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पिता दिवस पर सभी पिताओं को नमन्।🙏🌹🌹

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मैंने अपने पिता में भी मां की छवि पाया है; पिता को भी मां की तरह फिक्रमंद देखा है। पिता बेटियों के जीवन चलचित्र का नायक; पिता की नजरों में सारा आसमान  देखा है। पिता भी मां से कोमल; उनके ह्रदय में भी हमने समन्दर देखा है।; मैंने पिता में आधा मां को देखा है। ✍️"paam"

हे ईश...

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हे ईश करूं क्या तुझे अर्पण  दिया तूने मुझे इतना सुन्दर जीवन।  प्राणों से भी जयादा चाहा मुझको  मिला ऐसे माता -पिता का संबल।  हर जन्म में तू मुझे मिलना करूं बारंबार तुझे वंदन!! ऐ मातु पिता तेरा अभिनन्दन!! ऐ मातु पिता तेरा अभिनन्दन!!       ✍️"पाम " हे ईश करूं क्या तुझे अर्पण।  दिया तूने मुझे इतना सुन्दर  जीवन! ना धूप सहा मैंने, ना कोई चुभा नश्तर  किया छांव ही छांव पग पग पर। खुद चलता रहा ,जलता ही रहा हौसलों की उङान मुझमें भरता ही रहा। ऐ मातु पिता तुम्हें वंदन।    प्राणों से भी ज्यादा चाहा मुझको मिला ऐसे माता पिता का संबल। मेरे रोम रोम से उनका करती रहूं मैं अभिनन्दन! हर जन्म में मिलें यही मातु पिता! और न कोई अभिष्ट मेरा। न कोई मेरा विह्वल क्रंदन  हे ईश करूं क्या तुझे अर्पण!! दिया तूने मुझे इतना सुन्दर जीवन।        @ डाॅ पल्लवीकुमारी"पाम "           अनिसाबाद पटना,बिहार।

"उन रेशों को मत उधेङना"

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उन रेशों को मत उधेङना जो बारीकी से गुंथे हुए हैं । जिन पर रिश्तों की बुनियाद है, उन कङियों को जरा सम्भाल कर रखना ; ये  बङे नाजुक हैं । कि जरा अहमियत इनकी बचाए रखना, सिर्फ लेन देन की तराजू पर मत तौलना कि भावों का तो कोई मोल नहीं होता।                ----"पाम" किसी के समर्पण को उसकी कमज़ोरी  न समझना ;  कि संस्कार के लिबास में  परम्पराओं को कोई तो वहन कर रहा। मत करना अवहेलना, किसी की सरलता का। कि सरलता ही शिवत्व है, और मुक्ति का द्वार भी !!    ✍️  पल्लवीकुमारी"पाम            अनिसाबाद, पटना,बिहार

"ये अक्षर नहीं,, रोशनदान हैं"

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ये अक्षर नहीं बंद दरख्तों से झांकते रोशनदान हैं। खुलता जिससे विहंगम दृश्य है, स्वप्न को अर्थ देते,मृग शावकों सी कुलाच भरते हैं।  स्वप्न वजह देती जीने की,, न हो अगर मृत हो जाए आदमी! ये अक्षर••• शब्द गढते••अर्थ ढूंढते... अंध कूप से बाहर  की दुनिया दिखाते!  रहट बन जाते हैं ,अभिप्सु बन कामनाओं का पंथ तरासते.. हमारे चीर सहचर बन जाते हैं।            हैं जीवित जब तक स्वप्नों का मायाजाल  हम भी मुसाफिर  हैं यहां.. खो गए जिस  दिन स्वप्न के अवलम्ब से,, स्पंदनहीन हो जाए जीवन  भी। ये सखा है,बंधु भी। ये सृजन के आधार स्तंभ!! और मृतप्राय के कायाकल्प!! वह दृग वृक्ष जिस पर लिपटते आरोह की हम अमरबेल हैं।  यही पथिक बनाते,गंतव्य तक पहुंचाते ,, फिर नवीन सृजन के द्वार खोलते... साहित्य की अभिप्रेरणा से अनंत आकाश की उङान भरते.. अक्षर चमकते जुगनुओं सी अंधेरे में आशाओं के दीप हैं।                          डाॅ पल्लवीकुमारी"पाम"             ...

अतीत के पन्ने और भविष्य की आहट

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अतीत के पन्ने स्याह से, खोये हुए अपनों के बिना निर्जीव से,, यादों के अवलम्ब पर बनते चित्र निर्मूल .. घर की पगडंडियों भी अब अपरिचित सी..  मालूम होता अब कोई नहीं रहता वहां ! न मैं,न मेरी आहटें,न खुशियां ,न मेरे अथूरे सपने!  बंद दरख्तों के रोशनदान खुले नहीं कब से.. ये अतीत की गलियां संकरी सी!! जहां आकृतियां तो हैं, पर स्पंदन नहीं! अनुभूति तो है पर छाया सी, छूने जाऊं तो पकङ में नहीं आती!              @✍️"पाम" और भविष्य? सूर्य के समान जीवंत ! इंद्रधनुष के सभी रंग लिए  अनन्त आकाश के विस्तृत नीले पट पर कुछ नवीन आकृतियों की प्रतिक्षा में  तटस्थ खङा है!! मौन के सानिध्य में , मुखर होती आकृतियां... भविष्य के रूपहले रथ पर ... अंधकार की कालिमा को छोङ,,  रक्तिम आभा से दग्ध..  जीवन को फिर से पुकार रही है। जो स्वप्न जीने की चाह थी कभी.. वो दूर क्षितिज पर बिखरा सिन्दूरी रंग उन सपनों को रंग देने भविष्य के रोशनदानों से झांक रही है!!                      डाॅ पल्लवीकुमारी"पाम" ...

प्यारी माँ

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इक वक्त था "प्यारी माँ" जब तू मुझे दुलारती थी। हाथों से अपने मुझे रोज़ संवारती थी। मेरे ही सपने अपनी आँखों में संजोती थी। बेचैन रातों में मेरे साथ जागती थी। धड़कन जैसे मेरी तुझ में ही बस जाती थी। हर उलझन मेरी परेशान  तुझे कर जाती थी। फिर वक्त की बदली करवट में मैं तुझसे दूर हो गयीं। बंध कर समाज के बंधनों में कितनी मज़बूर हो गयीं। अनचाहे सायों की परछाईयों के बीच कहीं गुम हो गयीं। सिल दिया होठों को कितनी खामोश हो गयीं। नयी आहटों की गूंज सुनने में मैं खो गयीं। वेदना अंतर की तेरी मेरे मन में भी उतर गयीं। तुझ सी मूरत में ढली मैं हर मुश्किल से लड़ गयीं। जीवन के उतार चढ़ावों को हंस कर झेल गयीं। पर आज भी एक उदासी तेरे बिन मन में रह गयीं। दूर होकर तुझसे ये टीस जाने कैसे सह गयीं। सँभालते इन रिश्तों को जब थकान को हावी पाती हूँ। सब कुछ करके भी जब कुछ भी नहीं पाती हूँ। एक पल भी सुकूँ जब हासिल नहीं कर पाती हूँ। तब बचपन में अपने एक बाऱ लौट जाना चाहती हूँ। उस वक्त को मैं दुबारा  जी लेना चाहती हूँ। गोद में तेरे सिर रखकर माँ में फिर सो जाना चाहती हूँ। 💖Happy mother's day 💖 स्वरचित  शैल...

"मां"

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मां मैंने फूलों को झरते हुए देखा! लगा मैंने तुम्हें हँसते हुए  देखा!! मैंने पत्तियों को झूमते देखा हवाओं संग , मुझे लगा तुम किसी से बातें कर रही!! सुबह-सुबह पत्तियां ओस -कणों से भीगी थी क्या तू भी मेरे लिए रोई थी! ये हवाओं में खुशबू बिखरी है क्या ये तूने आशीष भेजी है!!          "पाम "

डर मेरे मन का तू जरा ठहर!

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डर मेरे मन का!! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का  तू जरा ठहर! मुझे मत डरा. 🔹️🔹️🔹️🔹️ मैं जानती हूं  तू कितना कमजोर है! प्रयास की थोङे टक्करों से  तू बिखर ---बिखर जाता है सच्चे प्रयास से तू कितना घबराता है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर तू वहीं ठहर जा। अभी संकल्प अपनी साज सज्जा में निमग्न है, तू मत झांक! तेरा अस्तित्व अब निर्मूल होने को है। 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मत खङा कर अवरोध! कि अभिलाषा ने  तूलिका पकङी है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ कुछ निर्माण के तिनके संजोए  विहग उङान  पर है! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मत लिबास बदल.. ना छुप कर मत कर आघात! कि उत्साह स्वर्णिम पथ पर आरूढ है। 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का चुपचाप  चला जा कि झंझावतों से जूझना हमने सीख लिया है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ डगमगाती नैया संभालने स्त्रीत्व मुखर हो चला है, उसने --जान लिया की रचनाधर्मिता ही तो उसकी पहचान है। निर्माण,निर्माण और निर्माण! 🔹️🔹️🔹️🔹️ अभिलाषा की अधिष्ठात्री निर्माण! जीवन की स्वीकृति निर्माण! समय की उद्घोषिका निर्माण! पंथ जो स्वावलंबन का, निर्माण से मुक्तिबोध का! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर को निर्मूल कर निर्माण  क्षितिज पर  उन्मुक...

ओ गुलमोहर

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"  ओ गुलमोहर तू कैसे खिलता है इतनी कङी धूप में? विस्तृत लाल रंग की चुनर में  जैसे कोई  परिणिता जीवन के कङे धूप को अपनी हंसी से झूठलाती अपने विश्वास पर अडिग अपने नीङ के निर्माण  को उत्सुक हो अनंत आकाश सी विस्तृत हो चली है; ये सूर्ख लाल फूल तेरी गरिमा को संजोए, मुस्कुराते जीवन का अभिनन्दन कर रहे! बिखर कर दूर तक फैले हुए  मृतिका कण को भी तृप्त कर रहे! जब नन्हीं ओस कणों से मिलकर मृदा को भी जीवंत कर उठेंगे  और पनपेंगे सूक्ष्म जीव कोटि- कोटि  संख्य  -संख्य !! जीवन - जीवन  धन्य -धन्य  और वसुन्धरा कर उठेगी अभिनन्दन  अभिनन्दन! जीवन  जीवन  को प्रतिफलित  करता! है वही अमृत सम! ओ गुलमोहर  तू कैसे झूठला देता.. हवाओं की तीखी प्रहार ,, और तीखी किरणों की बौछार! तुझे मिलती झंझावतें पर तू कैसे लौटाती है खिलखिलाहटें!!        डॉ पल्लवीकुमारी"पाम"     अनिसाबाद, पटना,बिहार

डर मेरे मन का!!

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🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का  तू जरा ठहर! मुझे मत डरा. 🔹️🔹️🔹️🔹️ मैं जानती हूं  तू कितना कमजोर है! प्रयास की थोङे टक्करों से  तू बिखर ---बिखर जाता है सच्चे प्रयास से तू कितना घबराता है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर तू वहीं ठहर जा। अभी संकल्प अपनी साज सज्जा में निमग्न है, तू मत झांक! तेरा अस्तित्व अब निर्मूल होने को है। 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मत खङा कर अवरोध! कि अभिलाषा ने  तूलिका पकङी है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ कुछ निर्माण के तिनके संजोए  विहग उङान  पर है! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मत लिबास बदल.. ना छुप कर मत कर आघात! कि उत्साह स्वर्णिम पथ पर आरूढ है। 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का चुपचाप  चला जा कि झंझावतों से जूझना हमने सीख लिया है, 🔹️🔹️🔹️🔹️ डगमगाती नैया संभालने स्त्रीत्व मुखर हो चला है, उसने --जान लिया की रचनाधर्मिता ही तो उसकी पहचान है। निर्माण,निर्माण और निर्माण! 🔹️🔹️🔹️🔹️ अभिलाषा की अधिष्ठात्री निर्माण! जीवन की स्वीकृति निर्माण! समय की उद्घोषिका निर्माण! पंथ जो स्वावलंबन का, निर्माण से मुक्तिबोध का! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर को निर्मूल कर निर्माण  क्षितिज पर  उन्मुक्त हो चला है। 🔹...

जीवन की कठिनाई।

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जीवन की कठिनाई से संभावनाऐं मरा नहीं करती वो देखो हरित हो चला कङी धूप सहकर अमलतास भी। जो  अन्दर था पनप रहा, ,वही तो आएगा बाहर भी। सूख गया मूल पेंङ, और काली पङ गई टहनियां  पत्ते भी न सह सके  जब तीखी हवा की जलन और बिखर गए हवाओं संग। कुछ  जब रहा न साथ तब भी खङा रहा अमलतास कङी धूप सह कर भी  ऑर करता रहा जीवन का संचार अन्तस और  बाहरी भी। बीज फलियों का संरक्षण बिखर गए  जब सब,,,यह भी तो बिखरेंगे पनप कर पूर्ण बनेंगे  जब होगा नवीन अवसर।  ओर कोपलें होंगी प्रस्फुटित  हरे ऑर स्वर्ण रंग में, फिर पक्षियों का बसेरा  होगा इसके भी  डाल डाल पर। और कलरव का गान सुन झूमते पल्लव फिर  करेंगे  बीज मंत्र का यशोगान निरंतर! जीवन सुमधुर,,,और नित्य ही सृजित होते,,,नवीन  अवसर,,प्रवीण अवसर।  कठिनाईयों से संभावनाऐं मर नहीं करतीं वो देखो हर हो चला कङी धूप सहकर अमलतास भी।         डॉ पल्लवीकुमारी"पाम "         अनिसाबाद, पटना बिहार

"हां मैं पिता हूं "

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कर्तव्य पथ आरूढ; निज -धर्म निभाता हूं।  हां पिता हूं व्यक्त नहीं कर पाता हूं!! मेरे ह्रदय के टुकडों सुनो~ मैं अब तुमलोगों में ही जिन्दा हूं।  मैं पतवार हूं ~ हर संकट से तुम्हें खींच लाता हूं!! मैं पिता हूं व्यक्त नहीं कर पाता हूं। तुम्हें मिले हर खुशी जो मैंने ना पाई है; इसलिए आज भी कर्म अपना नित निभाता हूं।  मैं स्नेह-पाश से बंधा हूं,, तुम फलो-फूलो, वट-वृक्ष बनो, इसलिए हर बाधा को मोङ देता हूं; मैं पिता हूं व्यक्त नहीं कर पाता हूं।  पर तुम्हें कष्ट हो कोई , ये देख नहीं मैं पाता हूं । आश्रय मिले तुम्हें छांव का; इसलिए ही जीवन का कङा धूप   सहता जाता हूं। हां मैं पिता हूं,,,व्यक्त नहीं कर पाता हूं।             एक पिता के मन की भावना                          ✍ डाॅ  पल्लवी कुमारी"पाम "

"मां "

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मां कौन कहता तुम नहीं हो, तुम हो यहीं हो मेरे मन में, ईस जीवन में  फूलों की खुशबू की तरह शामिल हो। दिन के उजाले की तरह नित्य हो! सारंग बन मन को शीतल करती। एकांत के शोर में! मौन के प्रबोध में! आत्मा की तल्लीनता में,  बस दूर हो गई हो  समय के कालचक्र में।   पर तुम हो! मेरे अंतर्मन में ! मेरे मनोल्लास में ! मेरी अनुकृतियों में तुम ही तो हो। कोई कहता तुम  अब नहीं हो... पर मैं जानती हूं  मेरे खाने के स्वाद में,  परिधान के चटख रंग के चुनाव में,  किसी अन्य के परवाह में, आशीर्वचनों के बोल में  मेरे आवाज की माधुर्य में ,  जीवन के स्वीकार्य में,  तुम ही तो हो। मां तुम हो यहीं मेरे अंतर्मन  में,  मेरे विश्वास में, मेरे जीवन की प्रेरणा में , तुम ही तो हो! कैसे मान लूं कि तुम अब नहीं..                              " पाम "

"अपने जीवन में राग- रंग"⚘⚘🌼

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आज का दिन मेरा है। किसी टैब के ब्लैंक पेज की तरह। हम जो चाहें लिख सकते... जो चाहे बना सकते... नदियां,फूल,पहाङ,कलाकृतियां। सहेज सकते बनाकर स्मृतियां! या ख़ाली छोङ सकते... जिस पर कोई अन्य उकेर जाएगा अपनी मनोवृतियां। फिर क्यूं न पकङी जाए, हाथों में कूचियां, और खींचीं जाए, आङी तिरछी लकीरें, और भरा जाए कुछ  रंग अपने रंग  का! कुछ  रंग अपनी आत्मा के परछाई का। कुछ रंग हिरणों के कुलाच का.. कुछ रंग स्पंदन का.. रीते हुए दीवारों पर बना कर स्मार्कें, रखी जाए कुछ पंखुड़ियां 🌺⚘🌼 राग रंग का ! कुछ  आकृतियां गढ़ी जाऐं,  मन के टूटे हुए टुकड़ों से! कुछ  रंग आंधियों का, कुछ स्याह पङ गए,  मन की दीवारों पे, मिला कर स्वर्ण रंग, बनाया जाए हरा रंग ! जैसे कृष्ण मिले राधिका संग, यमुना किनारे शरद पूर्णिमा  में रचा रासरंग। हो रहे निमग्न,,,मदिर -मदिर तन और मन। जैसे मिल रहे ताल- छंद, और बज उठे ह्रदय तरंग कर कोई नवीन सृजन।  चलो भरें कुछ  नये रंग  और पूर्ण हो जाऐं राधिका संग! भर अपने जीवन में राग रंग।                ...

मेरी शेरोवाली माँ मुझे रास्ता दिखाना तुम।

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है मतलब की दुनियाँ ये मुझे इससे बचाना तुम मुझे इंसान बनाया है मेरी इंसानियत बचाना तुम। जरा पतवार कच्ची थी... मेरी पतवार कच्ची थी ... मेरी नैया बचाना तुम । मेरी शेरोवाली माँ मुझे रास्ता दिखाना तुम। है व्यापार की ये दुनियाँ रखूँ महफूज़ खुद को  कैसे? वो कवच बतलाना तुम? मेरी शेरोवाली मां मुझे रस्ता दिखाना तुम।  मेरी माँ तो सच्ची है; मेरी राह तकती है। मुझे काबिल बनाया है। हौसला दिलाना तुम मेरी शेरोवाली मां मुझे रस्ता दिखाना तुम।  कहीं भटक जाऊं मैं  चल चल कर, मेरी छांव बनना तुम। मुझे रस्ता दिखाना तुम। मेरी शेरोवाली मां मुझे रस्ता दिखाना तुम।  नहीं भूलूं कभी मंज़िल  भटक कर स्वार्थ की गलियों में, रखूँ हौसला खुद पे वो शक्ति दिलाना तुम। मेरी शेरोवाली माँ... मुझे इंसान बनाया है.... मेरी इंसानियत बचाना तुम। जरा पतवार कच्ची थी... मेरी पतवार कच्ची थी... मेरी नैया बचाना तुम। मेरी शेरोवाली मां मेरी नैया बचाना तुम।  मेरी माँ तू सच्ची है ; बस हौसला दिलाना तुम। मेरी शेरोवाली मां मुझे रस्ता दिखाना तुम।  मुझे रास्ता दिखाना तुम।  मुझे इंसान बनाया है, मेरी इंसानियत ...

माँ

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मां तू कण-कण में; जीवन के हर क्षण में; मेरे तन के.... कोशा-द्रव में; प्रतीत होती है; कहां खोजें और तुम्हें; इस मन से तू दूर कहां होती है!! इन अंखियों के विह्वलता में; हर पल झांकती होती है; मां तू मुझसे दूर होकर मेरे अंतःकरण में छा गई; तेरी खुशबू बन हवा जब  मुझे सिहरन देती है; तुम मुझे अपने ईर्द-गिर्द ही प्रतीत होती है। इस मन से तू दूर कहां होती है!! हां तू बिखर गई पंच तत्वों में; मैं अब इन्हें ही शीश नवाती हूं  इनमें ही तूझे ढूंढती हूं।  जब तू गहरी निन्द से जाग चेतना का प्रवाह पाएगी क्या तू मुझसे मिलना चाहेगी?           ✍डॉ पल्लवी कुमारी"पाम "

मां....

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माँ तू नहीं पर तेरी आहट्टे हैं,, स्मृति की दिवारों से टकराकर गूंजती तुम्हारी तस्वीरें हैं,,  चलचित्र की भांति मन की भित्तियों पर दिख ही जाती हैं,  जब कभी अकेली होती हूँ। जैसे खाली जमीं पर उग आती हैं हरी -हरी घास।  ये जीवन की ओर खिंचती हैं  मन को आच्छादित रखती हैं। तपन से,चुभन से.... तुम्हारी गिनी -चुनी तस्वीरें,  जहां समय ठहरा था... कुछ देर के लिए ही सही।  आज भी जीवंत है,, अपने भावों में .... खुशियों के लम्हों को समेटे। जब कुछ  नहीं रह जाता, ये तस्वीरें रह जाती हैं... खुशियों को दामन में समेटे। जो छलक गया वह अमृत था, शेष कलश में खुशबू ही अब बाकीहै। जो बीत गया वो अप्रतिम था, मधुर यादों की अमिट छाप  ही अब काफी है। तू गई  नहीं कहीं,, मुझमें ही कहीं बाकी है।  तुझे फिर से एक नये रूप में पाना है तू यहीं कहीं..घर की गलियों में,,मन्दिर के आरती में,  पीङा के क्षणों में जीवंत हो उठती है। तेरी एक सुन्दर तस्वीर बनानी है, मां तू नहीं पर तेरी आहटें हैं.. आहटों के गूंज से ,,, स्वर लहरियों को साधना है। मां तेरी हंसी को अपने मन  से अपने जीवन मे...

शब्द की साधना ही मां की आराधना है

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मां सरस्वती  मां ही लक्ष्मी,  मां कल्याणी भी बन जाती है। मां तेरे कितने रूप  मैं अभिभूत हो जाती हूं  तेरी विराटता ही फिर अपने जीवन में दुहराती हूं।  जो छलक गया वह अमृत था, शेष कलश में खुशबू ही अब बाकीहै। जो बीत गया वो अप्रतिम था, मधुर यादों की अमिट छाप  ही अब काफी है। माँ के कितने रूप  पर मीठे बोल सब पर भारी है। होती शारदा खुश  वहां, जहाँ शब्दों की मर्यादा है। शब्द ब्रह्म... शब्द नाद... शब्द में ही सृष्टि समाया है। शब्द की साधना ही मां वाग्देवी कीआराधना है। करना है पूजा शारदा की... तो आओ पहले शब्द को साधते हैं।  मां शारदा को शब्दों का हार पहनाते हैं।  सरस्वती,,लक्ष्मी और कल्याणी सी  हर मां को शीश नवाते हैं । अपनी शब्दों के फूल अर्पित कर आशीष उनका पाते है। वाग्देवी की सच्ची आराधना करते हैं।         ✍डॉ पल्लवीकुमारी"पाम

माँ...

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माँ... माँ...माँ...माँ कहाँ है!! तू बुलाई नहीं.. मैं आई भी नहीं!! मैं तो वैसे भी नहीं आती थी जब तू बुलाती थी! अनसुना कर जाती थी! पर मैं जानती कि तू अंतिम बार बुला रही तो मैं जरूर आती। तेरी आवाज़ गूंजती है कानों में.. जब कुछ बनाती हूँ रसोई में! कुछ भी अकेले में कर रही होती हूँ.. सुनाई देती है तेरी फिक्र वाली आवाज़। फिर अपने काम में लग जाती हूँ। अचेत या सचेत... मौन या मुखर... बस तेरी ही प्रतिध्वनियां हैं तू आ खड़ी होती है  आत्मा के चैतन्य में!! मेरे प्रत्यावहन से विवश होकर। फिर रूकती क्यों नहीं!! हँसते हुए.. आम्र मंजरियों की तरह सुवासित कर जाती हैं मन के झरोखों का हर कोना!! जैसे साँझ की बेला में दिवाकर छुप जाते.... मेरा मन तेरी यादों की झुरमुट में छुप जाता है। तेरे गीतों के बोल मेरे कानों में गूंजती हैं,, कहाँ है तू?? मेरे अंतस के धरातल पर तो आकर मिल। देख ना... फिर त्यौहार आया है.. बाबा को तेरी सिल्वट पर पीस कर बनाये दहीबड़े कितने पसंद थे!! और भभरे के लिए तू चने की कितनी झंगरियां छिलती थी। बाबा को पता था तू ही छिलेगी.. इसलिए तो तुझे ही कहते.. बाजार से ख़रीदे चने अब अच्छे ही नहीं ल...

स्वर कोकिला को श्रद्धांजलि

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एक सांस का चलना रूक गया,  सुर का साधना थम गया... हृदय के तारों को झंकृत करता एक नाद तिरोहित हो गया... पर राग तो कभी मरते नहीं! भाव कभी मरते नहीं ! शरीर के बन्धनों से मुक्त  हो ..अवलंबित रहेगी सदा वह साधना...वह आराधना... किया समर्पित जीवन सारा  तज निज पीड़ा को...  सरगम की संगिनी बन ताज स्वर कोकिला की सुशोभित करती रहीं। कितनों के ह्रदय के बोल छंदों में बांधती रहीं।  है शब्दों की श्रद्धांजलि उनको जो खुद भी जीती रहीं  जीने की चाह जगाती रहीं। तज निज पीड़ा को  बस सुरों को साधते रहीं।         ✍डॉ पल्लवीकुमारी"पाम