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मां का टाइपराइटर......?

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                    टाइपराइटर  हां  टाइपराइटर टाइपराइटर ही तो बन गयीं हैं  मां........... हम सब के लिए । मां की  अनकही बातों को, माँ के दिल में, छुपे दर्द को, हम सब भाई बहिन के हाव भाव में स्पष्ट......! देखा जा सकता है। मानो माँ ने प्यार से , अपनी ममता भरी नाज़ुक उँगलियों से टंकित कर दिये हों टक...टक....टक ....टक.... एक..... एक............ शब्द.। हमारे  दिल और  दिमाग़, हमारी पेशानियों.......  पर ।  स्पष्ट पढ़ी जा सकती है, उनके प्यार की अमिट छाप। सच मुच इंसानी टाइपराइटर बन  गयी  हैं  मेरी माँ........  वो करती हैं हमारी देखभाल उनकी  सेवा,  उनका ख़्याल और क्या हम कर पा रहे हैं ? किन रास्तों में, हम जा रहे हैं? क्या कभी हम  बन पाए ? टाइपराइटर.................? माँ  जैसा....................?  माँ  का  टाइप राइटर....... सर्वाधिकार सुरक्षित @भूपेंद्र चौहान “राज” 

खुशनसीब

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“प्रिय रवि,  सुना है,अभी तुम्हारा वहाँ मन नहीं लग रहा है।  वापस घर आने का मन बना रहे हो, ऐसा कुविचार  तुम्हारे मन में क्यूँ आया? बताओ ऐसी  भी क्या वजह हो गयी, रजनी बता रही थी, भैया से बात हुई थीं बड़े  उदास  मन से उनकी बातों का  ज़वाब दिया था तुमने । सच बड़ी फ़िक्र कर रहे हैं,सब तुम्हारी। तुम्हारी उदासी......... क्या इसकी वज़ह मैं हूँ ? या फ़िर कोई अन्य वजह है..... नहीं  रवि ,  नहीं..... मैं तुमसे दूर थोड़े ही हूँ, तुम्हारे बिल्कुल क़रीब हूँ,  सच, कहती हूँ तुम्हारे सीने पे हाथ  रखकर देख लो, धड़कनों में महसूस करोगे मुझे, अपने दिल के करीब सच रवि, हमारा  प्यार,  कभी इतना खुदगर्ज़ नहीं हो सकता। कि तुम्हें अपने फ़र्ज़ों और कर्तव्यों,को  भुलाने  के लिए  मज़बूर कर दे ।  ऐसा हमारे जीवन में कदापि न होगा।  सोचो रवि, तुम्हारी लाडली बहिन पर,  उन हालातों में क्या बीतेगी  जब  वह सुनेगी , कि हर रक्षाबंधन पर उसकी रक्षा का वचन देने वाला  भाई , देश की रक्षा करने का अवसर  नसीब होने पर   ...

क़दम से कदम बढाये चल

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ज्ञान के  दीप जलाये  चल  सृजन  के गीत  गाये  चल ख़ून , पसीना  बहाये  चल बंजर जमीं लह लहाये चल कोशिशों के हल चलाये चल  क़दम से कदम मिलाये चल बोकर,बबूल, खायेगा ,फल न कभी हुआ,न होगा कल                                 आज नही तो मिलेगा कल जरूर, तुझे किये का फल    इंसानियत गले लगाये चल क़दम से कदम मिलाये चल हवा में मत  उड़  तू  इतना झूठा न कर,कोई, दिखावा दुनिया से क्या लेकर जायेगा अपने खाली हाथों के अलावा अज्ञान की बेड़ियाँ हटाये चल कदम से  कदम बढाये चल रिश्तों को तराजू में न तोल सबसे  रिश्ते  निभाये  चल                                   प्यार की  दौलत बटोर, यार परलोक ले  तू अपना सुधार करके दान,पूण्य,कमाये चल  कदम  से  कदम  बढाये  चल बात मेरी अब मान  ले  तू कुछ करने का ठान ले तू मछली की आंख...

छुप गया चांद

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    चेहरा छुपाए बैठे हो यूँ, बालों में      छुप गया हो चांद,जैसे बादलों में           बीच   भंवर  में  डूब  रहा हूं   मैं     पड गए  हैं  डिंपल  तेरे ,गालों में      कैद हो  गई  है खुशबू , बालों  में     लगा लिया है तूने गजरा, बालों में     आप याद आते रहे,हमें,मुसलसल       खबर भी नहीं ली हमारी, सालों में     उगते सूरज की लालिमा तो देखो     आपने लगाया है,मस्करा गालों में     कर  लूं ? आपसे  इजहार ए  मुहब्बत      या छुपा लूं “राज़” दिल के तालों में     भूपेन्द्र चौहान “राज”

अब हंसाएगा कौन?

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हर  शय  पे  बुरी  नज़र  है  मूरख तेरी जाग, बंदे तुझे  हर पल जगाएगा कौन? कहां,चले  गए आप हमसे यूं रूठकर नखरे  हमको  अब  दिखाएगा  कौन? तुझसे जुदा हूं, अफ़सोस नहीं मुझको यही फ़िक्र है,तुझे अब हंसाएगा कौन? भूपेन्द्र चौहान “राज़” 

सवेरा आएगा

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फिर भला अंधेरा, कब तलक टिक पाएगा, कल  फिर  दिन  निकलेगा, सवेरा आएगा, फिर भला अंधेरा, कब तलक टिक पाएगा, कल  फिर दिन  निकलेगा, सवेरा  आएगा, जीवन में उजियारा आएगा, सूरज लाएगा बन जाए तुम्हारा जीवन, अमावस की रात, हों जाएं कितने विपरीत,ऐसे तुम्हारे हालात दर्द, आंखों से कहीं, छलकने  ना देना तुम छिपाकर रखना दिल में,अपने हर जज्बात चलना होगा सदा तुम्हें,अपने वक़्त के साथ ढलना होगा,खुद को,समझनी होगी हर बात हल  करना पड़ेगा तुम्हें, जीवन का समीकरण सीखना पड़ेगा तुम्हें,हरेक रिश्तों का व्याकरण बार  बार आएंगी तुम्हें जीवन में मुश्किलात सुलझाना मसले,काबू में करने पड़ेंगे हालात    कल  फिर  दिन  निकलेगा  सवेरा आएगा, फिर भला अंधेरा, कब तलक टिक पाएगा,  भूपेन्द्र चौहान “राज”  

तिरंगे में लिपट कर आऊंगा मैं

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इकलौता तारा हूं मां मैं तेरी इन बूढ़ी आखों का तेरे जीवन  में  चांद  बनके  चमक  जाऊंगा  मैं छोड़ दिया है मैंने बचपन गांव की उन गलियों में सुनहरे  ख़्वाब  शहर  में  पूरे  कर  पाऊंगा  मैं तेरे दूध का कर्ज़  अब मैं चुका ना सकूं शायद वतन  की मिट्टी का मेरा हर फ़र्ज़ चुकाऊंगा मैं बंदूक  लेकर  सरहद  पे  डटा  हूं  सीना  ताने वतन  परस्ती  की  इबारत  लिख  जाऊंगा मैं राखी पर आने का तुझसे मेरा वादा था बहना अब तो बहना तिरंगे में  लिपट  के आऊंगा मैं भूपेन्द्र चौहान “राज” रतलाम,