घरौंदा



घर का खाब देखनेवाले ही बनाते घरौंदा।
विशाल छायादार वृक्ष भी होते कभी पौधा।
घरौंदे होती कभी मिट्टी के,तिनकों के।
कभी लकड़ी के,कभी पत्थर के मनकों के।
कभी कागज के,कभी गत्ते के।
कभी रेत कभी सूखे पत्तों के।
नन्हें कलाकारों की होती कलाकारी।
घरौंदे लगते मानों कोई फुलकारी।
अब बने बनाये मिलते गुड़ियाघर।
बनालो इन्हें एक नन्हा चिड़ियाघर।
             -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण

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