गुप्तचर (एक जासूस)

भेजा राम ने एक गुप्तचर
जाओ प्रजा के बीच जाओ
देखो कैसी दशा प्रजा की
हाल सुनाओ आकर मुझको

गया गुप्तचर भेस बदल
नगर नगर घूमा रात भर
लिया हाल प्रजा के मन का
हिल गया अन्त:स्थल दिल का

पहुँचा राजा राम के सम्मुख
मौन धारण किये निज मुख
कैसे सुनाये वृतांत सारा
श्री राम के खड़ा उन्मुख

बार बार पूछे श्री राम 
कहो गुप्तचर सारा वृतांत
जो कुछ सुना प्रजा मे जाकर
कहो मुझसे निडर होकर

पत्थर बन खड़ा गुप्तचर 
वाणी पर लगा विराम
कर जोड़े शीश झुकाये 
थर-थर काँप रही जुबान 

सुनकर आया जो प्रजा से
कह डाला सारा वृतांत
प्रजा कैसे बनी निर्मोही
अधीर हुये प्रभु श्री राम 

माँ सिया पे लाछन लगाया
हाय! कैसा खेल रचाया 
सुनकर हाल प्रजा का राम ने
माँ सिया को वनवास पठाया।

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