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Showing posts with the label कविता गुज्जर

वो बन्द खिड़की

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वो बन्द खिड़की मुझे आज भी कोसती है मेरी आत्मा को हर पल झिंझोडती है  जहाँ से आती किसी की सिसकियाँ  मेरे कानो को हर पल नोचती है। वो बन्द खिड़की जिसके पीछे किसी के दिए संस्कार कराह रहे थे बूढ़े माँ बाप अपनी ही संतान द्वारा निर्ममता सेअत्याचार पा रहे थे। भूखे रह कर जिस औलाद को अपने हाथों से निवाला खिलाया था आज उसी अहसान फरामोश ने उन्हे दाने-दाने को तरसाया था उस कमरे की बन्द खिडकी के पीछे फर्श पर पड़े थे सर्द रात मे नीचे बिना बिस्तर और बिना कपड़ो के ठिठुरते थे दोनो सर्दी के थपड़ो से तोड़ दिया दम एक दिन हार के संतान के दिए एक एक वार से बस यही गम हर दिन है सताता काश मै उनके लिये कुछ कर पाता । कविता गुज्जर

बसंत पंचमी

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माघ शुक्ल की तिथी पंचमी  श्री पंचमी या बसंत पंचमी ज्ञान की देवी सुर की जननी प्रकटी जगत में हुई पीत अवनी  अज्ञानता हरले, हे वीणा वादिनी तन में नव सुधा भरदे, हे हंसिनी तिमिर हरले ज्ञान प्रकाशिनी विद्या बुद्धि दे, हे ब्रह्म संगिनी पीतांबर पहन ऋतुराज पधारे निरस उबाऊ क्षण सहारें  उमंग भरे वृक्ष पात निखारे खिली सरसों नव छटा बिखेरे तितलियों के रंगीन नजारें  लताएँ लिपटे चढ़ चोबारे महक उठी अंबुआ की बौरें  करें नृत्य पुष्पों पर भोरेँ  शीत ऋतु की करी विदाई बसंत संग नव चेतना लायी पावन पर्व की तिथी है आयी ढोल मजीरे ध्वनी दे सुनाई परिणय की बजत शहनाई मन्त्रों की गूंज करे पंडिताई कन्यदान से पिता मुक्ति पायी हर ओर खुशी से बँटे मिठाई कविता गुज्जर

आखिरी अदालत

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जब आखिरी अदालत मे तेरा मुझसे सामना होगा मुझे यकीन है पूरा पलड़ा मेरा ही भारी होगा एक तरफ होगी मेरी मोहब्बत  दुसरी ओर तुम्हारी जफा होगी एक तरफ होंगे मेरे बहाये आँसू तेरा मुझपे हँसना दुसरी ओर होगा जब चलेगा मुकदमा आखिरी अदालत मे तब मेरा वकील मेरा खुदा होगा। तब तुम पर लगेंगे इल्जाम बेवफाई के और चश्म्दीद गवाह ये आँसू होंगे। उस आखिरी अदालत के तराजू मे जब रखे जायेंगे सबूत तेरी जफा के तब मेरा वकील मेरी ओर से दिखायेग सबूत मेरी वफा के मुझे यकीं है मुकदमा ये चलेगा जब आखिरी अदालत मे तब हर बहस के बाद मुझे मिलेगी जीत आखिरी अदालत मे। कविता गुज्जर

आखिरी खत की सिसकियाँ

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सोया था मै अभी अभी तो लगी थी आँख अभी तो नींद की गहराइयों मे जाना मेरा बाकी था। किसी की सिसकियाँ ने मुझे नींद से जगा दिया। सहम कर उठ बैठा  डर सा लगने लगा । गौर से सुनने लगा उसी ओर बढ़ने लगा जहाँ से आ रही थी किसी की सिसकियाँ  देख कर हैरान हो गया  किताबों की अलमारी मे एक किताब के मध्य मे रो रहा था कोई यहाँ  मैने किताब उठाकर खोल कर देखा उसे भर रहा था सिसकियाँ  वो तुम्हारा आखिरी खत। वो खत जिसको लिखते हुये तुम्हारी आँखो से गिरे अश्रु आज भी इस खत के भीतर पीड़ा से कराह रहे थे। ये खत जो आज भी तुम्हारे उन आखिरी शब्दों को फिर से दोहरा रहा है ये तुम्हरा वही आखिरी खत है। कविता गुज्जर

वीरान हवेली

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ये जर्जर वीरान हवेली  खड़ी है जो हिम्मत हारे वो जो शहर चले गये उन्ही की राह निहारे है। जहाँ कभी शहनाईयों से  गूंजती थी दरो दीवारें  आज सन्नाटे ही सन्नाटे है यहाँ पावँ पसारे। कभी यहाँ ठकुराईन की पायल की आवाज से ठाकुर के दिल की बगिया खिला करती थी। और ठाकुर की बन्दूक की  आवाज से अक्सर  ये धरती हिला करती थी। जिस हवेली की प्रांगण मे सेवकों की चहल कदमी  दिन रात रहा करती थी। जहाँ दिन रात गावँ वालों का आना जाना रहा करता था। आज वो हवेली अकेली खड़ी  अपनी दुर्दशा पे रोया करती है। कविता गुज्जर

स्वदेश

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वो ह्रदय भी क्या ह्रदय है  जिसमे स्वदेश प्रेम नही निर्भाव, पाषाण सा प्रतीत हो जिस ह्रदय मे देश प्रेम नही वो कलम भी क्या कलम है जिसने स्वदेश लिखा नही वो कवि भी क्या कवि है जिसमे स्वदेश बसा नही वो कविता क्या कविता जिससे स्वदेश की बात ना हो वो रचेयता भी क्या रचेयता जीसने स्वदेश रचा नही  उन गजलो को क्या गाना  जिसमे स्वदेश अल्फाज नही उन गीतो का क्या करे जिसमे देश को सम्मान नही उस माटी क्या करेंगे जिसमे देश की महक नही उस मस्तक का क्या करेंगे जिसको देश पर गर्व नही   कविता गुज्जर

तुम मानो या ना मानो

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  तुम मानो या ना मानो  ये जो हमारा रिश्ता है इस जन्म का नही है ये रिश्ता है कई जन्मों का ये प्रेम हमारा साक्षी है,ये प्रेम आज का नही ये प्रेम है कई जन्मों का  तुम मानो या ना मानो तुम ही मेरे महिवाल थे और मै तुम्हारी सोहनी तुमने मेरी खातीर गायें चराई और मैं कच्चे घड़े पे तैर आयी थी तुम मानो या ना मानो  तुम ही मेरे फरहाद थे और मै ही तुम्हारी शीरी तुम मेरे लिये अपनी जान पर खेल गये तो मैने तुम्हारे कदमो मे अपनी जान दे दी तुम मानो या ना मानो तुम ही मेरे मजनूँ थे और मै तुम्हारी लैला तुमने मेरे लिये लोगों के पत्थर खाये  और मैने भी तुम्हारे लिये अपने प्राण त्यागे तुम मानो या ना मानो तुम ही मेरे राँझा थे और मै तुम्हारी हीर तुमने मेरे लिये प्राण त्यागे और मैने भी तुम्हारे लिये विष पिया था तुम मानो या ना मानो  तुम मानो या ना मानो  कविता गुज्जर

सूर्यास्त

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देखो अस्त हो रहा सूर्य प्रिये अब तो दर्शन दे दो भोर से श्रिंगार किये खड़ी मै चौखट पर थक कर चूर हो रहा गात ये प्रिय अब तो दर्शन दे दो सूर्य अस्त हो गया तो अन्धकार का पहरा होगा इस गावँ की अन्धेरी रात मे कैसे देखूंगी चेहरा तुम्हारा  दिन का आखिरी पहर ढल रहा प्रिय अब तो दर्शन दे दो। सूर्य अस्त अब होने को है नैना तरस रहे है पल-पल सूर्य संग ये जीवन मेरा  देखो अस्त हो ना जाये प्रतीक्षा मे खड़ी मै कब से प्रिय अब तो दर्शन दे दो। सूर्य अस्त से पूर्व ही पंछि लौट आये घर को वृक्षों की शाखायें झूम रही जोड़ों के कलरव से। मै अकेली विरहन हूँ प्रिय अब तो दर्शन दे दो     कविता गुज्जर

बलात्कार

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भारत मे हर उस स्त्री का होता है बलात्कार  जिस पर अरेंज मैरीज के नाम पर होता आया है अत्यचार  उस स्त्री की सौंप दिया जाता है एक ऐसे पुरुष के हाथो मे जिसे उसने कभी देखा तक नही था और पहली ही मुलाकात मे उसे लिटा दिया जाता है  एक ऐसे इन्सान के बिस्तर पर जिसे उसने कभी चाहा ही नही और उसका पति परमेश्वर  भूखे भेडिये की तरह टूट पड़ता है उस पर नोचने को उसके जिस्म को उस वक़्त हो रहा होता है बलात्कार एक स्त्री का, समाज की मर्जी से और पूरा समाज बैंड बजे के साथ  मनाता है खुशियाँ एक स्त्री के बलात्कार की क्या कभी किसी ने पूछा है किसी स्त्री से उसके मन के भाव  क्या गुजरी उसके मन पर जब हुआ था बलात्कार और जिसे सुहागरात का दे दिया गया था नाम उस रात आँखो मे आँसू भर कैसे उसने गुजारी थी रात और एक अंजान के हाथो किया गया था उसे शर्मसार और केवल एक बार नही एक पति नाम के प्राणी ने उसकी मर्जी के खिलाफ  ना जाने कितनी बार किया उसका बलात्कार कविता गुज्जर

अखबार की सुर्खियों

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अखबार की सुर्खियों मे मेरा नाम चमक रहा था जिसे देखने को कब से मन तरस रहा था मेरी बड़ी सी तस्वीर के नीचे मेरा नाम दमक रहा था और मेरे नाम के साथ 'कवियत्री ऑफ़ दा ईयर' सज रहा था हर अखबार की सुर्खियाँ बस यही दिखा रही थी मुझे मेरे सपने से अवगत कर रही थी। मै जो निकली मौहल्ले मे कदम मेरे चल रहे थे सांसे मेरी दिव्यांग की भांति लडखडा रही थी अखबार लिये  हाथो मे थोड़ा आगे बढ़ी थी कुछ पडोस की औरते मुझे घेरे खड़ी थी। मुबारकबाद की झड़ि अभी लग ही रही थी एक के बाद एक बधाई ही रही थी। पीछे से दौड़ता एक बच्चा आया जोर से उसने धक्का दीया। जोर से फर्श पर आ गिरि स्वपन से बाहर आ पड़ी       कविता गुज्जर

तुलसी माँ या सांता क्लाज़

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मुझे नही पता सांता क्लास का ये मेरे संस्कारो मे नही बस इतना पता है मुझे 25 दिसम्बर को तुलसी दिवस है। यही मेरे संस्कार है,जो मुझे मेरी माँ  ने दिए और बताया कैसे दुख हर लेती है,तुलसी माँ  और यही संस्कार मैने दिए विरासत मे अपनी बेटी को बस एक चिराग सुबह शाम  इसके चरणो मे अर्पित करो और मुह माँगी मुराद से अपनी अपनी झोली भरो नित सुबह स्नान कर जल अर्पित करो घर मे सुख और शान्ती भरो। हर लेती है तुलसी माँ  कष्ट सभी आने वाले दुखो को अपने उपर झेल सूख जाती है तुलसी हरी-भरी। तुलसी माँ का पूजन कर  नारी रहे सौभाग्यवती। तुलसी माँ रक्षा करे हर भक्त के सुहाग की। जो नारी करे पूजा तुलसी मात की छाया मे रहे सदैव अपने नाथ की।      जय तुलसी माँ     कविता गुज्जर

वैश्विक तापमान(ग्लोबल वार्मिंग)

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पृथ्वी पर निरंतर और तेजी से बढ़ते तापमान को वैश्विक तापमान कहा जाता है। इसके बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे है जो मानव के साथ-साथ खुद पृथ्वी के लिये भी एक बड़ा खतरा है।पृथ्वी पर हो रही गतिविधियां इसमे निरंतर वृद्धि कर रही है। आम इन्सान तो वैश्विक तापमान के बारे मे जानता ही नही है।सबसे पहले तो हमे हर व्यक्ति तक यह जानकारी पहुँचानी चाहिए की वैश्विक तापमान क्या है और इसके खतरे क्या है।इसको नियन्त्रित करना बेहद ही चुनौति पूर्ण कार्य है किन्तु नामुमकिन नही है। सरकार को चाहिए की लोगों को वैश्विक तापमान के प्रति जागरूक करे और इससे हो रही हानियों के बारे मे बताएं । सबसे पहले तो हमे वैश्विक तापमान के कारणों का पता होना चाहिए। यूँ तो वैश्विक तापमान के बढ़ने के बहुत से कारण है किन्तु ग्रीन हाउस से निकलने वाली गैसें इसका बहुत बड़ा कारण है।इससे निकलने वाली गैसे कार्बन डाई ऑक्साइड और मिथेन पृथ्वी से बहार नही जा पाती और यहीं रह कर पृथ्वी के तापमान मे वृद्घि करती है।आटोमोबाइल का बढ़ता उपयोग भी तापमान मे वृद्घि का प्रमुख कारण है। लेकिन सबसे बढ़ा और गम्भीर कारण वनो की कटाई है। जब पेड़-पौधे ही नही रहेंगे तो ...

तेरी मेरी कहानी

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ये तेरी कहानी ये मेरी कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी  कोई किनारा इसका नही कोई सहारा इसका नही  बेअंत की ये कहानी  अधूरी है अधूरी रहेगी एक प्यास तुझमे भी है एक प्यास मुझमे भी है मृग तृष्णा सी ये कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी एक अहसास तुझमे भी है  एक अहसास मुझमे भी है महसूस होकर भी ये कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी एक तड़प जो तुझमे भी है एक तड़प जो मुझमे भी है एक कशिश की ये कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी हमारे मिलन की एक चाह जो तुझमे भी है मुझमे भी बिना मिलन के ये कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी ये तेरी कहानी ये मेरी कहानी अधूरी है अधूरी रहेगी।         कविता गुज्जर

बूढ़ा बरगद

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मेरे गाँव के पुश्तैनी घर के  सामने खड़ा ये बूढ़ा बरगद  साक्षी है मेरी कई पीढ़ियों के सुख और दुःख का मेरे घर का प्रहरी बन खड़ा ये बूढ़ा बरगद  ना जाने मेरी कितनी पुश्तों का  लेखा जोखा लिये खड़ा है ये साक्षी है, मेरे गाँव के बुजुर्गों की उन सभी बातों का  जो इसकी छाँव मे बैठ कर की गई इस बूढ़े बरगद की बाहों मे झूल कर गाँव के कितने बच्चे आनन्द विभोर हुआ करते थे ये बूढ़ा बरगद साक्षी है  हर उस घटना का जो इस गांव मे घटित हुई और साक्षी है उन शहनाईयों का  जो इस गाँव मे बजती आयी है ये बूढ़ा बरगद ना जाने  कितनी तकलीफे को झेल कर  आँधी,बारिश, तूफान मे पहाड़ की भांति आज भी अडिग खड़ा है। इसी की छाँव मे बैठ कर गाँव कर बुजुर्ग अपने सुख दुख के पल बाँटा करतें थे ये साक्षी है उन सभी फैंसलो का जो पंचायतो ने इसी की गोदी मे बैठ कर सुनाया करते थे। कविता गुज्जर

सफलता का प्रण

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प्रचंड वेग है सपनो का बहा ले जाता संग दिशा हीन सी बहती हूँ धुंधला सा जीवन का रंग अखण्ड प्रण है जीवन को दिशा एक दिखानी धुंधले से इस जीवन मे पारदर्शिता लानी है भाद्र पाद की बूंदों सी गरजुँ भी और बरसुँ भी वेग तूफानी हवा का ले गली गली से गुजरुँ भी उदंड चाल सी धरती की उथल-पुथल मचानी है बावंडर से निकाल के कश्ती किनारे तक ले जानी है घमंड तीर हो नज़रो मे असफलता को घुरुं मै स्वर्ण मुकुट हो मस्तक पर सफलताओं को चुमू मैं कविता गुज्जर

शिक्षा प्रणाली

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वाह रे वाह, शिक्षा प्रणाली भारत की शिक्षा प्रणाली  किताबों के बोझ ने जान बच्चों की ले ली  स्लेबस की दरों दीवारों मे कैद हो गया बचपन होम वर्क मे सिमटे रह गये  बालपन ये नटखट आँख खुले स्कूल मे शाम कटे किताबों मे थोड़ी कसर जो रह गयी, वो पूरी कर दी टयूशन ने कब तक अत्यचार चलेगा ऐसा दुर्व्यवहार चलेगा शिक्षा के नाम पर बचपन का संहार चलेगा कब तक सीधा खड़ा रहेगा झुके हुये कन्धों पर कभी तो लडखड़ायेगा  भविष्य भारत देश का आओ मिलकर आवाज उठायें  सोती हुई सरकार उठायें  नन्हे-नन्हे कन्धों को सीधा रहकर चलना सिखाएं  अब तो बदलो शिक्षा प्रणाली  अब तो किताबें कम करो बच्चे भविष्य भारत का है आओ भारत का उद्धार करो कविता गुज्जर

गुप्तचर (एक जासूस)

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भेजा राम ने एक गुप्तचर जाओ प्रजा के बीच जाओ देखो कैसी दशा प्रजा की हाल सुनाओ आकर मुझको गया गुप्तचर भेस बदल नगर नगर घूमा रात भर लिया हाल प्रजा के मन का हिल गया अन्त:स्थल दिल का पहुँचा राजा राम के सम्मुख मौन धारण किये निज मुख कैसे सुनाये वृतांत सारा श्री राम के खड़ा उन्मुख बार बार पूछे श्री राम  कहो गुप्तचर सारा वृतांत जो कुछ सुना प्रजा मे जाकर कहो मुझसे निडर होकर पत्थर बन खड़ा गुप्तचर  वाणी पर लगा विराम कर जोड़े शीश झुकाये  थर-थर काँप रही जुबान  सुनकर आया जो प्रजा से कह डाला सारा वृतांत प्रजा कैसे बनी निर्मोही अधीर हुये प्रभु श्री राम  माँ सिया पे लाछन लगाया हाय! कैसा खेल रचाया  सुनकर हाल प्रजा का राम ने माँ सिया को वनवास पठाया।

प्रेम साधना

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हे प्रिये! तुम्हारी प्रेम साधना कर  मैने तुम्हे साध लिया है तुम्हारे प्रेम पथ पर मैने अखंड परधाम पा लिया है तुम्हारे नाम रुपी मणको से   सदैव तुम्हारा सुमिरण किया है मैने जो निषकाम भाव से  जो तुम्हारी प्रेम साधना की है, उसी निष्काम साधना से मैने तुम्हे और तुम्हारे प्रेम  दोनो को साध लिया है हे प्रिये! मै प्रेम साधना मे लिप्त मीरा बन सदैव तुम्हारा गुणगान करती हूँ तुम्हारी प्रेम साधना मे मै राधा बन सदैव तुम्हारा इन्तजार करती हूँ  मेरी साधना के वशीभूत हो जब तुम मेरे पास खींचे आते हो हे प्रिये! तब तुम भी मेरी साधना से  अछूते कहाँ रह जाते हो। कविता गुज्जर

आराधना

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पर्याप्त है मेरे लिये  बस एक ही आराधना माँ है आराध्य मेरी करुँ उन्ही की अर्चना ममतामयी स्पर्श से हर लेती जो हर दुख मेरा करुणामयी दृष्टी से  हर लेती सन्ताप मेरा  आराधना कर जोड़ करूं  मै माँ का प्रतिरूप बनु  अराध्य मेरी माँ रहे मै उनकी आराधना करूं आराधना मेरी पूर्ण हो जाये जब माँ का गुणगान करुँ  कभी ना बदले भगवान मेरा  आराधना उनकी हर हर बार करुँ आराधना मे जो सुख मिलता वो कहाँ, कहीं ओर मिले मन जब बेचैन हो आराधना से ही चैन मिले

यादों की बारात

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दश पराया देश पराया देश पराया वेश पराया आज फिर मन भर आया याद आई उस छोटे से शहर की भाई-बहन और शाम के पहर की माता-पिता और प्यारी नानी कभी सुनाते थे कहानी कभी लड़ते भईया हमसे कभी हम भईया से लड़ते लड़ते - लड़ते फिर अचानक किसी बात पर मिलकर हंसते अब ना भईया और न बहना अकेले सब ने ये दुख सहना बहन चली गई ससुराल सपनों की जलाए मशाल और भईया नौकरी पे भाभी को ले अपने साथ माँ अकेली तन्हा लाचार पिताजी को करती याद जीवन काट रही है ऐसे घर मे ही काटे जैसे वनवास मै भी बैठी अपने समुराल कॉल पे ही पूछूँ हाल कविता गुज्जर