गुरु एवं गुरु पूर्णिमा
परिवार तो प्रारंभिक पाठशाला होती है, मां बाप भाई बहन प्रथम गुरु। शिक्षा का असली ज्ञान तो, होता है अपने आशियाने से ही शुरू।। फिर दाखिला होता है हमारा, उच्च शिक्षा के लिए विद्यालय में। एक पुजारी जैसे परम उर्जा की प्राप्ति हेतु, नित जाता है देवालय में।। फिर होता ईश्वर का सामना, एक नए अद्भुत गुरु रूप में। पुनः नवीन प्रतीति से प्रभावित होकर, ओजस्वी हो जाते हम विद्या के धूप में।। अनमोल अनुभव जुड़ जाते हैं, गहन अध्ययन एवं संप्रीति से। फिर वही विद्वता साक्षात्कार कराती है हमें, हमारे उज्जवल भविष्य व उन्नति से।। सफलता की राह सरल नहीं होती, उसके लिए कर्म तो करना होगा। सुखद लक्ष्य की प्राप्ति हेतु, कठिन श्रम तो करना होगा।। कैसे प्रेम व सम्मान है जीवन संबल, वास्तविकता का पाठ पढ़ाते हैं। करके हमारा मार्गदर्शन हमें, गलत सही से अवगत कराते हैं।। संस्कारों की परीपूर्ति के लिए, आत्मा ने लिया नया जन्म है। शीश झुका कर करो सब वंदन, गुरु ही महेश्वर गुरु ही परब्रह्म है।। जो अमल करते गुरुजन के आदेशों का, वही यथार्थ पथ प्रदर्शक है। जिनके अनुसरण से जीवन यात्रा सुगम हो ज...