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मन की मनमानी

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यूं तो वश ना होता मन पर, मन करता है स्वछंद विचरण। पर क्या मनमानी कर पाते हम, करते लिहाज गैरों का आचरण। मन में घूमते अन्य मखमली दुनिया में, तंद्रा टूटते पाते खुद को खुरदरी धरा पर। चाहता मन खुल कर जीना जहां में, पर बंदिशें चढ़ने ना देती उच्च तरा पर। मन ही हमें हंसाता और रूलाता,  मन के हारे है हार और जीते जीत। मन भी होता मजबूर और मगरूर, मन के अरमान भी कुचले जाते ओ मनमीत। मन रूपी कोठरी में रोग लगाओ झाड़ू, पर जाने कैसे रोज मिल जाता इसमें कूड़ा। सोचा इस कोठरी में लगा दूं भारी ताला, पर इस कोठरी में ढ़ेर अदृश्य तार है जुड़ा।         -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

देर रात तक

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अगर देर रात तक बिजली, यदि ना आए तो, जैसे शामत आ जाती है। इस भीषण गर्मी में, पसीने नदियों से, बहती हुई हमें भींगा जाती है। देर रात तक नींद आती नहीं, सुबह नींद पूरी होती नहीं, देर उठने से आलसी का ठप्पा लगाती है।        -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

असंभव शब्द

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वीर नेपोलियन ने कहा था, असंभव शब्द मुर्खों के शब्दकोश में होता है। ऐसा उन्होंने न सिर्फ कहा, बल्कि कर के भी दिखाया। पर आजकल 'असंभव' है। ईमानदार और ईमानदारी, के कद्रदान के मिलना। माफी चाहूंगी फ्रांस सम्राट, अब ईमानदारी शब्द मुर्खों के शब्दकोश में होता है।           -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।

निस्वार्थ सेवा

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कौन करता है निस्वार्थ सेवा। सब चाहे बदले में ढ़ेर सा मेवा। अगर करने लग जाए जन सेवा। कोई ना रहे भूखा सब करे कलेवा। मानवता,ईमान का बहने लगे रेवा। नर,नर ना रहकर हो जाए देवा। पर करता कौन है निस्वार्थ सेवा। सेवा के नाम पर सौदा कर लेवा। धर्म,दया की नाव को किसने खेवा। काश कर पाए कोई निस्वार्थ सेवा।              -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

अंधा कानून

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कानून तो अंधा ही है। तभी तो बेगुनाह पाते सजा, और गुनहगार बच जाते हैं। सीधे-सादे होते लाचार, बेईमान खुशी के गीत गाते हैं। कानून तो अंधा ही है। तभी तो सरेआम होता, लूट खसोट,छीना-झपटी। बाल-अबोध होते असुरक्षित, फलते-फूलते हैं कपटी। कानून तो अंधा ही है।             -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।

बाबुल का दर

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बाबुल तो महज एक होता मेजबान। बेटी जहां की होती महज एक मेहमान। एक ऐसी मेहमान जो हिचक के संग नहीं रहती। अल्हड़ता लिए किसी नदी की तरह बहती। बाबुल का लंबे समय तक इस मेहमान से जी न भरता। विदा होने में यदि देरी हो जाए तो चिंता से आहें भरता। बहुत दुविधासिंचित होता बाबुल बेटी का रिश्ता। सबसे अनोखा होता जग में बाबुल बेटी का रिश्ता। बाबुल के दर से अथाह स्नेह है,पर सपनें भी है आंखों में। प्रियवर सतरंगी नगर ले जाए बांधे मीठे सलाखों में। अश्रुमय नेत्रों संग अनजान देश भेजने को बेताब। यहां के कण-कण में बसी फिर भी पीछा करता एक खाब। भारी मन से विदा कर खुद को जैसे तैसै बहलाते। वो परदेश जा संवारती सब,खुद को कभी खिलते-कुम्हलाते। रब करे बाबुल के घर से निकली अल्हड़ बुलबुल। खुशियां ढ़ेरों पाए और सबको दे सबसे मिलघुल।              -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।

काश

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काश विहग तू खोल पाती नल। पानी की किल्लत हो कोई हल। नदी-तालाब सब लगे सूखने। मानवकर्मों से तू लगी दूखने। पहले तो तू भी निर्मल जल पीती होगी। नलों पर बिना भटके ही जीती होगी। पर अब नदियों में पानी कम,कीचड़ ज्यादा। प्रकृति और मानव दोनों  रहे ना सीधा सादा। लोग तेरे लिए बर्तन में पानी रखते हैं जरूर। अपने इस पुण्य पर करते हैं अत्यंत गुरूर। पर पानी बर्बाद करना बंद ना करते। जल संकट से ये  मानव क्यों ना डरते।               -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

रहने दूं ना कभी तुझे मजबूर

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मजदूर अगर मेरा चले वश तो मजदूर। तुम्हारी हालत तो शब्दों में होता न बयां। तुम्हारे हाल पर तो नसीब को आए हया। पंखहीन चूजों से बेबस तुम्हारे बच्चे। झेलते गरीबी दुर्बल से सीधे सच्चे। तन पर कभी जरा से कपड़े,कभी वो भी नहीं। कुछ करो विधाता,कोई तो इंतजाम करो कहीं। नारियां चीथड़ों से ढ़ंके जैसे तैसै बदन। पुरूषों का मत पूछो कैसे करते सहन। संपन्नता रहते अधनंगे रहनेवाले होते मगरूर। दीनता होते अधनंगे रहनेवाले होते मजदूर। कैसे बाल अबोध गर्मी,सर्दी झेलते होंगे। कैसे बालक बरसात की बेदर्दी झेलते होंगे। कैसे भूख वे मिटाते हैं,जब घर में ना होता दाना। क्या रब ने दिव्य शक्ति दी है उत्तर मुझे है पाना। निकम्मी हूं दिया है सिर्फ शब्दों की श्रद्धांजलि। रब से सवाल है,इल्तजा है मेरे पास है अश्रुअंजलि।                  -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

आज की मांग

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अजीब लगता है अपने समाज में। पुरूष रसोई में,महिला दफ्तर में। पर इसमें क्या ही बुराई है। रसोई में पुरुष भी अच्छाई है। कुछ देवियां बेशक बहाने करती हों। रसोई के कामों से जी चुराती हों। पर मांग है आज के समाज की। दोनों मिल संभाले रसोई और बाहर के काज की। महिला अगर थक कर आए। तो पुरूष भी उसका हाथ बंटाए। पुरूष का जेब हल्का पड़ जाए। तो महिला उसका हाथ बंटाए।         -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

सुखद स्मृतियां

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किसी भी सुखद स्मृति में, खुश्बू ही होती है। सुखद स्मृतियां कभी तस्वीरों में, तो कभी दिल में कैद होती है। खयाल आते ही, आंखों में एक चमक होती है। खयाल आते ही, होंठों पर एक मुस्कान होती है। कोई अनाड़ी ही पूछता है, कि अकेले क्यों मुस्करा रहे हो। सयाने को पता है, क्यों दमक ठहरा रहे हो। सुखद अनुभूतियों को, क्यों अतीत ही रहने दें। वर्तमान में याद कर, खुशियां प्रतीत भी होने दें। रब करे सबके जीवन में, सुखद स्मृतियों का संग्रह हो। जीवन का मान रखने को, दुख हो पर कम,ये अनुग्रह हो।       -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

भारतीय परिधान

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अनोखा है, अनुपम है, शालीन है, सुरक्षित है, सर्वश्रेष्ठ है, सजीला है, रंगीला है, अपनापन है, सबको समेटे है, कोमलता से लपेटे है, लोकप्रिय है, सुंदर है, आकर्षक है, आरामदेह है, लुभावना है, सुहावना है, अलग ही शान है, हां,वो भारतीय परिधान है।

तोंद

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कहते हैं वहीं सेठ है जिसे पेट है। पर छरहरी काया के आगे मटियामेट है। खास नाम पाया 'तोंद' उत्तल पेट ने। अर्द्धगोले सा या गुंबद सा उभरे गोल पेट ने। संपन्नता की निशानी या घर परेशानियों का। जरा झुकने से पसीने से लथपथ पेशानियों का। तेज दौड़ सकते नहीं,तेज कूद सकते नहीं। बीमार रहने पर भी लोग कमजोर कहते नहीं। मेरी तो तोंद नहीं पर कुछ सोचती हूं। दो तोंदवाले कैसे गले मिलते होंगे,हंसती हूं। नींबू-पानी कितना पियें,कसरत से जी चुराते हैं। चटपटे व्यंजनो को देख,काबू में कहां रह पाते हैं। कुछ तोंदू तो बिंदास रहते,फर्क नहीं कोई,लोगों से। बेशक बिंदास रहे पर बचे रहे उबाऊ रोगों से। कमीज पेट पर तन,मानों अब फटनेवाली। पछता के करें क्या चर्बी आसानी से ना हटनेवाली। इन सबके बावजूद हंसते बुद्ध को पूजते लोग। हंसते हुए प्यारे बुद्ध को शीश नवाते लोग।        -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

विरहकाल

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चंद लफ्जों में बयां नहीं हो सकता। दर्द जिसका सहा ना जा सकता। जख्म गहरा पर दिखाया ना सकता। पर बैचैनी को छिपाया ना जा सकता। दर्द की कोई दवा ना मिल सकता। पुनर्मिलन ही एक समाधान हो सकता। विरह काश किसी के जीवन में न आता। पर विरह बिना जीवन कहां होता।           -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

छुट्टी की सुबह

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बहुत ही आरामदेह होती। बहुत ही खुशनुमा होती। मीठे आलस से भरी होती। भागमभाग से मुक्त होती। बिस्तर की गोद भरी होती। प्यारी प्यारी उबासी होती। देह पर हल्की पोशाकें होती। इत्मीनान से चाय की चुस्की होती। हटके भोजन में स्वाद बसी होती। मित्र यारों से मुलाकातें होती। हाट बाजारों की चक्करें लगती। होठों पर एक मुस्कान होती। स्थायी छुट्टी ना करे रब किसी की। बस हर हफ्ते छुट्टी रहे किसी की।                -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

चुनौतियां

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जीवन में पल पल आती है चुनौतियां। जाने कहां से बाढ़ सी आती चुनौतियां। बेशक जीवन में खुशी भी है पर अधिक चुनौतियां। निबटते चलो फिर नई नई आती चुनौतियां। बालक से वृद्ध सबसे सामना होती चुनौतियां। कहते हैं जीवन में रंग भरती चुनौतियां। हमें अनुभवी और जुझारू बनाती चुनौतियां। कभी उलझन में डाल देती चुनौतियां। पीछा छुड़ा नहीं सकते होती ऐसी चुनौतियां।           -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

प्रायश्चित

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प्रायश्चित तो निदान है अपने, पापों को धोने का। प्रायश्चित तो समाधान है अपने, धर्म को नहीं खोने का। अगर प्रायश्चित संभव नहीं तो, पश्चाताप तो कर सकते हैं। अगर पछतावा नहीं अधर्म का, तो कैसे सज्जन बन सकते हैं। भूल-चूक अगर हो गई हो तो, एकमात्र निदान है प्रायश्चित। मल-मलके मैल हटानेवाला, मानों कोई साबुन है प्रायश्चित।          -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

घरौंदा

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घर का खाब देखनेवाले ही बनाते घरौंदा। विशाल छायादार वृक्ष भी होते कभी पौधा। घरौंदे होती कभी मिट्टी के,तिनकों के। कभी लकड़ी के,कभी पत्थर के मनकों के। कभी कागज के,कभी गत्ते के। कभी रेत कभी सूखे पत्तों के। नन्हें कलाकारों की होती कलाकारी। घरौंदे लगते मानों कोई फुलकारी। अब बने बनाये मिलते गुड़ियाघर। बनालो इन्हें एक नन्हा चिड़ियाघर।              -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

अन्नपूर्णा

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हे माता अन्नपूर्णा। कोई तुझे मद में त्यागे। कोई तेरे पीछे भागे। कोई तुझे कूड़े में डाले। तेरे बिन बिगड़े किसी की चालें। आसान नहीं तुझे उपजाना। फिर भी तेरा कद्र है समझाना। फेंकते तुझे जो ले ले डकार। समझे नहीं शायद भूख के प्रकार। कैसे कहूं कि तू उड़ के चली जा। बेबस की थाली में सजी भली जा। हे माता अन्नपूर्णा।      चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।

मास्क वाले चेहरे

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चीनी विषाणु ने लाए मास्क वाले चेहरे। दिखते अब दो- दो मास्क वाले चेहरे। सजी-धजी दुल्हन के चेहरे पर मास्क। सुंदरता पूरी नहीं उभरती संग मास्क। मास्क बिना कहीं प्रवेश निषेध। विषाणु ने कर डाला मानों दिल में छेद। मास्क का नया कारोबार चल पड़ा। आधे चेहरे पर पर्दे का सरोकार चल पड़ा। मास्क के पीछे से बेफिक्र उबासी लो। मास्क के अंदर से मुस्कान और हंसी लो। पोशाकों से मेल खाते पहनते मास्क। आंख मूंद यूं ही नहीं खरीदते मास्क। नन्हें-मुन्ने के लिए छोटा बेबी मास्क। डाॅरेमाॅन,बार्बी,सुपर हीरो वाले मास्क। पर निर्दयी विषाणु से बचने के लिए दो गज दूरी। इसके संग साफ-सुथरा मास्क भी है जरूरी।        -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

घूरती आंखे

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घूरती आंखें तो आम बात है। इनका मौसम दिन-रात है। अबलाओं का जीना मुश्किल। कहीं भी आना जाना मुश्किल। कोई बंद कर दे ये घूरती आंखें। मनचलों की कट जाएं पांखें। नजरों से मानों करते बेध। नजरों का समझो हर भेद।             -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।