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अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि)भाग- ३

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विक्रम एवं उनके साथियों का चरित्र चित्रण -  "विक्रम, प्रशांत , करण, जय, रवि और अमन यह सारे लड़के एक ही गाँव के थे और साथ साथ ही सैनिक में जाने की तैयारी कर रहे थे। इनका स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर साथ में ही बिता। गाँव से दूर शहर में भी रूम लेकर यह एक साथ रहते थे और पढाई करते थें। यही कारण था की इनलोगो में गहरी मित्रता थी। इन सभी दोस्तों में करण ही ग्रुप का लीडर था, जो की बहुत ही गुस्सेल् और लडाई करने वाला था इसलिए सभी इसे ग्रुप का लीडर कहते थे। विक्रम और प्रशांत ये दोनों भी लडाई झगड़े में पीछे नहीं रहते थे लेकिन करण के तुलना में ये करण से पीछे थे, क्योंकि करण की कोई सीमा नहीं थी लडाई में वह न जाने कितनों का खून तक बहा चुका था! लेकिन विक्रम और प्रशांत कभी किसी का खून नहीं बहायें थे बस यही फर्क था ,करण और इन दोनों में "।  "अब बारी है जय और रवि की इन्हें लडाई झगड़ों से कोई मतलब नहीं रहता था। ये दोनों मजाकिया किस्म के लोग थे। इन्हें हँसी मजाक करना,इक दूसरे को किसी लड़की का नाम लेकर चीढाना बस इन्हीं सब चीजों से मतलब था। रही बात अमन की तो वह अपने नाम की भाँति ही शां...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने माने देश सर्वोपरि) भाग -२

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 सीमा इन ख्यालों खोई ही थी की अचानक किसी ने दरवाजा  खटखटाया -  "चाची ओ चाची! अमन है का घर पे, दरवाजा तो खोलो उससे कुछ जरूरी बात करनी है " (दरवाजा खटखटाते हुए विक्रम ने पूछा)  विक्रम की आवाज सुन सीमा का ध्यान टूटा और वह अपनी आँसुओ को पोछते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गई।  दूसरी तरफ अमन भी अपने आँसुओ को छुपाने के लिये पानी से अपना चेहरा धोने लगा।  जैसे ही सीमा दरवाजा खोलती है विक्रम झट से अंदर आता है और जोर जोर से चिल्लाने लगता है -  "अमन ओ अमन! हमारी सारी मेहनत मिट्टी में मिल गई। जो सपना देखें थे हम सारे सपने अधूरे रह गयें। अरे जब चार साल के लिए ही सैनिक में रहेंगे तो काहे के लिए इतनी मेहनत! और जरा ये सोचो जब हमारे चार साल पूरे हो जायेंगे तो हम क्या करेंगे? दर -दर की ठोकरे खाते फिरेंगे "। अमन ; तो क्या करें? हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं।  विक्रम ;कुछ नहीं कर सकते? क्यों नहीं कर सकतें? ये देश हमारा है , हमारे भविष्य का इतना बड़ा फैसला लेने वाले ये नेता होते कौन हैं। आज जो ये जिस कुर्सी पर बैठे हैं और इतने बड़े बड़े फैसले ले रहे हैं, तुम भूल रहे ह...

अग्निवीर ( सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) भाग १

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  "अंदर ही अंदर घुटन सी हो रही थी उसे! मानो जैसे उससे किसी ने उसकी बहुमुल्य वस्तु छीन ली हो। न चाहकर भी उसके आँखों से आँसुओ की धारा बहने लगी। वह अपने किस्मत को हर बार की तरह फिर से कोसने लगा। "अच्छा होता अगर मेरा जन्म ही  न हुआ होता, अच्छा होता अगर बाबूजी के जगह मेरी मृत्यु हो जाती । न जाने कितने वादे किये थे अपनी मां से अब कैसे करूँगा उसे पुरा? कैसे करूँगा अपनी मातृभूमि की रक्षा? काश मेरी अधूरी ख्वाइशें की तरह मेरी जिंदगी भी अधूरी रह जाती। हर वक्त आजमाती है ये जिंदगी, न जाने क्यों इतना तड़पाती है ये जिंदगी। अगर इतना ही बुरा हूँ तो ऐ खुदा मुझे बुला क्यों नहीं लेतें, मेरे अस्तित्व को मिटा क्यों नहीं देते। हार चुका हूँ अपनी जिंदगी से थक गया हूँ इसे झेलते झेलते ,अब जीने की कोई ख्वाइश नहीं है, मुझे भी मेरे बाबूजी के पास बुला लो।"  अपने आँखों पर हाथ रखकर अमन रोये जा रहा था । दूर खड़ी उसकी  बेबस,लाचार माँ जो की उसे रोता देख खुद भी रो रही थी। कहे तो क्या कहे अपने बेटे से, उसका सपना तो मानो टूट ही गया था, बचपन से उसने सोच रखा था की मैं तो सैनिक नहीं बन पाई लेकिन अपने...

इंकलाब जिंदाबाद ;भगत सिंह भाग -३२

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नए नेताओं के अलग-अलग विचार (तृतीय भाग)  आगे भगत सिंह लिखते हैं- लेकिन बाद में मुंबई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ गई। पंडित जवाहर लाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर रहे थे और सुभाष चंद्र बोस ने भाषण दिया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने भाषण आरंभ किया कि हिंदुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष संदेश है। वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर आगे वह दीवाने की तरह कहना आरंभ कर देते हैं - चांदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की सूझ का परिणाम था ,उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार ने लिखा है कि हममें  ,हमारे  यह आंसू ही जमकर पत्थर बन गए हैं। वह भी वापस वेदों की ओर लौट चलने का आवाहन करते हैं। आपने अपने पूना वाले भाषण में ' 'राष्ट्रवादिता ' के संबंध में कहा है कि अंतरराष्ट्रीयतावादी ,राष्ट्रीयतावाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं ,लेकिन यह भूल है। हिंदुस्तानी राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है,ना निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है ,क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो 'सत्यम् शिवम् सुंदरम् ,...

ऐ भारत भूमि के नौजवानों

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ऐ भारत भूमि के नौजवानों,  जिस धरा पर जन्म लिए तुम , उसका तो सम्मान करो,  अपने स्वार्थ के खातिर,  मातृभूमि का ना अपमान  करो  ।  ऐ भारत भूमि के नौजवानों,  जिस धरा पर जन्म लिए तुम,  उसका तो सम्मान करो  ।  पलटो जरा इतिहास तुम अपने,  सैकड़ों वीरों की वीर गाथा,  को ही पाओगे, कर रहे जो,  तुच्छ हरकत तुम क्या यही , मातृभूमि पर बलिदान कर पाओगे  । ऐ भारत भूमि के नौजवानों ,   जिस धरा पर जन्म लिए तुम,  उसका तो सम्मान करो  ।  सपने देखे जो थे तुमने,  मातृभूमि की रक्षा के खातिर , तुम सेना में जाओगे,  कर रहे जो सर्वनाश देश का,  बच्चों को क्या संदेश पहुँचाओगे  ।  ऐ भारत भूमि के नौजवानों,  इस धरा पर जन्म लिए तुम,  उसका तो सम्मान करो  ।  माना  इन नीतियों के कारण,  हुई तुम्हें तकलीफ बहुत है,  किंतु मिल रहे जो अक्सर तुम्हें , उसका तो सम्मान करो   ।  अपने कुकर्मों के कारण,  इस पावन धरा को ना अपमान करो, भारत भूमि पर जन्म लिए हो,...

ईश्वर के रूप 'पिता'

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लेकर 'पिता' का रूप,   स्वयं ईश्वर धरा पर आते हैं,  किंतु मंदबुद्धि के मनुष्य,  ये कहां समझ पाते हैं।  ईश्वर ,अल्लाह को तलाशने,  मंदिर मस्जिद को जाते हैं,  अपने कटु शब्दों से ईश्वर स्वरूप ,  'पिता' के हृदय को ठेस पहुंचाते हैं।  नित धूप में तपते हैं,  आंधी तूफानों से भी कहाँ डरते हैं,  जिम्मेदारियों तले दबे रहते हैं,   फिर भी ये कहां थकते हैं।  पिता आसमा  हैं ,  पिता से मां का श्रृंगार  हैं , पिता है तो सपने हैं , पिता है तो सारी ख्वाहिशें अपने है।  हर त्योहार पर वह सबके लिए,  झोली भरकर उपहार लाते हैं,  किंतु ना जाने वह क्यों,  अपने लिये ही भूल जाते हैं।  अंदर से हताश- निराश होकर भी, बच्चों के समक्ष मुस्कुराते हैं , देख बच्चों की खुशियां  वह भी खुश हो जाते हैं ।  शास्त्रों में भी कहा गया है ,  न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम् यथा पितरि शुश्रषा तस्य वा वचन क्रिपा।  अर्थात पिता की सेवा अथवा,  उनकी आज्ञा का पालन करने से,   बढ़कर होता न कोई ...

काश कुछ ऐसा करें बेटियां

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सिर्फ घर की लक्ष्मी ही नहीं होती बेटियां, घर की शान और पिता की अभिमान होती है बेटियां, लेकिन क्या इन बातों को समझ पाती है बेटियां।  बदलते समय के साथ सोच भी बदल लेती है बेटियां, जिस पिता ने उन्हें बोलना सिखाया उन्हीं के विरुद्ध खड़ी हो जाती है बेटियां, वह भी उनके लिए जिन्हें कुछ सालों से जानती हैं बेटियां। आर्थिक स्थिति कैसी भी हो एक पिता की, ख्वाइशें उनकी यही होती है कि अपनों से अच्छे घरों में ब्याह पाएं वह अपनी बेटियां, इस प्यार को क्यों नहीं समझ पाती है बेटियां।  जिस पिता ने बचपन से सर उठा कर चलना सिखाया, अपने काले करतुतों से उन्हीं का सर झुका देती है बेटियां, कमी क्या रह जाती है, जो यूँ दगा दे जाती है बेटियां।  बन जाती है क्यों इतनी कमजोर जो एक लड़के के प्यार भरी बातों से पिघल जाती है बेटियां, एक लड़के के लिए मां-बाप को नहीं,  मां-बाप के लिए उन लड़कों को छोड़ पाती बेटियां अगर कुछ करना ही चाहती हैं तो ऐसा करे बेटियां,  जिससे वह अपने पिता की बोझ नहीं सर का ताज लगने लगे बेटियां, काश कुछ ऐसा करे बेटियां।  गौरी तिवारी  भागलपुर बिहार

राजा राममोहन राय

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"केवल ज्ञान की ज्योति द्वारा ही मानव मन के अंधकार को दूर किया जा सकता है" -राजा राममोहन राय यह कथन राजा राम मोहन राय द्वारा दी गई है। सर्वप्रथम हमें राजा राम मोहन राय द्वारा दी गई ,इस कथन का आशय समझ लेना चाहिए। इस कथन का आशय यह है की सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक मनुष्य ने जो प्रगति की है उसका सर्वाधिक श्रेय मनुष्य की ज्ञान चेतना को ही दिया जा सकता है। मनुष्य में ज्ञान चेतना का उदय शिक्षा द्वारा ही होता है! बिना शिक्षा के मनुष्य का जीवन पशु तुल्य होता है। शिक्षा ही अज्ञान रूपी अंधकार से मुक्ति दिलाकर ज्ञान का दिव्य आलोक प्रदान करती है। हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है।वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाशदीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार में मोह- मूर्छा को मिटाने के लिए नहीं, अपितु लोभ  और अशक्ति के परिणाम स्वरुप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसे भारी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।...

बस एक निवाला

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वह पाषाण नहीं ,  उनके अंदर भी दिल है,  उनके दिलों में भी गम है ,  आंखें उनकी भी नम है।  देखो जरा वह पिता है, देखो जरा वह पिता के रूप में भगवान ही तो हैं।  बचपन में तुम्हारे जरा सी , रोने से जिनका सीना छल्ली छल्ली,  हो जाता था, आज उन्हें रोने की  हजार वजह दे दिया करते हो।  तुम्हें काबिल बनाने के खातिर,   पिता दिन रात मेहनत करते थें,  तुम्हारी हर एक ख्वाहिशें पूरी करने के खातिर ,ना जाने वह कितनी रातें बिना आराम किये गुजार दिया करते थें ।   बचपन में कहा करते थे,  बड़ा होकर कमाकर खिलाऊंगा,  बस एक बार, बस एक बार,  इन बातों को दोहराकर तो देखो।  बेशक मत उठाना जिम्मेदारियां उनकी बेशक मत उठाना जिम्मेदारियां उनकी   उन्हें किस चीज की जरूरत है,  ये पूछ कर तो देखो।  उनके हिस्से का भी खाकर पले बढ़े हो  बस एक निवाला ,बस एक निवाला अपने हिस्से का खिलाकर तो देखो।  वह कांटे नहीं जो चुभने लगे हैं , आज भी फूलों की पंखुड़ियों की भांति तुम्हारे पथ पर पड़े हैं।  देखो जरा वह पिता हैं, ...

23 मार्च 1931 भाग 2

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मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे, मेरा रंग दे बसंती चोला-  हालांकि अभी तक भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की फांसी विवादित है इस बारे में हर जगह एक ही जानकारियां नहीं मिलती लेकिन किताबों और फिल्मों में यह जानकारी साफ तरह से देखने को मिलती है !कि 23 तारीख को आखिर क्या हुआ था । कांग्रेस के 1931 के कराची अधिवेशन में उदासी छाई हुई थी । भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी देने के 6 दिन बाद कराची में कांग्रेस का अधिवेशन था जहां गांधी जी के खिलाफ खूब नारे लगे। देश को अंदाज था कि गांधी इरविन समझौता और भारत सरकार और कांग्रेस सरकार के बीच समझौते के बाद भगत सिंह समेत तीनों क्रांतिकारियों की जिंदगियां   बख्श दी जाएगी । गांधीजी उस समय लोकप्रियता के चरम पर थे। कांग्रेस के उस अधिवेशन में आए हुए युवकों में निराशा फैली हुई थी। ज्यादातर ने काली पट्टी बांध रखी थी वह जानना चाहते थे कि कांग्रेस ने तीनों शहीदों को बचाने के लिए क्या किया ?वह मान रहे थे कि गांधी जी की कोशिश ही काफी नहीं थी। उनका यह भी मानना था कि अगर गांधीजी इरविन के साथ समझौते को भंग करने की धमकी देते तो अंग्रेज निश्चित तौर...

23 मार्च 1931 भाग १

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मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे ,मेरे रंग दे बसंती चोला -  24 मार्च 1931 की सुबह लोगों में एक अजीब सी बेचैनी थी । एक खबर लोग आसपास से सुन रहे थे और उसका सच जानने के लिए लोग यहां वहां भागे जा रहे थे, और अखबार तलाश रहे थे।  यह खबर थी सरदार भगत सिंह और उनके दो साथी सुखदेव और राजगुरु की फांसी की। उस सुबह जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पड़ी कि भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम सोमवार को 7:33  पर फाँसी दे दी गई।  केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के जिस  मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन उस समय पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी था उससे सरकार डरी हुई थी। और उसी का नतीजा रहा कि भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तरीके से तय तारीख से 1 दिन पहले ही फांसी दे दी गई । फांसी के समय जो कुछ अधिकारी लोग शामिल थे - उनमें से एक यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे। जितेंद्र सान्याल की लिखी किताब 'भगत सिंह' के अनुसार ठीक फांसी पर...

वीर छत्रपति शिवाजी महाराज भाग ३

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(जय भवानी जय शिवाजी) - कुछ समय बाद शिवाजी ने अपने राज्य का विस्तार दक्षिण पश्चिम में करते हुए जावली राज्य को अपने अधिकार में ले लिया। साथ ही उनकी सेना ने जुन्नार नगर से ढेर सारी संपत्ति के साथ 200 घोड़े को लूट लिया । इसके अलावा अहमदनगर से 700 घोड़े, चार हाथी भी लुटा। दक्षिण में मुगलों की अनुपस्थिति के कारण उन्होंने दक्षिण कोंकण पर आक्रमण कर और जीत कर अपने मराठा साम्राज्य का विस्तार किया। इस जीत से उन्होंने पुर्तगालियों को भी झुकने के लिए मजबूर किया। साथ ही कल्याण और भिवंडी को जीतने के बाद वहां नौ सेना अड्डा बना दिया। अब तक वे 40 दुर्ग जीत चुके थे ।  सूरत को लूटा- सन 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा। नगर से 132 लाख की संपत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया। सूरत के लूट से औरंगजेब बहुत गुस्से में था। उसने जयसिंह को सूरत का फौजदार बनाया। जयसिंह ने विदेशी ताकतों और छोटे सामंतों को अपने साथ लेकर शिवाजी पर आक्रमण किया। शिवाजी ने हार की संभावना देखकर संधि का प्रस्ताव भेजा। फिर जून 1665 में हुई इस संधि के अनुसार उनको 23 दुर्ग मुग...

वीर छत्रपति शिवाजी महाराज भाग २

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(जय भवानी जय शिवाजी) - शाइस्ता खाँ के बाद शिवाजी का युद्ध अफजल खान से हुई-  अफजल खान बीजापुर की आदिलशाही हुकूमत का बेहतरीन योद्धा था, जो की हर तरह की रणनीति अपनाने में माहिर था । वह अपनी जीत के लिए किसी हद तक जा सकता था और कुछ भी कर गुजरने के लिए हमेशा तैयार रहता था। बीजापुर और मराठों के बीच हुई लड़ाई में आदिलशाह की मां ने मराठों पर कब्जा करने के लिए अफजल खान को भेजा  । अफजल खान युद्ध से पहले छल से शिवाजी महाराज की हत्या करना चाहता था। उसने शिवाजी महाराज को प्रतापगढ़ के पास मिलने का संदेश भेजा। शिवाजी ने खान का यह आदेश स्वीकार किया और दोनों के बीच  मुलाकात का स्थान तय हुआ शिवाजी महाराज और अफजल खान की मुलाकात प्रतापगढ़ के पास शामियाने  में हुई थी अफजल खान जैसे शिवाजी महाराज से गले मिला उसने हाथ में बंधा चाकू शिवाजी के पीठ में घोपने की कोशिश की। शिवाजी ने सतर्कता बरती और अब्दुल खान का पेट  बाघनख( बाघ के नाखून से बना हथियार) से चीर दिया। इसे देख अफजल खान के सिपाई ने शिवाजी महाराज पर हमला करने का प्रयास किया और इसका फायदा लेकर अफजल खान शामियाने से बाहर भागने...

वीर छत्रपति शिवाजी महाराज भाग -१

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(जय भवानी जय शिवाजी) - भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम भी आता है, जिनके बारे में सभी लोग जानते हैं। बहुत से लोग इन्हे हिंदू हृदय सम्राट करते हैं ,तो कुछ लोग इन्हे मराठा गौरव कहते हैं ,जबकि वे भारतीय गणराज्य के महानायक थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म सन 19 फरवरी 1630 में मराठा परिवार में हुआ उनका पूरा नाम शिवाजी भोसले था । उनके पिता शाहजी भोंसले मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे जो डेक्कन सल्तनत के लिए काम करते थे। और शिवाजी की माता जीजाबाई थी जो एक वीर और धार्मिक महिला थी । शिवाजी का बचपन उनकी माता जीजाबाई के मार्गदर्शन में बीता। शिवाजी महाराज के चरित्र पर उनके माता-पिता का बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा । बचपन से ही शिवाजी उस युग के वातावरण और घटनाओं को भली-भांति समझने लगे थे । माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण स्वभाव और व्यवहार में वीरांगना नारी थी। इसी कारण उन्होंने अपने पुत्र शिवा का पालन- पोषण रामायण ,महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरआत्माओ के उज्जवल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। दादा कौणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की  सामयिक य...

इंकलाब जिंदाबाद भगत सिंह भाग ३१

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 नए नेताओं के अलग-अलग विचार( द्वितीय भाग) -  आप एक कवि हैं । कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नजर आता है। साथ ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं। यह 'शक्ति' धर्म चलाना चाहते हैं। यह कहते हैं "इस समय हमें शक्ति की अत्यंत आवश्यकता है"। वह 'शक्ति' शब्द का अर्थ केवल भारत के लिए इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है। वह एक बहुत भावुक कवि की तरह कहते हैं-  एकांत में भारत की आवाज मैंने सुनी है। मेरे दुखी मन में कई बार यह आवाज सुनी है कि 'आजादी का दिन दूर नहीं' ....कभी-कभी बहुत अजीब विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूं-  हमारा हिंदुस्तान पाक और पवित्र है, क्योंकि पुराने ऋषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी खूबसूरती हिंदुस्तान के पास है। लेकिन हम उन्हें देख नहीं सकते।  यह कवि का विलाप है कि वह पागलों   या दीवानों की तरह कहते रहे हैं "हमारी माता बड़ी महान है। बहुत शक्तिशाली है। उसे परास्त करने वाला कौन पैदा हुआ है"। इस तरह वह केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं-  ...

इंकलाब जिंदाबाद ;भगत सिंह भाग ३०

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नये नेताओं के अलग-अलग विचार (प्रथम भाग) -  जुलाई ,1928 'किरती' में छपे इस लेख में भगत सिंह ने सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है।  असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी फैली। हिंदू मुस्लिम झगड़ों में बचा खुचा साहस भी खत्म कर डाला। लेकिन देश में जब एक बार जागृति फैल जाए तब देश ज्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता। कुछ ही दिनों बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है। आज हिंदुस्तान में फिर जान आ गई है। हिंदुस्तान फिर जाग रहा है। देखने में तो कोई बड़ा जन आंदोलन नजर नहीं आता लेकिन नींव जरूर मजबूत की जा रही है। आधुनिक विचारों के अनेक नए नेता सामने आ रहे हैं। इस बार नौजवान नेता ही देशभक्त लोगों की नजरों में आ रहे हैं। बड़े-बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं। इस समय जो नेता आगे आए हैं वे हैं बंगाल के पूजनीय श्री सुभाषचंद्र बोस और माननीय पंडित श्री जवाहरलाल नेहरू। यही दो नेता हिंदुस्तान में उभरते नजर आ रहे हैं और युवाओं के आंदोलनों में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं। दोनों ही हिंदुस्तान की आजादी के कट्ट...

इंकलाब जिंदाबाद भगत सिंह भाग २९

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 धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम (अंतिम भाग) -  आगे भगत सिंह अपने लेख में लिखते हैं - रूसी महात्मा टॉलस्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay  and Letters)में धर्म पर बात करते हुए उसके तीन हिस्से किए हैं-   1. Essentials of Religion, यानी धर्म की जरूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगैरा।  2. Philosphy of Religion, यानी जन्म - मृत्यु ,पुनर्जन्म ,संसार रचना आदि का दर्शन। इसमे आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है। 3. Rituals of Religion, जानी रस्मो रिवाज वगैरा। मतलब यह है कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक है। सभी कहते हैं कि सच बोलो , झूठ ना बोलो, प्यार से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहां है। इसमें तो झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह है कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने चाहिए। दूसरा फिलॉसफी का प्रश्न है असल में कहना पड़ता है कि 'फिलॉसफी इज द आउटकम ऑफ ह्यूमन विकनेस' यानी फिलोसफि आदमी की कमजोरी का फल है। जहां भी आदमी देख सकते हैं, वहां कोई झगड़ा नहीं है । जहां कुछ नजर ना आया व...

इंकलाब जिंदाबाद ;भगत सिंह भाग २८

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 धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम (प्रथम भाग) -  मई 1928 के 'किरती' में ये लेख छपा । जिसमें भगत सिंह ने धर्म की समस्या पर प्रकाश डाला- उन्होंने इस लेख में लिखा था कि अमृतसर में 11- 12- 13 अप्रैल को राजनीतिक कॉन्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कॉन्फ्रेंस हुई । दो- तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उसमें से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई नहीं उठाता किंतु संप्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन संगठनों का पक्ष लेने वाले ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ देर दबा रहता लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गई और धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रांतीय कांफ्रेंस की विषय समिति में भी मौलाना जफर अली साहब के पांच-  सात बार खुदा- खुदा करने पर अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा - खुदा ना कहें। आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूं। बाद में लाहौर में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म के नाम का लाभ उठाने वाले, और यह ...

इंकलाब जिंदाबाद; भगत सिंह भाग २७

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 नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणा पत्र (अंतिम भाग) - आगे भगत सिंह कहते हैं युवकों के जीवन अनवरत असफलताओं के जीवन हो सकते हैं-  गुरुगोविंद सिंह को आजीवन जिन नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, हो सकता है उससे भी अधिक  नारकिए परिस्थितियों का सामना करना पड़े। फिर भी उन्हें यह कहकर कि अरे ,यह सब तो भ्रम था,  पश्चात नहीं करना होगा।  नौजवान दोस्तों इतनी बड़ी लड़ाई में अपने आप को अकेला पाकर हताश मत होना। अपनी शक्ति को पहचानो, अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है धनहीन  असहाय एवं साधन ही अवस्था में भाग्य आजमाने के लिए अपने पुत्र को घर से बाहर भेजते समय जेम्स गैरीबाल्डी की महान जननी ने उससे जो शब्द कहे थे (उन्हें )याद रखो। उसने कहा "दस में से नौ बार एक नौजवान के साथ जो सबसे अच्छी घटना हो सकती है वह यह है ,कि उसे जहाज की छत पर से समुद्र में फेंक दिया जाए ताकि वह  तैरकर या डूबकर स्वयं अपना रास्ता तय करें " प्रणाम है उस मां को ,जिसमें यह शब्द कहें और प्रणाम है उन लोगों को जो इन शब्दों पर अमल करेंगे।  इतालवी पुनरुत्थान के प्रसिद्ध विद्वान मैजिनी ने ए...

इंकलाब जिंदाबाद ;भगत सिंह भाग २६

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 नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणापत्र ( तृतीय भाग) -  पंजाब के नौजवानों ,दूसरे प्रांतों के युवक अपने क्षेत्रों में जी तोड़ परिश्रम कर रहे हैं। बंगाल के नौजवानों ने 3 फरवरी को जिस जागृति तथा संगठन क्षमता का परिचय दिया उससे हमें सबक लेना चाहिए। अपनी तमाम कुर्बानियों के बावजूद हमारे पंजाब को राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ प्रांत कहा जाता है  , क्यों ? क्योंकि लड़ाकू कौम होने के बावजूद हम संगठित एवं अनुशासित नहीं है। हमें तक्षशिला विश्वविद्यालय पर गर्व है लेकिन आज हमारे पास संस्कृति का अभाव है और संस्कृति के लिए उच्च कोटि का साहित्य चाहिए ,जिसकी संरचना  सुविकसित भाषा के अभाव में नहीं हो सकती। दुख की बात यह है कि आज हमारे पास उनमें से कुछ भी नहीं है। देश के सामने उपस्थित उपरोक्त प्रश्नों का समाधान तलाश करने के साथ-साथ हमें अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए तैयार करना पड़ेगा। हमारी राजनीतिक लड़ाई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के ठीक बाद से ही आरंभ हो गई थी। वह कई दौरों से होकर गुजर चुकी हैं। बीसवीं शताब्दी के आरंभ से अंग्रेज तथा निम्न पूंजीपति वर्ग को सहूलियत देकर उन...