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मेरा दोहरा रूप

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मैं तो इक दोहरा चेहरा हूँ,  दो रूप लिए मैं बैठी हूँ,  इक रूप दिखाया है सबको,  इक रूप छुपा कर जीती हूँ,        हँस कर मिलती हूँ दुनिया से,        पर छुप कर रोया करती हूँ,         हर जख़्म छुपाया है सबसे,         और दर्द समेटे बैठी हूँ,  देखो तो भीड़ है लाखों की,  सबसे मैं मिल के रहती हूँ,  देखूँ जो अपनें अंदर तो,  मैं बहुत अकेली होती हूँ,       लगती हूँ चुलबुल नटखट सी,      पर दर्द की लहरों में हर पल ,      चुपचाप बहा मैं करती हूं,  ये शौक नहीं अब आदत है,  दो रूप लिए मर जाना है,  दो रूप लिए मैं जीती हूँ,        मैं तो इक दोहरा चेहरा हूँ,        दो रूप लिए मैं बैठी हूँ,       दो रूप लिए मैं बैठी हूँ।  अंकिता मिश्रा

चले जाएँगे

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कह दो तुम्हें जो भी कहना है हमसे, हम फिर तुम्हारी बातें सुनने नहीं आएँगे , याद रखना हमारा ये कहना कि हम , एक दिन बड़ी खामोशी से चले जाएँगे । तुम्हारी नज़रें ढूँढ ले हमें, वो दूरी इतनी कम नहीं होगी, हम चाह कर भी कुछ कर न पाएँगे, मजबूरी हमारी भी कम नहीं होगी, सुना है ये नींद(जाम) तुम्हारी पहली मोहब्बत है, तुम्हारे इश्क़ को हम गले से लगा जाएँगे , याद रखना हमारा ये कहना कि हम , एक दिन बड़ी ख़ामोशी से चले जाएँगे । जिस वक्त के लिए रुलाते हो हमें,  अक्सर बेवजह ही वो वक्त लुटाओगे,  बैठकर अस्सी की सीढ़ियों पर तुम, वो लाल चाय देख बहुत पछताओगे, तिनका तिनका कर संजोए अपने ही रंगत को, मणिकर्णिका की राख में मिलाते चले जाएँगे, याद रखना हमारा ये कहना कि हम, एक दिन बड़ी खामोशी से चले जाएँगे। कहना तो बहुत कुछ था तुमसे मगर, चंद पन्नों में अपने जज़्बात लिख आए हैं, वो मेरे सिरहाने पर रखी लाल डायरी में, एक ख़त  तुम्हारे नाम रख आए हैं , हो सके तो एक दफा पढ़ जरूर लेना, एक अरसे से छुपे एहसास पन्नों में समेटे चले जाएंगे, याद रखना हमारा ये कहना कि हम, एक दिन बड़ी ख़ामोशी से चले जाएँगे। ...

आखिरी मुलाकात

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वो मुलाकात पहली आखिरी हो गई, प्यार वाली इन आँखों में नमी हो गई,  हम तो बैठे थे थामे ही दिल को मगर, आपको भी तो हमसे दिल्लगी हो गई, वो मुलाकात पहली आखिरी हो गई।         आप आए नजर तो घटा छा गई,         हम ठहर से गए वो घड़ी थम गई,         हम अभी तो निगाहों में उतरे ही थे,         कि मिलने से पहले जाने की घड़ी हो गई,         वो मुलाकात पहली आखिरी हो गई। माना अनजान हैं आपसे हम मगर, जाने क्यों फिर मेरा दिल धड़कने लगा, हम ना दो पल भी बैठे आपके पास में, फिर भी लगता है जन्मों की पहचान हो गई , वो मुलाकात पहली आखिरी हो गई।           अब तो हर रात को चाँद तारों से हम,          आपका हाल क्या है ये हैं पूछते,          क्या पता उनको हम याद है या नहीं,          पर उनकी यादें ही मेरी तकदीर हो गईं,           वो मुलाकात पहली आखिरी हो गई।          ...

मुझे बेटी नहीं चाहिए

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माँ अक्सर कहा करती थी मुझे बेटी नहीं चाहिए मुझे बेटियां नहीं पसंद है, सब लोग ये सुनकर उनका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे कितनी छोटी सोच है इनकी जो खुद औरत होकर बेटी नहीं चाहती ,लेकिन ये कोई नहीं समझ पाता था कि वो क्यों बेटी नहीं चाहती। लेकिन ईश्वर की ऐसी कृपा की उन्होंने एक बेटी को ही जन्म दिया। बहुत प्यार करती थी वो अपनी प्यारी सी बच्ची से ,उसके माथे पर काजल से अक्सर चाँद सितारे बनाया करती थी और प्यार से उसे गुरली-मुरली बुलाया करती थीं। कभी बेटे से कम नहीं चाहा अपनी उस प्यारी सी बच्ची को फूल फूल की तरह अपनी गोद में हमेशा रखा करती थी। पर फिर भी न जाने किस बात से वो बहुत डरा करती थीं, कि अक्सर हर रोज सुबह जल्दी उठने की आदत और संडे को कोई अच्छी सी डिश और गोल रोटी बनाना सिखाया करती थीं। जब कॉलेज जाने लगी मैं ' ऐसा कुछ मत करना कि मेरी परवरिश पर उंगली उठे' ऐसा समझाया करती थीं, पर फिर भी वो मुझसे बहुत प्यार किया करती थी । फिर एक दिन कुछ लोग आए और कहने लगे बेटी बड़ी हो गई है शादी नहीं करोगी क्या इसकी? सब बहुत खुश थे बेटी की शादी की बात सुनकर माँ भी खुश थी पर फिर भी न जाने उनकी आँखों मे...