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Showing posts with the label अनीता शर्मा

माँ

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एक शब्द में संसार समाहित, जग जननी है माँ। कितनी भोली, कितनी प्यारी, मुझे प्यारी है माँ । सबकी बातें सुनती है पर... कभी न बदले माँ। त्याग-तपस्या की साक्षात मूरत, धैर्यवान है माँ। सबका ध्यान बराबर रखती , अन्नपूर्णा है माँ। घर को सुव्यवस्थित रखती , श्री महालक्ष्मी है माँ। हम बच्चों को डांट डपट कर, संस्कारित करती है माँ। हम बच्चों की प्रगति देख कर, खुश होती है माँ। थोड़ा सा बस ध्यान धरो तो... दुआ देती है माँ। कितना प्यार,कितनी दुआएं, हमको देती है माँ। पापा का भी ध्यान रखे , ऐसी होती है माँ। प्रथम शिक्षिका हर बच्चे की होती है प्यारी माँ। -----अनिता शर्मा झाँसी ------मौलिक रचना

शामिता!!

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शामिता की उम्र कोई बाईस वर्ष पार की होगी कि उसके माता-पिता ने लड़के और घर परिवार देखना शुरू किया।साधारण परिवार था पिता दफ़्तर में क्लर्क थे।दो छोटे भाई थे,हाँ पढ़ने में सभी साधारण थे।शामिता की मामी ने अपनी चचेरी बड़ी का परिवार और उनका बेटा बताया।जीजाजी ऑफीसर थे रिटायर होने के बाद वकालत कर रहे थे जो बहुत अच्छी चल रही थी और हाई कोर्ट के मुकदमों में सफलता हासिल कर रहे थे।उनका बेटा मर्क कम्पनी में एम आर था।परिवार सात्विक दंदफंद से दूर। बिना लेन देन के शादी हुई।पर शामिता संयुक्त परिवार को कभी अपना नहीं पाई।काम सिर्फ रसोई का भी न संभलता।पति आदित्य मेहनत करता और हंसी खुशी से रहता।एक समय जरूर कुछ उखड सा गया था जब बिना दिखाये और बिना मर्जी जाने उसकी माँ शामिता के हाथ में चांदी का सिक्का थमा पक्का कर आई थी रिश्ता।कयी बार शामिता से अप्रसन्न होकर जब आदित्य से उसकी शिकायत करती तो वह साफ कह देता---"तुम्हीं ने सिक्का रखा था भुगतो"।शायद तभी आदित्य की माँ ने कभी भी कुछ आदित्य से नहीं कहा।हाँ शामिता की किसी भी हरकतों को चुपचाप सहने लगी।और एक दिन.......जब आदित्य अपनी कम्पनी की ओर से डाक्टरस् को...

बहुत याद आता है माँ का आँगन!!

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बहुत याद आता है माँ का आँगन जहाँ बीता था मेरा बचपन। जिस आँगन में खेल बढ़े थे तब, न सोचा था छूटेगा आँगन । जब-जब तुमने मुझे पुकारा था, छोड़ सभी को दौड़ी आती थी। आज जब जाती हूँ तब-तब, आँखे भर नम हो जाती हैं। वीरान सा लगता अब घर-आँगन, जहाँ चहक-रौनक बसती थी। तुमसे कितनी रौनक थी माँ घर में, अब बस यादें और यादें साथ है। चलचित्र की तरह दिखती हो आंखो में, दिल में मेरे हमेशा बसती हो। वो आँगन जहाँ मैं खेली कूदी, अब स्वप्न तुल्य हुआ है। माँ का आँगन,माँ का आँचल , सुखद अनुभूति का एक चित्र । आँगन में धूप तापना,गर्म चाय हमें थमाना, सच माँ,याद बहुत आती हो। ममता का एहसास साथ है ,पर... माँ आँगन तो है,पर तुम कहाँ हो। अब नहीं भाता वो आँगन माँ, जहाँ साथ न तुम होती हो। स्वप्न में भी न सोचा था मैंने, रहना होगा बिन तेरे माँ। छूट गया अब तेरा आँगन। ------अनिता शर्मा झाँसी ------मौलिक रचना

आन्टी बहनजी

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पचमढी की शीतल वादियों में जहाँ कण-कण में शिव बसते हैं।हर चट्टान पर शिव वासुकी नजर आते है।बहुत खूब नज़ारा झरने अप्सरा बिहार का देखने को मिलता है तो दूसरी ओर जटाशंकर में अथाह शान्ति। मेरे पिताजी का तबादला कैन्टोनमैन्ट बोर्ड के छावनी अधिशासी अधिकारी पद पर।छोटे ही थे हम सब भाई बहन। एक प्राइमरी स्कूल की टीचर जो कि ईसाई थी वे शुक्लाजी के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाने लगी।सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि तभी शुक्लाजी और मैडम का झुकाव एक दूसरे के प्रति बढ़ने लगा और एक दिन अचानक उन्होंने शादी कर ली।शान्त वादी में जैसे भूचाल ही आ गया।सभी लोग तरह तरह की बातें करने लगे।शुक्ला जी के घर......एक तूफान!!बच्चे समझ नहीं पा रहे थे .....ये सब क्या हुआ वहीं मिसेस शुक्ला ....अंदर तक हिल गयीं और उनकी मनःस्थिति दिन पर दिन बिगड़ती गयी।धीरे-धीरे लोगों ने उनके रिश्ते को स्वीकार कर लिया अब मिसेज शुक्ला 2आंटी बहिनजी कहलाने लगी।बच्चों से माँ की हालत देखी नहीं जाती थी पर कर भी क्या सकते थे,शायद ईश्वर सहन शक्ति के साथ समझदारी देकर अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं।बड़े बेटे ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और बहन को पढ़ाया संभाला।इसी बीच ...