Posts

Showing posts with the label Arati Jha

प्रकृति की पुकार

Image
प्रकृति का स्वरुप पर्यावरण स्वच्छंद अलमस्त विचरति हवा हरियाली से भरी धरती फूलों पर मंडराते इतराते भौरें तितलियां  कल कल करते बहते झरने बादलों की लुका छुपी में  इन्द्रधनुषीय नजारें विहंगम की कलरव करती छटा मोतियों सी बारिश की बूँदें  नभ और धरा का मिलन कराती  खिलते खेत खलिहान  जिसे संरक्षित करने का जिम्मा  था हमारा  पहले बाँटा धरा को हमने  जो थी ना हमारी फिर जंगलों को किया बर्बाद  जो थी हमारी धरा का भूषण  नदियों को गंदला कर  मारी अपने पैर पर कुल्हाड़ी  ये था अपने ही सर्वनाश का  आह्वान अपने ही हाथों जर्जर काया सी हुई पल्लवित धरा  अपने ही हाथों किया हमने अपनी माँ का आँचल सूना  प्रकृति का मधुर संगीत  खो गया कहीं  नव जीवन की चाह लिए  प्रकृति पुकार रही भावुक आँखों से देख रही हमें विध्वंसक प्रवृत्तियाँ त्याज्य  सुदृढ़ मानसिकता हृदय की कोमलता अपनाकर  प्रकृति को दे सकते हैं नया जीवन बढ़ाया हाथ है प्रकृति ने फिर से  उसे थाम कर हो कृतज्ञ हम  दोस्ती कर लें प्रकृति से मानव  लौटा कर पर्याव...

बदलाव

Image
एक आम सी गृहिणी है सुचित्रा। सबके काम पर निकलने के बाद सुबह के काम निपटाने के क्रम में बिछावन ठीक करती हुई, उसी बिछावन पर निढ़ाल सी बैठ जाती है।  क्या हो गया उसे.. एक जगह मन ठहरता ही नहीं है.. हमेशा अतीत में भटकने की आदत सी हो गई है मुझे...सुचित्रा सोचती है।  बहू दो कप चाय बना लाओ...सासु माँ की आवाज से उसकी तन्द्रा भंग होती है।  अभी इस समय चाय के लिए माँ जी कह रही हैं.. जबकि इस समय स्नान ध्यान कर नाश्ता ही करती हैं.. चाय तो सिर्फ शाम में में लेती हैं..सुचित्रा आश्चर्य से सोचती है। रसोई में जाकर अभी चाय के लिए दूध निकाल ही रही होती है कि सासु माँ उसके घुँघरूओं के साथ रसोईघर में आती हैं। घुँघरूओं की आवाज़ से सुचित्रा पीछे मुड़ कर देखती है। एक चमक चेहरे पर पल भर ठहर कर चली जाती है।  मैं बालकनी में हूँ.. बोल कर सासु माँ चली जाती हैं.. घुँघरू क्यूँ निकाला क्या है.. क्या उससे कोई गलती हो गई है..सुचित्रा पशोपेश में पड़ जाती है। उसे याद आ गए कॉलेज के दिन.. जब उसके कत्थक और भरतनाट्यम की धूम थी.. कितने सारे महारथियों के साथ उसे मंच साझा करने का मौका मिला था..घुँघरू उसकी जान हु...

बेरोजगारी

Image
अरे आज तो दीपक भैया का जन्मदिन है। छवि हड़बड़ाती सी घर में घुसते हुए बोलती है। दीपक ऊपर वाले कमरे में बैठा हताश सुन रहा था.. माँ सुन रही हो .. भैया का जन्मदिन है आज।  हाँ तो कौनसी बड़ी बात हो गई। सबका जन्मदिन होता है.. माँ ने कहा। कैसी बात कर रही हो माँ... ज्यादा कुछ नहीं खीर पूरी ही बना लो ना। भैया को भी अच्छा लगेगा।  इस बार माँ जोर से बोली... निठल्ला बैठा घर पर खा ही तो रहा है। कितने पैसे खर्च हुए इसकी पढ़ाई पर। ऑफिसर बनने चला था। चपरासी भी नहीं बन सका।  माँ.. क्या बोल रही हो.. छवि चीखी। कितनी मेहनत करते हैं भाई। कॉलेज टाँपर हैं। देश में बेरोजगारी पसरी है। जो नौकरियाँ थी.. उन्हें खत्म कर अनुबंध पर दिया जा रहा है। सारे नेता सिर्फ अपनी ढ़फली .. अपना राग गाते हैं और हम लोग किसी से बिना कोई सवाल जवाब किए.. उन सबके बहकावे में आ जाते हैं। तुम्हें पता है माँ.. 5000 में अच्छे पढ़े-लिखे लोग काम करने को तैयार बैठे हैं... वो भी किसी की पैरवी होने पर.. क्या करे भाई बताओ तुम.. ऐसे में हम भी उन्हें ताने दें.. ना माँ ये भी सही नहीं है।  तो मैं क्या करूँ..एक छोटी सी किराना की दुका...

जाहिल कौन

Image
बाबु जी इस बार सरस्वती पूजा के दिन आपको भी मेरे साथ महाविद्यालय चलना है.. सेवानिवृत्त प्राचार्य दीनदयाल जी के प्राध्यापक सुपुत्र शिवेश्वर जी ने कहा। सरस्वती पूजा के उपलक्ष्य में आपको मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। थोड़ी देर में महाविद्यालय के प्राचार्य महोदय आपको आमंत्रित करने स्वयं आएंगे.. शिवेश्वर जी अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं। बहुत धूम धाम से माँ शारदे की अराधना सम्पन्न हुई। महाविद्यालय से बाहर आते ही शिवेश्वर जी के ड्राइवर ने गाड़ी में कुछ ख़राबी आ जाने की सूचना देते हुए बताया कि गाड़ी के पूर्णतः ठीक होने में लगभग दो तीन घंटे लग जाएंगे।  शिवेश्वर चलो बेटा आज रिक्शा से ही चलते हैं.. बहुत दिन हो गए तुम्हारे साथ रिक्शा की सवारी किए.. दीनदयाल जी बच्चों की तरह चहकते हुए बोलते हैं। एक रिक्शा ले आओ.. शिवेश्वर जी आदेशात्मक लहजे में ड्राइवर से कहते हैं।  ड्राइवर वही खड़ा एक रिक्शेवाले को बुलाता है।  आज के दिन साक्षात सरस्वती पुत्र मेरे रिक्शे पर बैठेंगे..मैं और मेरा रिक्शा धन्य हो गया...ये सुनकर की शिवेश्वर जी और उनके पिता आज रिक्शा से घर जाने वाले हैं.. हर्...

प्रीत के रंग

Image
जाने कब ये लड़का शादी करेगा। तीस का होने चला.. अच्छी भली नौकरी है।एक से एक रिश्ते ठुकरा कर जाने क्या खोज रहा है। अपनी किट्टी से आकर शक्ति जी भुनभुना रही थी। क्या हो गया माँ.. आते ही किस पर गुस्सा हो रही हो.. वही हाॅल में अपने लैपटॉप पर काम करता शिवम पूछता है। अपनी किस्मत पर गुस्सा हो रही हूँ। मेरी उम्र की मेरी सारी सहेलियाँ पोते पोती वाली हो गई और मैं। रश्क होता है उनकी किस्मत पर मुझे.. शक्ति जी सोफ़े पर बैठती हुई कहती हैं। क्या माँ.. जब होनी होगी.. शादी भी हो जाएगी.. शिवम माँ की तरफ पानी का गिलास बढ़ाता हुआ सर्द आवाज कहता है। क्या है शिवम... ऐसे भी कोई करता है क्या। अकेले घर काट खाने को दौड़ता है.. क्यूँ नहीं समझता है तू.. शक्ति जी की आवाज बेबसी झलक रही थी। शिवम बिना कोई उत्तर दिये काम में लगा रहा। अच्छा सुन कल मैं और मेरी सहेलियाँ अनाथालय जा रहे हैं। हम लोगों ने सोचा इधर उधर पैसा फेंकने से अच्छा है किसी के काम आ जाए.. शक्ति जी उत्साहित होकर बेटे को बताती हैं। ये तो आप लोगों ने बहुत ही अच्छा सोचा माँ.. गर्व है आप पर मुझे.. शिवम काम छोड़ माँ का हाथ अपने हाथ में लेता हुआ कहता है। छोड़ म...

बुरा सपना

Image
नहीं नहीं ऐसा मत करो..ओह मेरा चेहरा झुलस गया। बहुत दर्द हो रहा है मुझे..मुझे ऐसी हालत में देखकर मेरे मम्मी पापा मर जाएंगे..नींद में एक अजीब सा साया मानो उसे दर्द पहुँचा रहा था। उस दर्द से छटपटाती पसीने से तर बतर सीमा की नींद खुल जाती है। खुली आँखों में भी अभी भी डर समाया हुआ था.. निस्तेज.. संज्ञाशून्य पड़ी अँधेरे में सिर्फ आँखें घुमा कर उस अजीब से साए को देखने की कोशिश कर रही थी सीमा। अचानक अंधेरे में माँ को आवाज देती चीखती हुई उठ बैठती है... उसकी चीख सुन दूसरे कमरे से दौड़ते हुए सीमा के मम्मी पापा आकर कमरे में रौशनी करते हैं।  माँ मेरा चेहरा खराब हो गया.. माँ मैं बाजार गई ही क्यूँ थी। उसने मेरे चेहरे पर तेजाब डाल जला दिया.. सीमा रोती हुई लगातर यही बोलने लगती है।  किसने क्या कर दिया.. तुम बिल्कुल ठीक हो सीमा.. कोई बुरा सपना देखा तुमने.. सिर सहलाती सीमा की माँ बोलती है।  क्या सच में.. अपने चेहरे को टटोलती सीमा पूछती है और आदमकद दर्पण के सामने खड़ी हो जाती है।  मैं ठीक हूँ माँ.. मैं ठीक हूँ माँ.. खुशी के अतिरेक में सीमा अपने मम्मी पापा से लिपट जाती है।  माँ पापा अ...

सोनचिरैया

Image
फुदकती आती घर गौरैया रूनझुन बजाती आती गौरैया किलोल करती मधुरव मधुरव हँसती मुस्काती चहचहाती गौरैया बड़ी होती जाने कैसे सीख जाती दुनियादारी ये प्यारी प्यारी गौरैया फिर भी जाने क्यूँ दुत्कारी जाती ये छोटी छोटी सी घर की गौरैया इस शाखा से जाती उस शाखा इसे सँवारती उसे भी सँवारती फिर भी असमय बुझ जाती है किसे कहे अपनी शाखा गौरैया मुंडेर पर बैठी अनकहे दर्द के साथ  विलुप्त होती जा रही हैं ये गौरैया उड़ने को मुट्ठी भर आकाश खोजती  टुकुर टुकुर जाने क्या तकती गौरैया कहानी एक सी बनती जा रही है  बेटी कहे उसे या छोटी सी गौरैया दोनों ही बनाती घोंसला अपना कह  फिर भी गीत अधूरे ही गाती सोनचिरैया आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली  सर्वाधिकार सुरक्षित©®

त्योहार की थाली

Image
दिलों का उद्गार उल्लास उमंग परिलक्षित करता त्योहार की थाली  पूजा अर्चना मनमोहक सा  मनभावन होता त्योहार की थाली  भक्ति करता मन  ईश्वर की अराधना  मीठी बोली होती  त्योहार की थाली  रौनक चेहरे की  नवीनता का पर्याय  इंसानियत समझाता  त्योहार की थाली  आरती झा(स्वरचित व मौलिक) दिल्ली  सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

महिला सशक्तिकरण

Image
महिला सशक्तिकरण.. बहुत ही लुभावना और मनमोहक शब्द । बेशक महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। नौकरी करने लगी हैं.. कभी कभी कुछेक निर्णय में भी उनकी भागीदारी होने लगी है। लेकिन क्या सारी महिलाएँ इस कसौटी पर खड़ी उतरती हैं। क्या समाज या स्वयं महिलाएँ भी नौकरीपेशा और नौकरी करने वाली नारियों के बीच एक दीवार खड़ी नहीं कर देती हैं। सहानुभूतिवश घरेलू महिलाओं से ये कह दिया जाता है कि अरे आप जो कर रही हैं... वो करना सबसे ज्यादा मुश्किल है। लेकिन क्या सच में ये सशक्तिकरण समाज में है। क्या सच में घरेलू महिला और नौकरीपेशा को एक ही चश्मे से देखा जाता है। क्या किसी बेटी के उच्च पद पर पहुँचने का श्रेय किसी माँ को मिलता है? क्या कभी वो बेटी भी स्वयं ये कहती है कि उसकी माँ का भी पूर्ण सहयोग था? इसके लिए घर के पुरुषों की ही वाहवाही होती है कि उन्होंने अगर "छूट" नहीं दी होती तो ये सम्भव नहीं था। ये देखने से इंकार कर दिया जाता है कि इसमें माँ का मूक समर्थन था। हर तरह से माँ ने सहयोग किया था.. उनका मूक समर्थन ही उनका सहयोग था.. नहीं तो वो भी घरेलू महिला ही होती।        महिला सशक्तिकरण ...

चेतनता की रात - महाशिवरात्रि

Image
शिव शक्ति की उपासना का त्योहार  बिन माँगे मोती मिले सबको उपहार  प्रकृति पुरुष नहीं इक दूजे से विलग  बना है महाशिवरात्रि इसका आधार  सत्यम् शिवम् सुन्दरम् से बना संसार  प्रकृति पुरुष इक दूजे को करे स्वीकार  महाशिवरात्रि कराता हमें इसका भान  भक्ति के पथ पर हो सकेगा तभी उद्धार  महाशिवरात्रि सी ना हुई कोई दूजी रात  गौरी को ब्याहने आए शंकर ले बारात बताते प्रकृति पुरुष इक दूजे के पूरक  हृदय में कराए चेतनता का आभास  शिव शक्ति पर हर पल करें समर्पण  मोह माया तज सब कर दें हम अर्पण  महाशिवरात्रि आदियोगी को करे नमन  प्रकृति पुरुष प्रेम का हुआ है पदार्पण  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली  सर्वाधिकार सुरक्षित©®

जीवनसाथी के नाम

Image
ढ़लती शाम  सूरज का साथ  क्षितिज से मुलाकात  खारा पानी  हाथों में हाथ  हसीन सा ख्वाब उर की धड़कन  दरिया-ए-इश्क  उमड़ता प्यार  अनकही बातें  अधर पर तेरा नाम  छुपे ना अब जज्बात  बन कर तेरा साया  झूमें संग तेरे  सीने से लग  इश्क में इक बार फिर फना हो जाए हम  महकते अल्फाजों में  एहसासत में,एतबार में  उम्र के हर पड़ाव में  वादा-ए-वफा के कसीदे  लिख लें हम हर करार में  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित©®

मेरा गाँव

Image
हृदय का हर कोना है प्रेम सुवासित खिली खिली धूप भी लगे है सुहानी हर तराना गाता जाए गाँव हमारा लाभ हानि सुख दुःख अंक में समेट अपनाता हर्षित हो पूरब पश्चिम का बसेरा  अधूरे ख्वाब ले निकला था गाँव से माँ के आँचल से, ममता की छाँव से चिलचिलाती धूप में हुईं बोझिल पलकें याद आई शीतलता, जो मिले हैं गाँव से दिल में बसता बचपने को जीता एक गाँव  धूप की गर्मी में सुकून देता बरगद की छाँव  सफर लंबा हो गया मकाम हासिल करते करते  मंज़िल पर पहुँच, घर लौट चले हैं फिर से पाँव आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित©®

सांच को आंच नहीं

Image
है झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं,  फिर भी सत्य को अपनाते नहीं। झूठ चैन की नींद देता नहीं,  सत्य की राह पर हम चलते नहीं।  झूठ पीतल सा चमकता कुछ देर है,  सत्य का सूर्य कभी अस्त होता नहीं। सच की लकीरें कितनी भी मुश्किल,  जीवन डगर पर मित्र सा देती साथ हैं। झूठ ऐसा,रक्तबीज सा बढ़ता जाता है,  सच ऐसा जो देता कभी भटकाव नहीं।  झूठ होती कुछ दिनों की ही रवायत है,  सच की करे रहनुमाई,खुदा की इनायत है।  झूठ बनाती लफ्जों की हेराफेरी ही है,  सच अटल अमर होती इसकी बंदगी है।  निश्छल ये वाणी है साँच को आँच नहीं,  झूठ चले उल्टा होते जिसके कभी पाँव नहीं।  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित©®

अंतिम विदाई

Image
मौन हुई है प्रकृति मौन है सुर संगीत भाव की मुखरता लता संग खोई है प्रारब्ध देख दंग है पुत्री चली माँ संग है विकल हुई देश दुनिया  साज भी हुई भंग है  दिलों में बसती रहेगी राग में सजती रहेगी  स्वर कोकिला थी वो स्वर बन चहकती रहेगी तारा जमीन की महान कला की थी वो सुजान विलीन हुई परमात्मा में  दे संगीत को नया आयाम  सुरों की धनी स्वर सम्राज्ञी  दे रहा ब्रह्मांड श्रद्धांजलि  संगीत की धड़कन को  नम आँखें दे रही विदाई  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित©®

तेरी बिंदिया रे

Image
डरी सहमी दोनों बच्चियाँ मेधा और मेघा आकर जमीन पर गिरी माँ के पास बैठ गई। रीमा ने उठकर दोनों को अंक में भर लिया था। तुम जैसी गँवार के साथ नहीं रहना मुझे.. बोल रीमा को धक्का देता हुआ पति अभय अपने बैग के साथ घर छोड़ धरधराते हुए सीढ़ियां उतर चुका था। गँवार शब्द रीमा को थप्पड़ की तरह लगा। अभय और उसके माता पिता ने गाँव की एक शादी में रीमा को देख पसंद किया था और आगे पढ़ाने का भी वचन दे दिया था। तब जाकर रीमा की शादी के लिए रीमा के माता पिता राजी हुए थे.. लेकिन शादी के बाद गृहस्थी के फंदों में ऐसी फँसी कि चाह कर भी आगे पढ़ने की चर्चा नहीं कर सकी। सात साल पहले मेधा और मेघा के एक साथ गोद में आ जाने के बाद तो कुछ और सोचने समझने के लिए रह ही नहीं गया था। फिर भी अपनी गृहस्थी में खुश थी रीमा। गाँव में रहते हुए उसने सिलाई-कटाई भी सीखा था.. कभी ये सारे गुण अभय को लुभावने लगते थे। आज वही अभय गँवार कह हमेशा के लिए जा चुका था। आँखों के सूखे आँसू को पोछती दोनों बच्चियों को पुचकारती सूखे होठों से रीमा हँसने की कोशिश करती है। पापा हमें छोड़ कर क्यूँ चले गए मम्मी.. अब हमारे पास वो कभी नहीं आएंगे.. उन्हें हमार...

आखिरी खत

Image
आज जाने सुबह से कैसा लग रहा है। मन भी बेलगाम घोड़ा सा अतीत की गलियारों में दौड़ रहा है। अतीत की सुप्त यादों में सुगबुगाहट हो रही है, मानो नींद से उठ फिर से जीना चाह रही हो। कहकहों के दौर थे, झूमता सी प्रकृति हमेशा लगती थी.. खिलंदर और अलमस्त थी वो, एक बार जो भी मिल ले उससे, भूल नहीं सकता था, शताक्षी थी वो । एक सुबह सोकर और छत पर गई तो उसकी नजर सामने वाले घर पर गई। ट्रक खड़ा था और एक स्त्री समान उतरवा रही थी, साथ में शताक्षी के उम्र या यूँ कहे एक - दो साल बड़ा लड़का भी था।      वो दौड़ती हुई नीचे गई और हाँफती हुई बोली - माँ हमारे सामने वाले घर में कोई रहने आया है।     उसकी माँ मंजू जी ने कहा - हाँ मुझे पता है और उनके लिए ही चाय नाश्ता बना रही हूँ और चाय नाश्ता लेकर जाओगी तो रात के खाने का भी निमंत्रण दे देना, जिससे एक दूसरे को जान सके। चाय नाश्ता लेकर शताक्षी गई और देखकर दंग रह गई कि इतनी देर में उस दो कमरे के मकान को सुन्दर सा सजा कर घर बना दिया गया था। तभी उस स्त्री ने जिनका नाम रमा था, उसे देखकर कहा - अरे दरवाजे पर क्यूँ खड़ी हो बेटी अंदर आओ। उसने भी नमस्त...

तड़प

Image
खट्टी-मीठी यादों की करके बरसात,  बंद कर लिये तूने दरवाजे अकस्मात। बेहतर था जो हम अपरिचित होते,  ना होती कभी अश्कों से मुलाकात। बेचैनियों की तड़प लिए दिन आई है,  लगे जैसे होने लगी जीवन की रात। शामो सहर तुझमें ही खोया मन रहा,  मालूम ना था मिलेगी ऐसी सौगात। गुफ़्तगू करता मन हमेशा ये कहता,  प्रेम की नहीं चाहिए अब ऐसी खैरात।  गिला नहीं कोई तुझसे ऐ मेरी जिंदगी,  समझनी होगी तुझे अब तो हर बात।  दिल को तड़पा, यूँ मायूस ना कर,  समझ इसे,है ये जीवन की शुरूआत।  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली  सर्वाधिकार सुरक्षित©®

स्वामी विवेकानंद

Image
भारत की मिट्टी ने गौरव ऐसा पाया था प्रकृति ने भी हर्षोल्लास मनाया था  अठारह सौ तिरसठ बारह जनवरी था  जन्म लेकर एक युगपुरुष आया था  विश्वनाथ दत्त माता भुवनेश्वरी का लाल था  हिन्दुस्तान का चमकाया जिसने भाल था  नरेंद्र नाम से माता,पिता,समाज ने पुकारा था  ज्ञान को ही जिसने बनाया अपना ढ़ाल था  जन जन के कल्याण में जिसने जीवन लगाया  सन्यासी बन रामकृष्ण परमहंस सा गुरु पाया  गुरु का आशीर्वाद विवेकानंद था नाम मिला  घूम घूम संदेशों संग भारत का परचम लहराया  अध्यात्म बिन जगत है सूना,अलख जगाया था  पैरों में ना थी बेड़ी,विश्वास ना कभी डगमगाएगा था  आत्मा की उन्नति ही युवाओं के लिए दिया संदेश था  शिक्षा ही है स्वाभिमान की धुरी,जग को बतलाया था  शब्दों में उनके उत्साह, उमंग, प्रेरणा, उल्लास था  आया जो धरा पर इक दिन उसको जाना था  चार जुलाई सन उन्नीस सौ दो काल सम्मुख था  ईश्वर की भक्ति जगाने वाला ईश्वर में समा गया था  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित©®

सुन्दरता बनाम बुद्धि क्यूँ?

Image
कंपनी में टीम लीडर बनाए जाने के बावजूद सॉफ्टवेयर इंजीनियर भव्या बहुत उदास थी। I जिसने भी उसे बधाई दिया.. ये कहते हुए कि तुम्हारी खूबसूरती ने कमाल दिखा दिया। किसी ने उसकी दिन रात की मेहनत को ना देखा.. ना ही प्रशंसा का पात्र समझा। उसे बचपन से लेकर अभी तक की घटनाएं याद आने लगी। विद्यालय में सातवीं में भाषण प्रतियोगिता जीतने पर भी सबने एक सुर में यही कहा.. है ही इतनी सुन्दर... आँखें चौंधिया जाए.. किसी और की बातों पर ध्यान ही ना जाए ऐसे में। कितनी मायूस हो गई थी वो.. उस समय भी उसने भाषण के लिए जाने कहाँ कहाँ से सूचना एकत्रित किया था। बारहवीं में भी चित्र बनाने और उसका वर्णन करने के लिए जब उसे जिला में प्रथम पुरस्कार मिला.. तब भी सबने यही कहा.. इसकी सुंदरता के सामने कुछ और दिखता कहाँ है। उसके पापा ने अगर कदम कदम पर उसे सम्भाला ना होता तो उसका मनोबल कब का टूट गया होता। अगर वो सुन्दर है तो उसकी गलती क्या है.. क्या सुन्दर होने पर बुद्धि खत्म हो जाती है... क्या सुन्दर तन में सुन्दर मन नहीं हो सकता है ..क्या सुन्दर इंसान मेहनती नहीं हो सकते हैं। सुन्दरता या कुरूपता बुद्धि, मेहनत या विनम्रता नापने...

कोहरे की रात

Image
मौसम का बदला है रूख  शीत ऋतु ने दी है दस्तक  ठंडी ठंडी हवा है तड़पाती हड्डियों तक को सिहराती अंगीठी लेकर सारे हैं बैठे  अपने अपने घरों में ही सिमटे सर्दी ने ऐसा आतंक मचाया  पड़ी कोहरे की रात की छाया अलसाई सी भोर है आई गर्म कपड़ों ने जगह बनाई चाय की लेकर गरमाहट  फैल कर बैठी है रजाई दाँत लगते हैं बजने  शरीर में मची है ठिठुरन  दिन रैन हुए एक समान  धूप के होते नहीं दर्शन  कैसे झेले ठंड की चुभन  रूकती सी लगे है धड़कन  आग धीमे से मुस्काया  मेरे ताप से ले लो तपन  मिली तपन मन है हर्षाया धीमे धीमे शरीर गरमाया  बैठे सखी सहेलियों संग  गर्म काॅफी बना हमसाया  आरती झा(स्वरचित व मौलिक)  दिल्ली  सर्वाधिकार सुरक्षित©®