बोझ लिए एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता था ।बदहाल सड़कों के गड्ढों से जैसे तैसे बचता हुआ जाता फिर भी पहिया कभी भी टूटीफूटी सड़क  के गड्ढे में धँस जाता । मजदूर था तो कोई मदद को भी नहीं आता था ।जब तक शरीर में ताकत थी खींच ले जाता था । अब थोड़ा थकने लगा था । एक बेटे का पिता था चाहता था कि उसका बेटा पढ लिख कर कोई ढंग की नौकरी कर ले पर उसे इस तरह मजदूरी न करनी पड़े । मेहनत कर उसे स्कूल भेजने लगा । बेटा होनहार था मन लगा कर पढ़ता था ।उसका भी संकल्प था कि पिता को अब इस तरह मेहनत नहीं करने देगा ।अब वह खुद बड़ा हो गया है कुछ काम तो कर ही सकता है । एक दिन स्कूल से आते हुए उसने देखा कि पिता का ठेला ,जिस पर बोझ लद...

ओस की बून्द

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ओस की बून्द थी शीशे पर या ठंड में रात भर रोई थी चांदनी धूप से मिल विगलित होने को  प्रतीक्षा रत रही थी खिड़की पर  सूरज ने आकर गले जो लगाया बून्द को खुशी से सिमट  गई उसी  में सूरज ने भी देखा हर फूल और दूब  प्रतीक्षा में थे उसकी ,कुछ देर हुई आने में  कुहासे ने रोक लिया था उसको  वह बढा शीघ्रता से  अंक में अपने समेट लिया सभी को मोतियों सी बिखरी ओस की बून्दे बन गईं दिनकर का हार  और सभी समा गईं उसी में रेनु सिंह

लाठी न्याय

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लाठी है एक रक्षात्मक अस्त्र  हाथ में हो तो दूर रहता है हमें करने वाला त्रस्त लाठी देती सीख अनुशासन की  शिक्षक पकड़े तो उच्श्रृंखल भी हो जाता  है विनत पशुओं को साधती यह लाठी तभी  गोचारण में कान्हा के हाथ भी रहती एक लकुटी रात्रि में भय हो जाता है कम जब पथिक के हाथ होती लाठी लम्बी यात्रा पर पाथेय लटका  चला जाता मंजिल तक यात्री वृद्धों के  शक्तिहीन अंगों का  सम्बल बन जाती लाठी पशुओं को दूर भगा  सुरक्षा भी दे जाती लाठी चोरों को देख घमासान कर देती लाठी कभी स्वामी को देख दुर्बल  दुष्ट उठा लेते लाठी  लाठी के रूप अनेक रात में सावधान करने  रक्षक करता ठक ठक लाठी यहाँ तो देखा जिसकी लाठी उसकी भैंस राजनीति बताती  जिसकी भैंस उसी की लाठी  सबकी लाठी करती आवाज और  दिखा देती  रूप बेहिसाब पर ऊपर वाले की लाठी  दिखा जाती न्याय निराला रहकर निरन्तर बे- आवाज रेनु सिंह

पागल मन

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क्यों हृदय में रुदन अभी है बाकी प्रतीक्षा में कटी  सुबह शाम रात्रि नव भोर का प्रहर फिर जगा रहा आशा आंखों से अभी भी बहती अश्रुधारा द्वार पर टकटकी लगाए नयन , हर आहट पर  बढ़ जाती धड़कन कोई नहीं आने वाला समझ नहीं पाता  ये मेरा पागल मन रेनु सिंह

गोधूलि

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सूर्य हुआ थकित दिन भर तप कर  चला क्षितिज की बाहों में पाने विश्राम सन्ध्या की अरुणिम बेला में  गायें भी पालकों के साथ  घर की ओर  लगीं करने  प्रस्थान पग  प्रहार से उठने लगी धूलि खचित हुआ चित्र बन गोधूलि पक्षी कलरव कम हुआ उड़ चले नीड़ की ओर हलचल से उठती रेणुका ने आच्छादित कर दिया रक्तिम सूर्यकिरणों को चहुँ ओर  सुन्दर मनमोहक प्रकृति का  रूप बना निराला कान्हा ने भी बंशी की धुन पर  अपनी गैयों को पुकारा चली आ रही घण्टी की रुनझुन करती देखो प्रतीक्षा कर रहीं  द्वार खड़ीं ग्वाल बाला ईशद्दर्शन होने लगे चन्द्र  के उत्साहित हैं छाने को अम्बर पे बालक सब अलसाये हुए हैं निद्रावश हैं आंचल में  माँ के छिपे हुए  नवोदय की प्रतीक्षा में  सूर्य भी सो गया  तारागण आ गये लोरी सुनाने  स्वप्नलोक जागृत हुआ माँ भी लगी लोरी गुनगुनाने रेनु सिंह

अंधेरे रास्तों का उजाला

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"रामरतिया ,मर्द का पेट इतना बड़ा होता है कि कभी नहीं भरता।" "यह क्या कह रही है तू सत्तो?" "मैं क्या झूठ बोल रही हूँ ? वह देख वह मेरा मर्द है और कैसे उस छिछोरी के साथ रंगीन हुआ पड़ा है ।"सत्तो आक्रोशित थी । रामरतिया न समझाया ,"छोड़ सत्तो ।तू अपने बच्चे देख  कुछ दिन बाद सुधर जायेगा।" "तो क्या मैं तब तक कुढती रहूँ और इसकी नाजायज हरकतें बर्दाश्त करती रहूँ ।यह नहीं सुधरने वाला ।इसका बाप भी तो रंगीला था ।अपने चार बच्चे और बीबी को छोड़ दूसरी औरत बिठा ली और उसके भी चार बच्चे ।पहली वाली कहाँ है,जीती है या मरती है किसी को नहीं पता ।और अब सत्तर साल की उम्र में दो कुंवारी लड़कियों को छोड़ सिधार लिया ऊपर ।उन बच्चों को कौन संभालेगा कौन उनकी शादी ब्याह करेगा किसी को होश नहीं ।सब अपने में मस्त सांड से घूमते फिरते हैं ।" "तू क्यों परेशान है सत्तो ?" "क्यों न परेशान हूँ मैं ।उनकी जिम्मेदारी भी तो मुझे ही निभानी पड़ेगी ।बड़ी और अकेली बहु जो हूँ उस घर की ।बाप और भाई की आवारगी से क्या लड़कियाँ अछूती रह गई हैं ।वह भी गांव भर में मनमानी करती घूम...

ओस की बून्दें

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बारिश की ये नहीं बून्दें थीं सजी थीं ओस कणिकाएं कोमल दूब की नोकों पर  वृक्षों की नुकीली कोंपलों पर  बिछी हो जैसे मोतियों की चादर सज गई प्रकृति ओढ़े ठंडी चादर ये बारिश नहीं ओस की बून्दें थीं  बारिश सौंप गई थी  ओस को कुछ कार्यभार कर ले  तू भी प्रकृति की थोड़ी सी साज सम्भाल कुम्हलाये न कोई दूब कोई फूल पड़ने न पाये उन पर  धूल रोज आना उन्हें धीरे से सहला जाना  कुम्हलाने न पायें वे कभी उन्हें तेज  धूप से रोज बचाना रेनु सिंह

तू मेरी बिंदिया रे

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आसमान में चाँद सा चमकता तू मेरी बिंदिया रे तू मेरा साजन ,बाहें पसारे  चारों आयाम मुझे सँवारे रे मेघों सी मेरी काली अलकें तेरे मुख की शोभा रे अरुणाचल से आता सिंदूरी सूरज सजाता मेरी मांग रे रात में तारों की झिलमिल  बनती मेरी चुनरिया रे कुमुदनी पर गुंजरित भँवरे  बने मेरी पायलिया रे तू मेरे माथे की बिंदिया चंदा सा चमकता रे  रेनु सिंह स्वरचित

नन्हा दीया

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  ""माँ देख कैसा बना है मेरा दीया ?" "बहुत अच्छा बना है बेटे ।" माँ मैं और बनाऊंगा ।अब तो मुझे भी दीया बनाना आ गया ।" नन्हे दीपू ने चाक घूमाते हुए कहा । ""हां बेटे जब तक तेरा मन हो बना ।धूप भी खिली हुई है ।जल्द सूख भी जायेंगे । भगवान ने चाहा तो दिवाली पर अच्छी आमदनी हो जाएगी ।"  आंगन में  कुछ देर के लिये चारपाई पर सुस्ताने  बैठी माँ ने  प्यार से कहा। माँ बेटे मिल कर दीये और खिलौने बनाते रहे ।दीपू दीये ही बना पाता था ।जब माँ कोई दूसरा काम करती दीपू चाक संभाल लेता ।जब काफी दीयेऔर खिलौने  इकट्ठे हो गये तो माँ ने भट्टी लगाई और दीये और खिलौने पकने रख दिया । दो दिन बाद जब  पक कर सब तैयार हो गये तो दीपू ने माँ से कहा ,"माँ तू यहॉं अपनी दुकान लगाना और मैं अपने दीये नुक्कड़ पर सड़क किनारे बेचूंगा ।इससे दो जगह बिक्री हो जायेगी।""   माँ ने उसकी बात मान कर एक टोकरी में उसके बनाये दीये रखकर उसे भेज दिया और खुद घर के बाहर अपनी दुकान लगा ली । सड़क पर बैठा दीपू आने जाने वालों को बड़ी आशा से देखता और कभी आवाज भी लगा देता ,"माता जी !भा...

नन्ही उम्मीद

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नन्ही कली ने   लिया जन्म  सूरज ने दी थपकी  हवा ने सहलाया  चांदनी गुनगुनाई चाँद ने लोरी गाई कली बस थोड़ी सी  मुस्काई  उसने उम्मीदे जगाईं  जल्दी ही बड़ी होगी  दूसरे फूलों की तरह झूमेगी लहरायेगी तितली और भौंरे  गुनगुनायेंगे  उसके सौंदर्य के गीत गायेंगे  आज कली खिल गई  खिलखिला कर इतराई  आज उसने भी  पंखुड़ियां खिला कर  ली अंगड़ाई अपनी आस पास देख भँवरे को  नन्ही कली को  अपनी उम्मीद याद आई  वह सौंदर्य है अनछुआ  किसी बाग का , उसेअंग बनना है प्रियतम के श्रृंगार का  यह नन्ही सी  उम्मीद  उसकी पूरी कर देना हे भगवान!🙏🙏 रेनु सिंह

टूटते घर की कहानी

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रजत और रीना दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। उनकी 12 साल की एक खूबसूरत बेटी थी जिसका नाम रूही था। जबसे रूही समझदार हुई उसने अपने मम्मी पापा को झगड़ते हुए ही देखा था। दोनों तलाक लेना चाहते थे।समस्या थी कि रूही की जिम्मेदारी कौन लेगा। रीना का कहना था ,""रूही की जिम्मेदारी तुम सम्भालो और  प्रोपर्टी में से आधा हिस्सा मुझे दो।" जबकि रजत चाहता था कि रूही की जिम्मेदारी रीना ले। रोज लड़ाई के साथ ही रूही को लेकर  भी झगड़ा होता। आज रूही सो कर उठी ।उसने मम्मी पापा के बेडरूम में झांक कर देखा तो कमरे में  सामान बिखरा पड़ा था।पापा ड्राइंग रूम में सो रहे थे। उसे समझते देर नहीं लगी कि रोज की तरह आज फिर दोनों में झगड़ा हुआ है। वह स्कूल के लिए तैयार हुई।उसने अपनी गुल्लक से पैसे निकाले और बाहर जाने लगी ।तभी उसकी सरोज आंटी ने आवाज दी ,""रूही बेटा नाश्ता कर के जाओ।' रूही ने मना कर दिया ,""आंटी आज मन नहीं कर रहा।'" ""अच्छा लंच बॉक्स तो लेती जाओ" कहते हुए सरोज ने उसके बैग में जबरदस्ती लंचबॉक्स रख दिया। सरोज घर में काम करती थी।वह भी साहब...

वह कौन चित्रकार है

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वह कौन चित्रकार है सुबह उदयाचल से सुन्दर रंग बिखेरता तो संध्या अस्तंगत किरणों से कभी पृथ्वी के उस छोर से कभी समुद्र के उस किनारे से  तो कभी पर्वतों के पीछे छिपती जा रही सुनहरी किरणों का  दिग्दिगन्त में रंग भर देता वह कौन चित्रकार है जो उत्तुंग पर्वत श्रृंखलाओं को श्वेताभ कर अनोखी छटा बिखेर देता वह कौन चित्रकार है जो  धवल चांदनी की चादर  धरती के सिर पर डाल देता वह कौन चित्रकार है जो ऋतु परिवर्तन के साथ अवनी से अम्बर तक  सात रंगों के पुष्पों की  वर्षा कर स्वर्ग सी अनुपम छटा  चतुर्दिक बिखरा देता वह कौन चित्रकार है जिसके अलौकिक प्रतिबिंब को हर चित्रकार   अपनी रचना में प्रतिस्थापित कर आकाश छूना चाहता वह तो दिव्य चित्रकार है जो अम्बर में बैठ, हर पल धरती पर चित्र- विचित्र चित्र चित्रित करता रहता और हर कोई उसके चित्र देख चित्रखचित सा रह जाता रेनु सिंह

अघोषित सास

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मैंने जो अनुभव किया है शायद आपमें से भी कुछ ने वैसा अनुभव किया हो।उसी अनुभव को मैं आप लोगों से साझा कर रही हूँ।      सासुराल जब आई थी तब सोचा था एक ही तो सास होती है ,माँ मान कर उसकी बहुत सेवा करूंगी। विचार तो विचार ही होता है ।सच के साथ उसका हमेशा तो तालमेल नहीं बैठता।     बस ऐसा ही हुआ।कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा।सास जो भी कहतीं ध्यान से सुनती और उस पर अमल करने की कोशिश करती।   माजरा कुछ और ही निकला।सबने बड़ी तारीफ की कि बहु तो बड़ी सोनी है सासू जी की  सेवा कर उन्हें खुश रखती है।    अब जो देखा तो सासुराल की हर स्त्री अपने को मेरी सास ही समझने लगी।उनको उम्मीद थी कि मैं उन लोगों की सेवा कर समय बे समय खुश रखूंगी।     सास की सहेलियां,बुजुर्ग पडोसनें, छोटी बड़ी ननदें सभी ने फिर तो स्वयं को अघोषित सास की पदवी दे डाली।मुझे भी सबका मान सम्मान उसी तरह करना पड़ता था।जिठानी जरूर हमदर्दी रखतीं थीं क्योंकि वह भी मेरी ही श्रेणी में आती थीं। अघोषित साँसें समय समय पर राय मश्विरा देती रहतीं।समय कुसमय आदेश पारित कर देती साथ ही दिशानिर...

अरबपति की मोहब्बत

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अरबों के खेल में जिन लोगों की मोहब्बत जिंदा रहती है,बहुत खुशनसीब हैं वे लोग। वरना ऐसे सम्बन्ध कुछ दिन तो चलते हैं फिर टाट में पैबंद की तरह हो जाते हैं। रितेश अरबपति खानदान का अकेला वारिस था। माँ बाप का लाड़ला।उसकी हर मांग मुँह से निकलते ही पूरी हो जाती। रीता खाते पीते परिवार की निहायत ही खूबसूरत बेटी थी।माँ बाप की लाडली पर मर्यादा में रहने वाली। रितेश और रीता एक ही कॉलेज में पढ़ते थे।रितेश एक साल सीनियर था। उसने जिस दिन से रीता को देखा बेचैन रहने लगा।रीता की खूबसूरती का कायल हो गया।वह उसके आस पास ही बना रहता।उससे बात करने की कोशिश करता।    उधर रीता उसके रहन सहन ,शान ओ शौकत और फिजूल खर्ची देख कर उससे हमेशा दूरी बना कर रहती थी।वह जानती थी कि उन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है।    रितेश ने अपने माँ बाप को रीता के बारे में बताया ,उसने कहा, ""मैं शादी करूंगा तो रीता से ही करूंगा।आप लोग उसके घर पर बात करें।"" रितेश के पापा ने कहा,""उसके और हमारे स्टेटस के बीच बहुत अंतर है।हम तैयार भी हो जायें  पर रीता के माता पिता तैयार नहीं होंगे।""   रितेश ने क...

तिरंगा प्यारा

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केसरिया पगड़ी बांधे  तिरंगा लहराता है  हरित धरती का स्वरूप धर  तिरंगा लहराता है  शांति वाहक बना  मध्य में है श्वेत सजीला  नीलवर्ण चक्र सम्भाले  समय की गति समझाता है  तिरंगा गौरव हमारा  आसमान तक लहराता है  रेनु सिंह

सावन आया रे

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अलका की अलकों पर अटक अटक जाएं बुंदिया गरज गरज गर्जन लागी गजगामिनी सी बदरिया हर हर हरहरा उठी हरियाली से पेड़न की डालियां भर भर भरभरा उठी कलकल करती जलभरी नदियां आई है वर्षा ऋतु देख मद से मदमाने लगी सखियाँ