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Showing posts with the label संस्मरण

प्रेम की निशानी- काला तिल

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------------------------ कई साल बीत गए,पर हर दिन जब भी मैं आईने के सामने खड़ी होती हूँ, तुम्हारी याद बिना वजह ही आ जाती है।मैं कतई नही चाहती कि तुम कभी भी याद आओ लेकिन तुम्हारे कहे शब्द अक्सर मुझे तुम्हारी याद दिला जाते है। तुमने कहा था जब भी आईना देखो तो मुझे याद रखना.....ये तुम्हारे गले में काला तिल है न....ये मैं हूँ...अब बोलो कभी भुला पाओगी मुझे? तुम चले गए,समय बदले ज़माना हो गया,कोई कारण भी नही तुम्हे याद करने का...फिर भी .....जब भी आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो.....तुम्हारी ये प्रेम की निशानी दिख जाती है।मुझे ही क्यो ,अक्सर गले के मेरे इस तिल को देखते हुए कहते है....ये बहुत सुंदर है,मेरे चेहरे पे मीठी मुस्कान आ जाती है।किसे क्या कहूं.... लोगो के पास बहुत कुछ होता होगा पर मेरे साथ तो तुम न होते हुए भी मेरे पास 24 घण्टे मौजूद हो। श्रद्धा निगम बाँदा उप

आपबीती..

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एक छोटा सा किस्सा सुना रहीं हूँ.... ।  बात आज से कुछ वर्षों पहले की हैं....। मेरी छोटी बेटी कुछ साल भर की थीं...। हम सभी सपरिवार एक शादी के संगीत समारोह में गए हुए थे...।  समारोह एक बहुत ही बड़े हॉल में रखा गया था... बेहद करीबी रिश्ता होने की वजह से हम सभी समय से बहुत पहले पहुँच गए थे...।  संगीत समारोह के बाद ही खाने पीने का प्रोग्राम था..।  शादी एक बहुत ही रहीस पार्टी के घर में थीं....।  मैं अपनी शादी के बाद पहली बार उनके परिवार से मिल रहीं थी..।  हम अपने घर से भी बहुत पहले निकले थे...।  अब हुआ यूँ की घर से निकलकर और वहाँ पहुंचने के दरमियान फिर वहाँ सबसे मिलना जुलना.... संगीत समारोह की शुरुआत.....इन सभी में तकरीबन दो से तीन घंटे बित चुके थे...।  बच्ची छोटी थी और इस दौरान अब वो भूख से बेहाल हो चुकी थी...। हमने अपनी सासु जी को कहा... लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया....। पतिदेव जी और घर के बाकी सभी सदस्य नाच गाने में व्यस्त थे...। बच्ची की भूख बढ़ती गई और उसने रोना शुरू कर दिया...। हमने वहाँ मौजूद घर के सदस्यों से कोई एंकात जगह के बारे में पुछ...

"आपबीती ज़िन्दगी के संस्मरण"

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आज 'रश्मिरथी' ने दैनिक लेखन के लिए विषय दिया है-'आपबीती' तो साथियों वही हुआ न जो कुछ हमारे जीवन में घटित हुआ हो उसका सच्चा विवरण, तो लीजिए मैं आज आपको अपने जीवन के कुछ आह्लादित करने वाले सच्चे संस्मरण से अवगत कराती हूँ  -: 'बिल्ली रानी बड़ीसयानी, पीती दूध बताती पानी। पता नहीं कब, किसने और कैसे ये कहावत ईजाद की होगी?पर ऐसा होता बिलकुल नहीं। सच तो यह है कि इंसान को छोड़कर दूसरा कोई भी जीव झूठा,धोखेबाज और एहसान फरामोश कभी नहीं होता। वह हमेशा नेकनियती, प्रेम और अपनत्व का जवाब उसी तरह अपितु उससे बढ़कर ही देता है। ये सुनी सुनाई बात नहीं अपितु स्वयं का  अनुभव कहता है।             बहुत से लोग बिल्ली को अपशकुनी मानते हैं पर ऐसा नहीं है।यदि आपने उसे प्यार-दुलार दिया है तो वह अंतिम सांस तक आपका भला ही चाहेगी।                मेरे पास बिल्लियों की  कई-कई जेनरेशन रही है।बड़े खूबसूरत अनुभव दिए हैं उन्होंने। न जाने कितने संस्मरण बसे हुए हैं मेरे स्मृति-कुंज में।              ...

खेल खिलौने और हमारा बचपन

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अभी थोड़े दिनों की ही तो बात लगती है ,जब हमारे खेलों में पिट्ठू गर्म ,कंचे ,गिल्ली डंडा और गली क्रिकेट शामिल होता था। गली-गली में इन खेलों का जोश, इन से मिलने वाली खुशी और जीतने का जज्बा  हर चेहरे पर उत्साह झलकता था, गलियां आज भी वही है पर खेल का उत्साह कुछ फीका फीका सा है । पुराने लोग बताते हैं खेलने के लिए उस समय संसाधनों की बिल्कुल भी जरूरत नहीं होती थी । बस दोस्तों का जज्बा हो तो जो मिलता था उसी से खेल लेते थे । आज भी पुराने दिनों को याद कर चेहरे पर बाल सुलभ चंचलता पुराने लोग के चेहरे पर खिलखिला उठती है । पहले क्रिकेट में खेलने में जो मजा आता था आज वह आईपीएल या विश्व कप देखने में भी नहीं आता । घरों से दोस्तों की टोली बगैर मोबाइल के भी तय समय पर बगैर किसी सूचना के लोकेशन पर अपने आप पहुंच जाती थी । हर घर की दीवार विकेट के तौर पर देखी जाती थी । लकड़ी का एक टुकड़ा बैट बन कर और कपड़ों को इकट्ठा करके बाल भी तैयार हो जाती थी । उस समय खेल को लेकर जितना उत्साह और आनंद आता था ,आजकल की पीढ़ी उसको महसूस भी नहीं कर सकती। पहले गांव में या शहर के मध्यमवर्गीय परिवारों में बाजारों में म...

लक्ष्मी निलयम् हमारा घरौंदा

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 लक्ष्मी निलयम् हमारा घर, हमारा घरौंदा जिसकी बाहों में दुबक कर मिलने वाला सुख अप्रतिम है, कण कण में हमसब और लक्ष्मी निलयम् आपस में रचे बसे, कितने भी दूर चले जाओ पर हल्की सी याद कर लक्ष्मी निलयम् में ही हम अपनेआप को पाते हैं । लक्ष्मी  निलयम के बड़े दरवाजे की ओट में लगा गुलाब का पेड़ अपनी खूबसूरती और खुशबू से सबको अपने खिलखिलाते सौंदर्य से आकर्षित कर ही लेता है। गेट पर कदम रखते ही प्रत्येक आगंतुक का शालीन स्वागत गुलाब ही करता है । तरह-तरह के पेड़ पौधों को पनपने और खिलने का पूर्ण आनंद प्रदान किया है पिताजी ने लक्ष्मी निलयम् में । पेड़ पौधों के साथ दिनचर्या में रंग भरते पिताजी अधिकतर चाय भी अपने बगीचे में पीना पसंद करते हैं । अधिकतर सुबह की चाय बना लेने पर ,अम्मा पिताजी को चाय पीने के लिए बुलाने के लिए ,बगीचे में ही आती हैं । दोपहर में भी पिताजी खाना खाने के बाद गर्मियों में पेड़ों की प्यास को महसूस कर पेड़ों को पानी देकर पेड़ों की प्यास शांत करते हैं । कहने को तो अमरूद का एक ही पेड़ है ,पर जब उस पर फल लगते हैं तो उसकी डालियां फलों से लद कर प्रसन्नता से धरती को चूम चूम कर...

"यादगार वो अमरूद का पेड़"

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अमरूद का पेड़ देखकर मुझे अपना बचपन याद आ जाता है।कई बार कुछ चीजे हमे अपने बचपन की ओर खींच ले जाती है।और हम उन मीठी मीठी यादों में खो जाते हैं। अक्सर छुट्टियों के समय हम अपनी नानी-नाना के गांव जाया करते थे। मेरे नाना के घर के आंगन में ही बहुत बड़ा अमरूद का पेड़ था, जिसकी शाखाएं पूरे आंगन में फैली हुई थी। जैसे ही हम घर पहुंचते सबसे पहले हम सब भाई बहन उस अमरूद के पेड़ पर ही चढ़ते और मीठे-मीठे अमरूद तोड़कर खाते। और खूब मस्ती करते। हमारा सारा दिन उस अमरूद के पेड़ के आसपास ही बीतता। कभी पेड़ पर चढ़ते, तो कभी पेड़ के नीचे बैठकर मिट्टी के खिलौने बनाते। नाना-नानी के घर जाने से हम हमेशा खुश होते कि अमरूद के पेड़ पर चढेंगे खूब मस्ती करेंगे। एक तरह से वो अमरूद का पेड़ घर का एक सदस्य था। मेरी मां का बचपन भी उस अमरूद के पेड़ के छांव में बीता। उस पेड़ से जुड़ी कई यादगार क़िस्से मां आज भी बताती है। कहीं ना कहीं उनकी बचपन की यादें और हम भाई-बहनों के बचपन की यादें एक साथ ही जुड़ी हुईं हैं। कितना सुंदर और प्यारा मासूम सा वो बचपन का दिन ,जो जीते जी मेरे स्मृति पटल पर हमेशा रहेगा। वक्त के साथ-साथ व...

"आखिरी खत"

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      आज रश्मिरथी  का विषय ही है "आखिरी खत " क्या बताऊँ खतोखिताबत यानि कि पत्र-व्यवहार का सिलसिला ही एकदम खत्म हो गया है। वो भी क्या सुनहरे आशान्वित दिन थे जब डाकिया महोदय का इन्तजार और देखते ही अपनी डाक के विषय में जानकारी प्राप्त करना भी प्रतिदिन की दिनचर्या में सम्मिलित हुआ करता था। खास-खास मित्रों व परिवारी जनों के पत्रों को सहेज कर रखना, समय मिलने पर उन्हें उलट पुलट कर पढ़ना भी कितना रुचिकर हुआ करता था। सभी के पत्रों का उत्तर लिखना भी आवश्यक कर्त्तव्य में शामिल हुआ करता था। कभी विलंब हो हो जाए तो पत्रोत्तर की प्रथम पंक्ति में ही क्षमा याचना संस्कारित होने का परिचय देती थी।     अभी कुछ दिन पहले की ही बात है मैं अपनी एक डायरी खोज रही थी कि मुझे सन् 1979 का अपने बाबू जी का लिखा हुआ एक पत्र मिल गया,☺☺😍😍😊😊सच मानिए मैंने उस पत्र को बारम्बार पढ़ा,रखने का मन ही नहीं हो रहा था,तत्कालीन सारे परिदृश्य आँखों के समक्ष चलचित्र की भांति घूम रहे थे। मैं अपने उन एहसासों को शब्दों में पिरो नहीं सकती।उस पत्र के दो माह बाद ही बाबू जी को पैरालिसिस का अटैक फिर सन् 1983 ...

जिंदगी और सफर

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 मानव खोजी अपनी खोजी प्रबृत्ति के कारण जगह जगह की सभ्यता, संस्कृति, संस्कार ,भाषा, बोली और वातावरण ,इतिहास को जाजने के लिये एक जगह से दूसरी जगह जाता आता रहता है साहित्य में यात्रा संस्मरण लिखे जाते है जो समचीन समाज को सार्थक संदेश तो देते ही है कुछ जानने सीखने का अवसर भी प्रदान करते है ।। जयेंद्र के पिता पंडित जसराज एक साधारण परिवार के मुखिया थे जयेंद्र तीन भाइयों निकुंज ,नीरव में सबसे छोटा था बचपन से ही जयेंद्र का पढ़ने लिखने में कम घूमने फिरने में अधिक मन लगात जब गांव के आस पास कोई मेला या सांस्कृतिक कार्यक्रम होता वह पिता जसराज और भाइयों निकुंज और नीरव को बिना बताए ही चला जाता कभी कभी हप्तों महीनों घूमता घर वाले परेशान होते उसको बिभिन्न स्थानों पर खोजते परेशान होते जब कुछ पता नही लगता तो भगवान भरोसे छोड़ बैठ जाते तब तक जयेंद्र घूम फिर कर लौट आता एक दो बार तो घर वाले जयेंद्र की इस हरकत से परेशान हुए जब संमझ गए कि उसकी आदत है तो ज्यादा परेशान नही होते उसके भाई पढ़ने में मन लगाते वही जयेंद्र का मन पढ़ने में विल्कुल नही लगता और घूमने फिरने में अधिक व्यस्त रहता जहाँ भी जाता वहाँ की विशेष...

बधाई

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एक संस्मरण- हमारी भाभी सा ने पहली बार रसोई कार्य प्रारंभ किया। गांव मोहल्ले के लोगों ने यथाशक्ति उपहार दिया और बधाइयाँ भी दी.. । भाभी ने हमसे कहा-"अपने भैया को भोजन लेते जाइये बरामदे में।  जी  पूछकर आती हूं ..। मैं पूछती उससे पहले ही भैया बोल पड़े-तू चल मैं अंदर जा कर खा लूंगा ।  बधाई हो..! अब मेरी ड्यूटी खत्म, आज से भैया आपके हाथ की बनी डिश खाएंगे। वो अंदर आ रहे हैं।  अच्छा सुनिये! क्या-क्या परोस दूं उन्हे? भाभी ने हमसे कहा! आपकी मर्जी, जितना बना है सबकुछ थोड़ा-थोड़ा..हाँ बैगन का भर्ता मस्ट है उनके लिए।  और रात का   दूध मलाई सहित । हमने शरारत करते हुए कहा ,क्यो कि भैया को इन दोनों ही चीजों से उल्टी  आने लगती है।  फिर भाभी ने भैया को भोजन कराया, वे सबकुछ खा लिए, बैगन भर्ता के सिवा। कुछ नहीं बोले।  और मैं  फिर बताना भूल गई ,और अपने काम में लग गई । फिर रात में भाभी मलाई वाला दूध भी ले गई।  मैं  टेप में कैसेट चेक कर रही थी इसलिए मै उन्ही के रूम में थी।  भैया ने दूध पिया और ओइ...ओइ करने लगे .. हटाओ ये .. पूछा होता...

मेरे पापा

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पिता , यह शब्द सुनते ही एक मूर्ति सामने आ खड़ी होती है जो अपने बच्चों की फरमाइश पूरी करने के लिए अपने सुख का परित्याग कर कोल्हू के बैल की तरह जिंदगी भर घर गृहस्थी के पहिए के साथ लगा हुआ घूमता रहता है तबउसके कठिन परिश्रम से जीवनयापन का तेल निकलता है, जिसमें उसका परिवार अपनी जिंदगी गुजारता है, बस अपने परिवार की खुशी के लिए वो होंठो पर मुस्कान लिए अपने कर्तव्य पथ पर चलता रहता है। लोग प्रेम की अनेक परिभाषाएं बताते हैं लेकिन मेरे लिए प्रेम की एक ही परिभाषा है माता पिता। प्रेम का आरंभ प अर्थात पिता और प्रेम का अंत म अर्थात माता से होता है , बीच में तो कई रिश्ते बनते हैं जो कि कहीं ना कहीं स्वार्थ से जुड़े होते हैं, मेरे लिए मेरे पापा किसी भगवान से कम नहीं, मैने भगवान को तो नहीं देखा पर अगर भगवान वास्तव में हैं तो वो हमारे माता पिता के रूप में हैं। मुझे याद है जब मैं बहुत छोटी थी और हमारे घर में दीवाली थी, मोहल्ले के हर घर में दिए जलने की तैयारी हो रही थी बच्चे नए नए कपड़े पहने हुए खुशी से घूम रहे थे तब हमारे घर में अंधेरा था मैं और मेरी छोटी बहन पारुल घर के बाहर बैठकर सबके घरों में ज...

" मासूम सवाल"

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एक तीन सवा तीन साल का चंचल बच्चा एकाएक खामोश रहने लगा....पर किसी ने देखा नही।उस छोटे से बच्चे के अंदर कितना उथल-पुथल चल रहा...डाक्टर तो बोले थे सुबह पापा बात करेगें?ठीक हो जाएंगे....फिर पापा कहाँ गये?घर क्यों नहीं आते? भगवान जी के पास गये तो वापस क्यों नहीं आते?सब तो दिखते हैं पर पापा.....? वही चंचल बच्चा एकाएक अंतर्मुखी हो गया....एकदम चुप ,अपने में खोया।बच्चों के साथ भी नहीं खेलता....स्कूल घर और एक नीले रंग की साइकिल !जिससे घर के आसपास एक चक्कर लगा आता।कभी-कभी चित्र बनाने बैठ जाता जो उसे अपने पापा से विरासत में मिला था।पर वह बेखबर था इस बात से।हाँ गाने को सुनने के बाद गाना उसे अच्छा लगता था धीरे धीरे वो बहुत अच्छा गाने लगा .....ये भी तो विरासत में मिला था ,उस बच्चे के पिता बहुत अच्छा गाते थे और बाँसुरी बजाने थे।एक-एक विरासत आत्मसात होती रही।धीरे-धीरे वो बच्चा बड़ा होने लगा और पढ़ाई में अव्वल साथ साथ अभिनय स्कूल कॉलेज के ड्रामा शो में।वहां भी डान्स गाने और साथ ही साथ कविता!अरे हाँ वो बहुत अच्छी अभिव्यक्ति के साथ कविता भी लिखने पढ़ने लगा जो सब विरासत में पापा से पाया था। कैसे हस...

यादों में बसा मेरा बचपन

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मेरा बचपन जिसको मैंने कभी भूला ही नहीं ,अपनी यादों में संजो कर रखा है ,जो मेरी सुनहरी यादों में कस्तूरी सा महकता रहता है ।हर समय यादों के झरोखों में बसने वाली मुझे  बचपन याद ना आए ऐसा हो नहीं सकता । हमारा बचपन फोन वाला बचपन नहीं था हमारा बचपन चिट्ठियों वाला बचपन था किसी के भी घर कोई रिश्तेदार और जानकार अचानक आकर सबको आनंद से सराबोर कर देता , छुट्टियों में हम सब बच्चे नानी के घर जाते ,नानी के घर में सबको ,हम सब बच्चों की छुट्टियों का  इंतजार होता ,हम सबके बीच टीवी ना होता फोन ना होता, बस होता तो बातों और मस्ती का पिटारा ,नानी तरह-तरह के खाने पीने से हमारा स्वागत करती और मामा मौसी हमारी छुट्टियां हर तरीके से यादगार बनाने की कोशिश करते , औपचारिकता का शब्द ना होता आज भी याद आता है नानी दोपहर में ठाकुर जी का भोग लगाकर हम सबको इकट्ठा बैठा कर खाना परोसतीं और हम सब एक साथ बैठकर खाना खाते ,और दोपहर में बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाते ।बहुत याद आते हैं वह बचपन के दिन आज फोन पर कितनी भी बातें कर ले पर बातों के मिठास की खुशबू नहीं आती नानी के  कमरे में आला था जिसमें उनके ठाकु...

मल्लिकार्जुन यात्रा

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आंध्र प्रदेश के पश्चिम भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगल के मध्य श्री शैलम पहाड़ी पर स्थित भ्रमरंभा मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है। यह शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से दूसरा है। इसके बारे में कहा जाता है कि यहां शिव शक्ति दोनों ही विराजमान हैं।कहते हैं यहां के दर्शन से मनुष्य आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह शैव और शाक्त दोनों का तीर्थ है।  आदिशंकराचार्य ने अपनी रचना शिवलहरी भी यहीं रचित की थी। शिव पुराण के अनुसार कार्तिकेय अपने माता-पिता से नाराज हो दक्षिण भारत चले आए और श्री शैलम पर्वत पर   निवास करने लगे उन्हें मनाने के लिए शिव पार्वती ने  भील भीलनी क्रमशः अर्जुन और मल्लिका का रूप  धारण किया। और मना कर कार्तिकेय को कैलाश ले गए।  भगवान शिव  यही पर्वत पर ज्योति रूप में विराजमान हो गए कहते हैं अमावस्या की  शिवरात्रि की रात शिव  और देवी पार्वती पूर्णिमा को दर्शन देती हैं । हैदराबाद से श्री शैलम की दूरी  216 km है,यहां सड़क मार्ग से बस ,और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है।। पहाड़ों जंगलों के मनोरम दृश्यों को देखते आप वहां जा स...

यादगार खिरनीबाग का दशहरा मेला

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 शारदीय नवरात्रि वर्ष के सर्वश्रेष्ठ दिवस। दो-दो ऋतु ओं का सुखद मिलन, हर तरफ उत्सव का हर्षोल्लास नवरात्रि में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की स्तुति के साथ वातावरण को भक्तिमय करता जगह जगह रामचरित्र का गुणगान करती रामलीलाओं का सुखद मंचन इस भक्ति में वातावरण में लिप्त भारतीय संस्कृति ,ऐसा लगता है अपने चिर यौवन के पूर्ण श्रृंगार को धारण करते हुयी सुशोभित हो रही हो , बहुत याद आता है शाहजहांपुर नगर का खिरनी बाग मोहल्ला जो स्वतंत्रता सेनानी रहे राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म स्थल है ,उस पवित्र भूमि पर मेरा बचपन सौहार्द में पगा है , रामलीला के दिनों में खिरनी बाग पूर्ण रूप से उल्लसित होता है ,वहां का विख्यात कालीबाड़ी मंदिर मां दुर्गा के स्वरूप की प्रतिमाओं से सुसज्जित होता है रात दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता है मां का प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों की प्रतीक्षा और सामूहिक भोजन का आयोजन भक्ति रस का अमूल सौंदर्य है भक्तों की भीड़ में हर भक्त में असुरक्षा की भावना का लेश मात्र भी नहीं होता ,बाहर सड़क पर दोनों और सजा तरह तरह के खेल खिलौने रंग बिरंगी चीजों से सुसज्जित मिट्टी के छ...

मेरा मनपसंद खाना

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वैसे तो कोई भी खाना बुरा नही लगता मुझे  पर मेरी मॉ के हाथ का बना खाना बहुत याद आता है मुझे बड़े ही प्यार और जतन से बनाती थी धीमी ऑच पर पकातीं थी खाना बनाने का शौक भी रखतीं थी उनके हाथ का बना चिकन मसाला  किसी के भी मुंह में पानी ले आता कम मसालों बेहद लज़ीज़ डिश बनती थी बिमारी की हालत में भी स्वाद में कमी नही रहती थी बड़ा रच रच के कोई भी पकवान बनातीं थीं अब वैसा ज़ायका कहीं नहीं मिलता बहुत याद आता है वो खाना ! हुमा अंसारी

खुली आँखो का सपना

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सपने देखना हमारे बस में नहीं होता।चाहें या न चाहें ,आँखो में आ ही जाता है।फिर ये तो मेरा ऐसा सपना था जो अनायास ही मेरी आँखों में आ बसा था।कब और कैसे ठीक से याद भी नहीं।उम्र कच्ची और कल्पनाओं के दायरे बढ़ने लगे थे।फिर क्या था ,मैं------कृतिका----अपने सपने के पीछे बस भागती रहती थी। तब न दिन में चैन था न रात की सुध रहती थी मुझे।नई- नई पहचान जो हुई थी।बस दिमाग में सिर्फ वही घूमता रहता था।कैसे उसकी विवेचना करूँ।कैसे सपने का विस्तार करूँ।कहाँ से शुरुआत करूँ।हाथों से उसके मीठे,कोमल पंखों को सहलाऊँ या फिर यथार्थ की कठोर धरती पर तिलमिलाता छोड़ दूं।अतीत के पन्ने उधेड़ उसे दिखलाऊँ या भविष्य के सुनहरे सपनों की झलक दिखला दूँ।  किसी तरह उसे मुकम्मल करने की कोशिश में जुटी रहती थी।पर महीनों की मेहनत के बाद भी जब सपनों को हकीकत से कोसों दूर पाती तो मैं निराश -हताश हो जाती थी।कभी खीझ कभी गुस्सा सबकुछ आने लगता था। लेकिन नियति तो कुछ और ही थी।उन दिनों मेरे स्वभाव में भी खासा बदलाव आ गया था।हमेशा उधम मचाने वाली मैं थोड़ी चुप सी हो गई थी।बस खयालों में गुम रहती,हमेशा कुछ सोचती रहती थी।माँ ने सबसे पहले इन बात...

क्लास बंक भाग २

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कक्षा कक्षा तीन का क्लास बंक जो ..मानसपटल पर सदैव अंकित रहेगा .।." अब आगे ..." ( सातवीं कक्षा में क्लास बंक) पापा मेरा बनारसी लहंगा आ गया है .. " अंकल जी खबर किये थे जल्दी लाना होगा नहीं तो बिक जाएगा ..।" मैंने पापा से सिफारिश की । पापा- - " तो, कल हीं चले जाओ मम्मी के साथ। बाबू   का कपड़ा भी खरीद लेना । "  जी पापा .." हमने चहकते हुए कहा!  सिर्फ लहंगा पहनेगी तू ? कैजुअल कपड़े हैं.  ..? भैया ने पूछा। "  है! पर तीन सेट और चाहिए। तिलक, जनेव, बारात..। हमने अवसर गिन कर बता दिये..." । तो मेरे साथ चलना फिर ..कल मम्मी तेरा लहंगा ला ही देंगी।  अभी पैसे कम हैं.."  एक सेट हो पायेगा... " भैया ने परामर्श दिया। मुझे अपनी पसंद का चाहिए।"  मैंने मिमियाते हुए कहा। " मैं मम्मी के साथ हीं खरीदूंगी।  पिछले बार गइ थी तूझे बुखार हो गया था ..है न पापा ...?  मैं घर पे दुकान बुला दूंगा .. पसंद कर लेना। "  हाँ बेटा! लेटेस्ट कपड़े आ जाऐंगे घर पे ..ठीक तो कह रहा है भैया तुम्हारा ..। " पापा ने समर्थन किया ।"  मैं मुंह बनाये मां...

क्लास बंक भाग १

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ये मेरी  वास्तविक कहानी है, जब मैं कक्षा तीन में थी । गांव में सर्वत्र अशिक्षा का माहौल ब्याप्त था। एक प्राइमरी स्कूल भी था गांव में, मेरे घर से पैदल जाने में बीस मिनट लगते। पर कोई भी अपनी लड़की को स्कूल नहीं भेजता था।  स्कूल तक जाने का  कोई सायकिल वाला रास्ता नहीं था।  खेत की पगडंडीयो से होते हुए भैया या पापा मेरे साथ प्रतिदिन जाते-आते थे।  हमारी फैमिली ने सभी पडोसियों से आग्रह किया कि अपने बच्चियों को स्कूल अवश्य भेजें। फलस्वरूप एक पड़ोस की लड़की मीनू  मेरे साथ स्कूल जाने लगी। तबसे भैया -पापा को नहीं जाना पड़ा।  मीनू का गांव में दो जगह मकान था, जहां एक जगह पूरा संयुक्त परिवार रहता था।और एक मकान हमारे घर के समीप था जहां सिर्फ महिलाओं का जमावड़ा लगा रहता।  बड़ा सा घर जहां घर के अंदर एक बड़े से आंगन में बगीचा भी था। वहीं अमरूद का पेड़ और शहतूत के साथ अन्य पुष्प के पौधे भी थे। बड़ा मनोरम स्थान था जहां महिलाएं गपशप करती और हम बच्चे अमरूद और शहतूत खाने में लग जाते। प्रतिदिन की भांति मीनू के साथ मैं स्कूल के लिए निकली।  अमरूद घर के सामने प...

हड़ताल का परिणाम

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भैया आप हमेशा मेरी राखी को अपने हाथों से बांधते हो,इस बार मेरे हाथ से राखी बंधवाकर ही घर वापस जाना। क्यों भाभी मैं ठीक कह रही हूं न?" "ठीक है मेरी प्यारी बहना जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा लेकिन पहले इस अस्पताल ले तो छुट्टी मिले।" भाई बहन की बातों को सुनकर भाभी मुस्कराए बिना न रह सकी। भाई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली में एडमिट थे। दूसरे दिन मैं अपने भाई के लिए सुपाच्य खाना बनाकर अस्पताल ले गई। भाभी कह रही थी कि अस्पताल में डॉक्टर्स की हड़ताल हो गई है। केवल एक दो जूनियर डॉक्टर ही आ रहे हैं। भाई को सीने में पाइप लगा था उनके सीने में पानी आ गया था अतः डॉक्टरों ने पानी निकालने के लिये पाइप लगाया था। हड़ताल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था अतः सबलोगों ने निर्णय लिया कि भैया को घर ले जाते हैं वहीं पर किसी अच्छे अस्पताल में इलाज कराएंगे। आज मैं  भैया को विदा करने स्टेशन आई थी। ट्रेन के चलने का समय हो गया था। मैं बहुत उदास थी न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि मैं अब भैया को नहीं मिल पाएगी। मेरी इस साल भाई को अपने हाथों से राखी बांधने की इच्छा अधूरी रह गई थी।  मै...

" सूजी का हलवा "

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शादी से पहले की बात हैं , मैं , बुआ जी के घर गई थी , कुछ दिनों के लिए , उस समय खाना बनाना नही आता था , लेकिन शौक जरूर लगा था , इसलिए कुछ ना कुछ बना कर देखती रहती थीं , बुआ जी ने कहा चल आज सूजी का हलवा बनाते हैं ,मैं बताती रहूँगी , तू बना लेना ,मैने कहा ठीक हैं , वो रसोई के बाहर बैठ गई ,कुर्सी डालकर ,और मैने हलवा बनाना शुरू किया , बुआ जी बताती रही , मैं वैसे ही करती रही ,सब ठीक ही चल रहा था ,चीनी के डब्बे में चीनी कम थी ,पूछा तो , बुआजी ने बताया, चीनी दरवाजे के पीछे एक बड़े डब्बे में हैं , अब ये नही बताया किस तरफ वाले डब्बे में हैं ,क्योकि दरवाजे के पीछे  दोनों तरफ ही टीन के बड़े - बड़े डब्बे रखें हैं , जिसमे राशन भरा हुआ हैं , बस सारी गड़बड़ यही हो गई , और बिना देखें चीनी की जगह चावल डाल दिए , जब डालकर हलवा चलाया तो देखा , अब क्या कर सकते हैं , मैने बुआ जी को  कहा ,लो खा लो हलवा ,  खुश होकर बोली , लायेगी तब ना ,  अभी ले आती हूँ .... मैने भी प्लेट में डालकर दे दिया , देखते ही ... बुआ जी ... अरे ....ये क्या हैं ,  मैं….... हलवा .... बुआ जी ... ऐसा होता ...