क़दम से कदम बढाये चल
ज्ञान के दीप जलाये चल
सृजन के गीत गाये चल
ख़ून , पसीना बहाये चल
बंजर जमीं लह लहाये चल
कोशिशों के हल चलाये चल
क़दम से कदम मिलाये चल
बोकर,बबूल, खायेगा ,फल
न कभी हुआ,न होगा कल
आज नही तो मिलेगा कल
जरूर, तुझे किये का फल
इंसानियत गले लगाये चल
क़दम से कदम मिलाये चल
हवा में मत उड़ तू इतना
झूठा न कर,कोई, दिखावा
दुनिया से क्या लेकर जायेगा
अपने खाली हाथों के अलावा
अज्ञान की बेड़ियाँ हटाये चल
कदम से कदम बढाये चल
रिश्तों को तराजू में न तोल
सबसे रिश्ते निभाये चल
प्यार की दौलत बटोर, यार
परलोक ले तू अपना सुधार
करके दान,पूण्य,कमाये चल
कदम से कदम बढाये चल
बात मेरी अब मान ले तू
कुछ करने का ठान ले तू
मछली की आंख हो निशाना
अर्जुन से तीर चलाये चल
क़ामयाबी के झंडे लहराए चल
क़दम से कदम बढाये चल
कर न आंखें बन्द ,तू ,देखकर
सही या गलत, तू भेद कर
जिस थाली में खाये तू
उस थाली में तू , न छेद कर
नेकी के गुल खिलाये चल
क़दम से कदम बढ़ाये चल
न कर घमंड,न अकड़ तू
बदी की राह न पकड़ तू
श्रवण जैसा, बन जा बेटा
राम जैसे रिश्ते निभाये चल
नेकी की राह दिखाये चल
क़दम से कदम बढाये चल
भूपेन्द्र चौहान“राज”
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