धर्म से बड़ा कोई राष्ट्रवाद नहीं
धर्म रक्षा में प्राण निछावर इसका कोई गम नहीं अधर्म पर अपने हो बन अर्जुन बाण चलाओ इसमें कोई हर्ज नहीं समर भूमि में वीरगति चूम सके कदमों को महायुद्ध में महायोद्धा सा कर्तव्यों का निर्वहन करो रौद्र रूप में गरज रहे महाकाल का आह्वान करो युद्ध कौशल में प्रवीण बन अधर्म का नाश करो अग्नि बाणों की वर्षा को सीने पर स्वीकार करो धर्म युद्ध में उतरे पापियों का तुम संहार करो बुझ ना सको आंधियों से वो दिए प्रज्वलित करो हिमालय से ऊंचा अपना तुम स्वाभिमान करो स्वरचित गौरव पूरी गोस्वामी पानीपत, हरियाणा