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जुनूनी इश्क

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तेरे बिन सारी दुनिया सूनी है, इश्क मेरा हर हद तक जुनूनी है। जो नही मानता जमाने कि वो रिवायतें, जो तुझे मुझसे दूर करने की करें साजिशें, इश्क का नाता सबसे बेहतर , फूलों से भी नाजुक है, न पूछो कितना भावुक है, अगर अपनी पर आ जाए तो बन जाता  कातिल खूनी हैं। अन्जू दीक्षित उत्तर प्रदेश।

नफरत वाला प्यार

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प्यार तो बस होता प्यार, उसको तुलनात्मक अध्ययन न यार,  कोशिश करो जिससे भी हो, या जो आपको करे, करो उसे वेशुमार। सब सह लेता उसके वास्ते, सबसे हंसीन लगते उसके साथ के रास्ते सबकी बातें लगती बेकार ऐसा ही होता प्यार। कब किसी की सुनता है अपने ही आशमा अपने ख़्वाब चुनता है, हटता ही नही छाता जो खुमार । समाज कानून कायदे कुछ न रहता याद सारे रिश्ते नाते रख देता उठाके ताख, क्योंकि अंधा होता प्यार। फिर क्या बन जाती वजाह, जो  प्यार लगने लगता खता,  शायद फरेबी हो चला अब प्यार। इसी लिए जहां था प्यार ही प्यार, सोचना आखिर क्यों, उससे दो गुनी पकड़ती नफरत रफ्तार। कभी किसी के साथ न करना खिलबाड़, बरना  तवाह कर देगी तुम्हे , उसकी आँखों से बहती आसुओं की धार। कभी बहुत खामोश रह जाती घुटके, जैसे डाल से रह जाती डाली टूटकर भरी बहार। कोशिश करना कभी न बने तुम्हारा,  प्यार,नफरत वाला प्यार। न तोड़ना कभी किसी का एतवार। सौ मोहब्बत के निभाए गए वादों से, कहीं ज्यादा आह भरा होता एक टूटा हुआ विश्वास, कर देगा अपनी नफरत से तुम्हारा गुलिस्ता बेजार। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

कुछ मन का हाल

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ऊंचाइयों पर पहुँचकर कुछ ह्रदयों का यह हस्र है, न सहते ही बने न कहते ही बने साथी उनका  सब्र है, ऊपर चमचमाता ताजमहल अंदर,ख्वाहिशों की कब्र है, कदमों में पड़ी कर्म की साँकरे, मन का परिंदा भर रहा उड़ान है। एक पल में सब भुला दो , शायद व्यस्तता में बहुत आसान है, तन्हां जब भी होंगे मन को बरबस खींच लेगा, मन का जो वियावान है। उर के अन्तर शोर कितना, सब कहाँ समझेंगे, कुछ समझ लेंगे , बस इतना ही सोचेंगे है बात कोई बन्दा थोड़ा परेशान है। किसको पड़ी है किसी को सुने, मुस्कुराते होंठ अंदर से अनमने, देखकर जादूगरी ऊपर वाला भी हैरान है। शराफत ,मोहब्बत, अपनाइयत से था बनाया, दूर दूर तक न कोई फरेब , ईर्ष्या,स्वार्थ था सिखाया, जात पात में  बटकर बना बैठेअलग जहांन है। आदमी भी क्या करे ,जो संग जमाने के न चले, कौन पूछेगा उसे जो अपनी ही धुन में चले, लोग कसते फब्तियां क्या अजब इंसान है। जब कभी अकेलेपन में होते खुद से रु व रु, हो जाटी जाग्रत इंसानियत की रूह, सबसे मिलकर सब सा हो गया,शोहरतों के शहर में सबकी यही पहचान है।  देखकर दुनिया की रियाइस आदमी पागल हुआ, होड़ में बे तरकीब  नुमाइशी जंगल हुआ, ...

देखो हमारे शहर का मौसम

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घटाएं काली, घिरे हैं बदरा , दिन में रात भई अंधियारी , घबरा घबरा जाए जिया। अपना शहर छोड़कर, परदेश चले ऐसे मौसम में सजना, पीछे मुड़ मुड़के देखें छुटी जो डगरिया। झूठी मुस्कान गोरी अधरों पे सजाए, नयना भरे अंसुवन गोरी खड़ी झुकाए, डरे देख न ले कहीं जाते पिया। कितना कठिन छोड़ना अपना शहर, परदेश में  जाके ढूढना घर, सब कुछ मिले परदेश में पर फिर भी भर आए जिया।   आना पड़ा सब कुछ छोड़कर, सगे सम्बन्धियों से बिछड़कर, घर बनाने के लिए छोड़ी घर की देहरिया। मुसाफिर जैसा मिलना बिछड़ना, रह गए जीवन का यही खेला, इसी में बीत जाएगी उमरिया। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

मां

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ईश्वर का दिया अनमोल तोहफा है माँ,  जो कभी न टूटे वो भरोसा है माँ। कोई एक पल एक दिन नही मेरी माँ, मेरे जीवन की हर सुबह हर शाम है मेरी माँ। तपती धूप सी है दुनिया, ठंडी हवा  का  झोंका  है माँ। शब्द छोटे पड़े कैसे लिखूँ, कम पड़ जाए कागज लिखूं जो उसकी महिमा। प्रेम, ममता, करुणा का समन्दर है वो, जिसमें हिलोरें लेता स्नेह अथाह ,वो है माँ। माँ है तो बचपना सलामत है मेरा,  भूल जाती सारे दर्द  प्यार से  हाथ फिराती मेरी माँ।   मेरी माँ तू बनके साया सलामत रहे, जब तक है यह जमी आशमा। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

"क्या लिखूँ ,कैसे कहूँ

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क्या लिखूं कैसे लिखूँ, अन्तस्थ है मेरा रुधा हुआ, शब्द बहुत कलम स्थिर, एक संकोच बना हुआ। कैसा बिछुड़न है जो न होकर भी,  है सासों में भिधा हुआ।  कितनी मुस्कुराहटें होंठो पर,  तेरे कन्धे से लगके रोने को एक आसूँ रुका हुआ। शायद हम न कह पाएं  शायद तुम न समझ सके, मन के किसी गहरे कोने में है जज्बा कोई छुपा हुआ।  कितना भी दिखा दो दुनिया को अपनी मजबूती, दर्द की गहरी चोटों से मन का किला ढहा हुआ। कहाँ ढूढे कोई बता दो बीते पलों को,  छोड़ गया  भीनी खुशबू वो लम्हा हवा हुआ। सावन, पतझड़ सब आए बारी बारी, पर न लौटा वो वक्त जो चला गया। झर झर गिरते आँखों से आसूँ, कितना अचरज दर्द ही दिल की दवा हुआ।  मन का मासूम परिंदा,कंक्रीट पर चलना सीख गया, अचंभित परिवर्तन देख  मुस्कराके अतीत खड़ा हुआ।  अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

खुद में राम ढूढो

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सबको कहते सुना कलियुग है यहाँ कलयुग ,  यहाँ मिलती न सिया अब न  मिलते हैं राम जी। फिर औरत के लिए भी तो कलियुग है , जब  तुम मोहन नही बन सकते , मीरा का जहर का प्याला अमृत नही कर सकते, बनके कृष्ण खुद से पहले राधा का नाम नही लिख सकते उसके मान सम्मान की रक्षा नही कर सकते, फिर क्यों औरत से उम्मीद  करते, हर युग में मौन हो दे क्यों अग्निपरीक्षा,  हर बार वनवास जाए क्यों जानकी। कृष्ण छोड़ राधा रुकमणी के हो गए, रचायी रास सबके मन मे समोह गए, पत्नी के न रहने पर पति नव विवाह करे, पति अगर न रहा तो पत्नी उम्र भर अकेली रहे,  गजब प्रथा है जिसमे बड़ा अन्याय है, स्त्री पुरुष के लिए क्यों अलग समाज है, जब कृष्ण ने चुन ली रुकमणी,  तो राधा क्यों नही हो सकती किसी श्याम की। मर्यादापुरुषोत्तम , सभी गुणों से बने राम थे, या कहें गुण सारे उनके प्रतिमान थे, राम के पद चिन्हों पर चली सिया, सत्य था इतना रावण लंका में भी न छू सका, पवित्र इतनी अग्नि से बाहर हंसकर आ गयी, तुम आज अगर बनो राम , रक्षा करो सीता के मान की, तो वादा है  हर स्त्री की तरफ से मेरा, चल पड़ेगी पीछे संकट विकट ...

नव वर्ष

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आगमन हो गया नूतन वर्ष है हर तरफ  हरीतिमा हर तरफ हर्ष है, नए उत्साह हैं,नई तरंग है, माँ दुर्गा के आशीष अपने संग है।  माता रानी की झाँकी है, मन झूम उठा सहर्ष है। ममतामयी की सूरत लुभा रही, हो रहा मन में शक्ति का स्पर्श है।  हैं ईश्वर से प्रार्थनाआप सबको , खुशियां दे जाए जो यह नव वर्ष है। हिन्दू नव, वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं आप सभी को🙏🏼🙏🏼💐💐💐💐💐🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

तेरे बिन

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तेरे बिन चाँदनी रात भी ख़ौफ़नाक मंजर, तेरे बिन बहार भी ऊसर बंजर। तेरे साथ वीराना भी  आवाद तेरे बिन  महल भी खण्डकर। तेरे बिन सुरमई शामे दर्द का पैकर तेरे साथ मन भावन तपती दोपहर। तेरे बिना सूखा मन का दरिया, तेरे साथ सहरा भी समन्दर। तेरे बिन तन्हां तन्हा हर महफ़िल, तेरे साथ मन उल्लासों  का बवंडर। तेरे बिन में रेजा रेजा,  तेरे साथ मुझमें जमाने का जबर। तेरे लिए मैं क्या हूँ तू जाने, तेरे बिन न मेरी कोई मंजिल न सफर। तेरे बिन कोई  हमदर्द हमराह चुनना ही नहीं, तेरे बिन मुझपर सब बे असर। तेरी आमद मेरी सासों का चलन, तेरे बिन मेरी सूनी रहगुजर। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

वो अनकहा सा क्या

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अनदेखा,अनजाना, अनकहा, न किसी ने देखा न सुना, फिर भी सबके दिलों में बसा,  बनके सरगम  बज उठा। जिसके बिन जिन्दगी बेमानी है, जिससे बनती हकीकत, और कहानी है, कभी शरमाया, कभी गले से लगा। बहुत मासूम सा बहुत नादान है, कभी बे बजह हंसे कभी परेशान है, कभी फजाओं में रोशन, कभी छुपा छुपा। कभी काजल लगी पलकों में रुका, कभी लाली सजे होठों में मिला, है अजब ही इश्क का सिलसिला। न कोई भाषा,न मौन है,अलग ही इसकी धुन है, सबसे कीमती सबसे लाजबाब है, कभी हकीकत कभी ख़्वाब है वो क्या बताओ जरा। इश्कहै, प्यार है ,प्रेम है प्रीत है, सबसे अनोखा इसका गीत है, सुबह सा चंचल , कभी शामों सा दिलकश शमाँ। बस महसूस करने का नाम है, आशिकों को पता इसकी पहचान है,   जख्मों का है मरहम,होंठो की दुआ। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

करो शहीदों को नमन

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शहीद दिवस पर शहीदों को समर्पित भावोपूर्ण श्रदांजलि💐💐🙏🏼🙏🏼 वतन के नाम जो अपनी जवानी दे गए, जो हकीकत से बनी वो कहानी दे गए। देश पर अपनी हस्ती मिटाकर , वतन से बढ़कर कुछ नही यह बताकर, वतन है सर्वोऊपर वो जज्बा तूफानी दे गए। जो कभी धुंधली होगी नही, हर पीढ़ी करे गर्व जिसपर, युगों युगों को वो निशानी दे गए।  हँसके चढ़े फाँसी के फंदे पर, फक्र है हमें उस नेक बन्दे पर, सीने में बसी वो यादें सुहानी दे गए। वंदेमातरम🇮🇳🇮🇳💐💐🙏🙏🇮🇳🇮🇳

होली कहाँ गई

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ढूढते हैं हम वो होली कहाँ गयी, रंगीन चौक की रंगोली कहाँ गयी। रह गए सब फोन पर बोलकर हैप्पी होली,  बच्चो की वो टोली कहाँ गई।    गुलाल है अबीर है अफसोस तुम नही, पूछता है दिल वो हमजोली कहाँ गई।   रँग भर भरके सूरतें होती थी बे पहचान, पर दिल से मिलन बाली वो  बोली कहाँ गई। हो गए ने फैशन नए स्टाइलिश लुक,   बदल गए रँग ढंग, वो सूरतें भोली कहाँ गई। रह गए सब अपनो में सिमटकर, वो चौपार वो ठिठोली कहाँ गई।  अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

तुम लौटो तो

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तुम लौटो तो,,सज गया है घर यूँ तो मेरा लाजबाब, तुम लौटो तो इसमें चहलकदमी लौटे। हर दीवार का रंग रोगन है लाजबाब, बस कर रहीं यह इल्तजा आ जाइए आप, तुम लौटो तो इनमें रोशनी लौटे। चल रहीं हैं सासें तेरे जाने से बुझी बुझी, भरी बहार में है जिंदगी लुटी लुटी तुम लौटो तो इनमें जिन्दगी लौटे। जला आते हैं हर रोज चौबारे पे दिया तेरे नाम का, भूल न जाके तू रास्ता कहीं हमदम,   जब घर की  गली लौटे। तेरे ही काँधे पर सिर रखकर बरसेंगे, खुश्क हो गए हैं आँख के आसूँ इसी जिद में, तुम लौटो तो पलकों की यह नमी लौटे। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

क्या होगा

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टुकड़ा टुकड़ा, रेजा रेजा होकर भी क्या होगा, जिसे पाना नहीं मुंकिंन उसकी यादों में खोकर भी क्या होगा। माना कि उम्र के रास्ते बड़े कठिन हैं, मानते हैं हम हँसकर जो न होंगे आसान , फिर तू ही बता हाँसिल रोकर भी क्या होगा। हकीकत में उसका साथ इस जन्म न मिलेगा, जो सच है साथ है चलो उसको गले लगाते, झूठे ख्वाबों के साथ सोकर भी क्या होगा। उसकी मुस्कुराहटें अब तन्हाइयो की साथी हैं, महफिलें अब कहाँ वो तरन्नुम ला पाती हैं, तबस्सुम से न कटेगी तो पलक भिगाकर भी क्या होगा। अगर तेरे जहन में नही सफ़क्त जरा, नही होती बुराई से घबराहट जरा, तो कुबूल दुआ तेरी मन्दिर मस्जिद में सर झुकाकर भी क्या होगी। रूह पर तेरी जो चढ़ गया गुनाहों का लिवास, फिर जिस्म को न होगा पाकियत का अहसास, जो न हुई ईमान से पाक, वो गंगाजल में नहाकर भी क्या होगी। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

अनजान

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     कभी थे जिनसे अनजान, आज हो गए वो दिल के मेहमान, सासों में बनके खुशबू बसे वो, जब से हुई पहचान।  सोए थे जो मुद्दत से, जाग गए सारे अरमान।  कुछ बने न बने हम, पर बनना चाहते एक अच्छे इंसान  तेरे बिन न जी पाएंगे, दूर हुए तो बिछड़े गी यह जान। बहुत भरोसा किया तुम पर, न होना कभी तुम वे इमान। उम्र बड़ी पर दिल मेरा, आज भी मासूम नादान। न सूझे कुछ तुझसे बिछड़कर, दिल में उठे तूफान। कैसे जीऊँगी मैं बाबरिया, सोचकर दिल परेशान। अन्जू दीक्षित, उत्तर प्रदेश।

मंहगाई

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आज अशोक की आँखों के आसूँ रोके नही रुक रहे थे। तभी उसने अपने कन्धे पर किसी के हाथों की गर्मी महसूस की, पलटकर देखा तो वो अनीता थी, अशोक खुदको रोक न पाया और अनीता के गले लगकर फफक पड़ा। अरे क्या हुआ आप पार्टी से इस तरह चले क्यों आए , और रो क्यों रहे ,किसी ने कुछ कहा क्या?????   अशोक को कुछ याद आया वो खुद को सभालते हुए बोला चलो चलते बाहर बरना हमें वहाँ न देखकर सब आ जांएगे। अनीता  --पर हुआ क्या बोलो तो। अशोक-- वो कल घर चलके बताता, कल सुबह थ निकलना है। अनीता भांप गयी कि अशोक कहना नही चाहता पर कुछ हुआ जरूर है। बरना वो इस तरह कल जाने की बात नही कहता, वो तो रुकने के हिसाब से आए थे। आखिर वो उसकी पत्नी है पिछले 19 साल से दोनों का साथ था दोनों बिना कहे एक दूसरे को समझ जाते थे। खैर अनीता भी बाहर लॉन में आ गयी। सभी पार्टी का आनन्द ले रहे थे, पार्टी पूरे शबाब पर थी या अपने अंतिम चरण पर। सभी धीरे धीरे अपने गंतव्य की ओर बड़ गए रवि, अजय उनकी पत्नियां  भी  अशोक को सोने का कहकर अपने रूम में चले गए। अनीता अशोक भी सोने आ गए, पर अशोक की आँखों में नींद की जगह अफसोस था, इसी के चलते वह क...

यादें

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माना हो गई कुछ धुंधली हैं तुम्हारी कितनी यादें आज भी, जहन से मेरे लिपटी हैं।   वो खामोशियों के साए में, नजरों के  दरमियाँ जो हुई, उन यादों की खुशबुएं आज भी बिखरी हैं। मैंने सोचा था काफी अर्सा हुआ, भूल गए न उनका चर्चा हुआ, जब भी हुए तन्हा बनके चाँदनी  वो छिटकी हैं। जब भी किसी ने तन्हां छोड़ा, जब भी किसी ने दिल तोड़ा, तेरी यादों की परछाइयां निखरी हैं। शायद मिलता प्यार तो देते सब भुला अफसोस तेरे जैसा कोई मिल न सका, आज भी वो ख्वाहिश  दबी दबी है। मुझे मालूम हैअब यादों का कोई अर्थ नही, इस सुलूक की दुनिया में उनकी  कोई जगह नही, फिर भी यादें कब परवाह कोई करती हैं। कितना याद आते हैं वो मासूम लम्हें, मोहब्बत के शहर में कदम थे पड़े, वो यादें आज भी वेपनाह मचलती हैं। बस यादें करके हवा का कभी रुख, हिला देतीं है मन के वियावान को, जानते हैं सभी यादों से कहां जिन्दगी कटती है। अन्जू दीक्षित उत्तर प्रदेश।

नारी नही बेचारी,,

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 भारत की नारी है, ना कोई अवला ना बेचारी हैं, अगर अपने पर आ जाए सारा इतिहास बदल देंगे। क्यों देते हो टुकड़ों में आरक्षण, हम भी बराबरी के अधिकारी हैं, अपने पर आ जाए सारा नागरिक शास्त्र बदल देंगे । यह व्याकरण यह समीकरण सब में , महारत है हासिल, मत दो चुनौती हमको , हम गार्गी के वंशज है सारा शास्त्रार्थ बदल देंगे । तुम्हें स्थान दिया है ह्रदय में , तुम ह्रदय से करो आभार मेरा, ना कहो अस्तित्व मेरा तुमसे,सारी पहचान  बदल देंगे। हमे गौरी ,सीता सावित्री ही रहने दो, ह्रदय से हमारे ममतामयी धार बहने दो, बन गए हम रणचंडी तो शिव का स्थान बदल देंगे । यह कहते हैं महाभारत की रचयिता द्रोपदी है, कहते सीता रामायण की जननी है, न सुधरे कलयुग के कौरव तुम तो वही परिणाम बदल देंगे। हमने अपना सर्वस्व तुमको समर्पण कर डाला, समझकर इसको विवस्ता तुमने हर भाव मसल डाला , रहने दो दया क्षमा हममें नही तो तख्तो ताज बदल देंगे।   बचपन से हमको सिखलाया औरों के लिए जीना है, त्याग तपस्या सब्र का गर्ल उम्र भर पीना है,   आ गए जिद पर तो सारे  भाव परमार्थ बदल देंगे । दे दो मान और उचित सम्मान हमें, मत करो अति जो ज...

माँ शारदे तुम्हें नमन है

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अद्भुत छटा है छाई, माँ शारदे हुई प्रकट, वसन्त ऋतु है आई।  नव पल्लव हुए पल्लवित, धरा निखर आई। हर तरफ मधुकर कर रहे गूँजन, कानो को लुभाए कोयल का वचन, स्वर्णिम सी आभा खेतो में लहराई। मन को भा रहा है सुन्दर वातावरण, ठंडी ब्यार तन मन को करती सुखद, वर्णन करना मुश्किल क्या गजब आभा छाई। मां शारदे ओ वीणा वादिनी, कमलाआसना  ओ वीणापाणनि, जन जन के मन मे भर दो ज्ञान की अंगड़ाई।  मां शारदे तुम्हें ह्रदय से नमन है, तेरी ही दया से हुए सब प्रबुद्ध जन है। हमें भी आशीष देकर बो ख्याति दो जो सभी को दिलाई। अन्जू दीक्षित, बदायूँ, उत्तर प्रदेश

मन कर उनको नमन

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उनकी याद में आज नयन अश्रुपूरित हुए, देश के हित लाल जो समर्पित  हुए   भरी जवानी को जो  कुछ पल ही जिए, जहर यातनाओं के उन्होंने पिए, जिस उम्र में वो देश हित फाँसी चढ़े , आजके नो जवां पथ भ्रमित हुए । न आसान था आजादी को लाना, था न आसान गणतंत्र बनाना, हँसते हँसते मिटा दी हस्ती अपनी, तब जाके तिरंगे पल्लवित हुए। न रिश्ते न नातों की आस थी, मन में भारती की आजादी की प्यास थी, अजब मतवाले थे रणबांकुरे, जब तक है धरा उनके गुण गाएंगे। माँ भवानी को कर शीश तृपित हुए। अंजू दीक्षित, बदायूँ, उत्तरप्रदेश।