मेरा गाँव



हृदय का हर कोना है प्रेम सुवासित
खिली खिली धूप भी लगे है सुहानी
हर तराना गाता जाए गाँव हमारा
लाभ हानि सुख दुःख अंक में समेट
अपनाता हर्षित हो पूरब पश्चिम का बसेरा 

अधूरे ख्वाब ले निकला था गाँव से
माँ के आँचल से, ममता की छाँव से
चिलचिलाती धूप में हुईं बोझिल पलकें
याद आई शीतलता, जो मिले हैं गाँव से

दिल में बसता बचपने को जीता एक गाँव 
धूप की गर्मी में सुकून देता बरगद की छाँव 
सफर लंबा हो गया मकाम हासिल करते करते 
मंज़िल पर पहुँच, घर लौट चले हैं फिर से पाँव
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली
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