गोधूलि

सूर्य हुआ थकित दिन भर तप कर 
चला क्षितिज की बाहों में पाने विश्राम
सन्ध्या की अरुणिम बेला में 
गायें भी पालकों के साथ 
घर की ओर  लगीं करने  प्रस्थान
पग  प्रहार से उठने लगी धूलि
खचित हुआ चित्र बन गोधूलि

पक्षी कलरव कम हुआ
उड़ चले नीड़ की ओर
हलचल से उठती रेणुका ने
आच्छादित कर दिया रक्तिम
सूर्यकिरणों को चहुँ ओर 
सुन्दर मनमोहक प्रकृति का 
रूप बना निराला
कान्हा ने भी बंशी की धुन पर 
अपनी गैयों को पुकारा
चली आ रही घण्टी की रुनझुन करती
देखो प्रतीक्षा कर रहीं 
द्वार खड़ीं ग्वाल बाला

ईशद्दर्शन होने लगे चन्द्र  के
उत्साहित हैं छाने को अम्बर पे
बालक सब अलसाये हुए हैं
निद्रावश हैं आंचल में 
माँ के छिपे हुए 

नवोदय की प्रतीक्षा में 
सूर्य भी सो गया 
तारागण आ गये लोरी सुनाने 
स्वप्नलोक जागृत हुआ
माँ भी लगी लोरी गुनगुनाने


रेनु सिंह

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