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"भेदभाव"

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चला इस समाज ने  हमेशा दोहरा ही दाँव, बदलकर रख दिया सम्पूर्ण मानव स्वभाव, जब जबाब माँगा किसी ने तो मुस्कुराकर कर दिया भेदभाव.....। असमानता ऐसी जिसकी कोई तुक नहीं है, बराबरी ऐसी जो किसी के बस की नहीं है, तुलना ऐसी जो सम्भव बिल्कुल भी नहीं है, छिन ली बिन कारण सर से छाँव, जब जबाब माँगा किसी ने तो मुस्कुराकर कर दिया भेदभाव.....। अंतर फिर ईश्वर में हुआ, फर्क फिर आस्था में जगा, बिछोह फिर मन में पनपा, और हो गये हृदय पर गहरे घाव जब जबाब माँगा किसी ने तो मुस्कुराकर कर दिया भेदभाव.....। लिंग में समानता न रखी, सदियों से उम्मीदें दबाये रखी, कायरता अपनी छिपाये रखी, आज हो रहा स्वतः बेहतरी का चुनाव जब जबाब माँगा किसी ने तो मुस्कुराकर कर दिया भेदभाव.....। जाति को पूछकर लिख लिया, मस्तिष्क को अपने समझा लिया, बिन कारण अलग खुद को कर लिया, जरूरत पड़ी तो दिया फलाने को भाव जब जबाब माँगा किसी ने तो मुस्कुराकर कर दिया भेदभाव.....। निजी विचार🙏 स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

"चल वहाँ जाते हैं"

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चल वहाँ जाते हैं, मन जिधर हो,उधर कुछ वक्त बिताते हैं, भूलते हैं कुछ पल जहाँ को सुकूँ की तलाश में  कहीं घूम आते हैं....। चल वहाँ जाते हैं, बन्धनों का बोझ हल्का हो जहाँ उस गठरी को वहीं छोड़ आते हैं, मैं देख सकूँ तुझमें जग सारा ऐसी किसी जगह पर चल पनाह पाते हैं.....। चल वहाँ जाते हैं बैठ सके कुछ पल साथ में जहाँ अतीत के किस्से नजर आते हैं, मुस्कुरा सकें अपनी गलतियों पर भविष्य का निर्माण  जहां पाते हैं....। चल वहाँ जाते हैं, तू सुन सके हर बो बात जो लब मेरे कह न पाते हैं, स्पर्श ही संकेत की भाषा हो मन जहां कहकहा जाते हैं.....। चल वहाँ जाते हैं, सफर में मोहोब्बत या मोहोब्बती सफर जहां पाते हैं, भागते पीछे उस पर्यावरण में चल फिर से खो जाते हैं....। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

तूफान जो उठा

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तूफान जो उठा तिश्नगी का जिन्दगी के मायने बदल गये, चिन्ता जो हुयी भविष्य की जीने के तरीके बदल गये, आँखें जो दूरदर्शी हुयी हमसफर हौले से बदल गये, लगा जिसको भी अब ये न रूकेगा अचानक उसके विचार बदल गये, स्वीकार न सके लोग अलगाव को कहते रहे,इसके तो तराने बदल गये, कर भरोसा वो लगा रहा खुद पर जग में जाने कितने जिगरी बदल गये, हुआ असफल और गिरा भी बहुत जमाने के तो जैसे अरमाँ सफल भये, उठा, और शक्ति इकट्ठा की नकारात्मक विचार खुद निकल गये, इस बार जो तबियत से मारा तीर सफलता के पैमाने बदल गये, लहरा चुका था वो परचम अपना लोग भी फिर हौले से बदल गये, विश्वास हमें भी इस पर खूब था कहते हुये, उसी में आकर मिल गये, ये उगते सूरज की सलामी का है जग अंधेरी रातों की मेहनत सब भूल गये, स्वीकारते हैं हौले से सब चमक उसकी जो हालातों से लड़कर,उनकों बदल गये....। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

अकेलापन

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अकेलापन वही है, जब कोई नजर ना आये, अकेलापन वही है, जब हर नजारा सूना हो जाये, है अकेलापन वो भी जब बहुत दूर साथ चलने के बाद अकेले लौटना पड़ जाये, है अकेलापन वो भी जब बहुत से लोग घेरे हो, फिर हौले से सब गायब हो जायें, है अकेलापन वो भी जब स्वावलंबन के नाम पर आपको तन्हा छोड़ दिया जाये, अकेलापन वो भी है जब आपकी मजबूती के आधार पर आपकी चिन्ता ही न की जाये, अकेलापन वो भी है  जब जरूरत से ज्यादा आपको समझदार, समझ लिया जाये, है अकेलापन वो निश्चित ही जब आपको तन्हा कर दिया जाये, है अकेलापन वो भी जब आपके दुख अपनों को बस नाटक नजर आयें, अकेलापन वो भी है जब विश्वास करो बहुत किसी पर और वो खंजर घौंप जाये, अकेलापन वो भी है जब आपकी तरक्की के नाम पर कोई आप पर जिम्मेदारी सौंप जाये, अकेलापन वो ही है जब मस्तिष्क से तन तक की गतिविधियाँ खुद महसूस की जायें, अकेलापन वो ही है जब आपकी खोखली हंसी में उदासी साफ नजर आये ....। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

किस्मत की किताब

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होती जो हर किसी के पास अपनी किस्मत की किताब, बदल लेते हालातों को अपने सब सोचिये फिर क्या होता जनाब...? मेहनत जैसा कोई शब्द न होता, लगन का पौधा कोई न बोता, निश्चिंत हो हर आदमी सोता, किसी का भविष्य न होता खराब बदल लेते हालातों को अपने सब सोचिये फिर क्या होता जनाब...? चिन्ता किसी बात की होती नहीं, ख्याति में कमी किसी की होती नहीं, नौकरी की जरूरत कभी होती नहीं, मनमाफिक पाते सूकून की छाँव  बदल लेते हालातों को अपने सब सोचिये फिर क्या होता जनाब...? जो चाहते, वो पा लेते, तरक्की को मोहताज बना लेते, मुट्ठी में जहाँ सारा समां लेते, आसमाँ पर होते फिर अपने पाँव बदल लेते हालातों को अपने सब सोचिये फिर क्या होता जनाब...? सोचिये जरा, क्या ये सही होता? विचारिये, कर्मों का क्या बजूद रहता? ध्यान दीजिये,कुछ भी शाश्वत नहीं रहता समझिये,बिन मेहनत है सब हराम कैसे बदल लेते हालातों को अपने? अजीब ही होता हाल जनाब...। यकीं खुद पर हो,तो किस्मत बनती है किताबें सही पढ़ो,सफलता जरूर मिलती है नींव लगन व धैर्य की कभी नहीं हिलती है बस कठीन परिश्रम का बनाओ स्वभाव बदल जायेंगें हालात एक दिन स्वतः ऐसा ही होता है व...

उस पार के नजारे

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चल रहे झंझावात में सारे, अपनी कश्तियाँ,अपने किनारे, तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं उस पार न जाने क्या हों नजारे....? उठती लहरों को देखते हैं हर नयी दुविधा को हैं स्वीकारे, बढ़ा चुके हैं गति अपनी निकल गये तोड़ अपने दायरे, तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं उस पार न जाने क्या हों नजारे....? उम्मीद का चप्पू चला रहे हैं पाने को आसमाँ से अमन के तारे, है भरोसा की वक्त बदलेगा बढ़ रहे आपस में थाम हाथ सारे, तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं उस पार न जाने क्या हों नजारे....? विश्वास है कि ये डूबेगी नहीं त्याग दिये विचार जिनसे थे हारे, अब चले जिन्दगी का स्वाद लेने बहुत हो गये हमें अनुभव खारे, तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं उस पार न जाने क्या हों नजारे....? नाव हमारी डोलती सी चली मिले आखिर मंजिल पाने के इशारे, बहुत लड़े हम जीने को सतत्  कुछ साथी भी इस युद्ध में गये मारे, फिर भी तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं उस पार न जाने क्या हों नजारे....? स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

बावरी सी वो

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है बावरी सी वो, थोड़ी सी साँवरी सी वो, मेरे लिये तो वो कहानी है मगर है खुद शायरी सी वो, है खुद में ही खुश बहुत हंसी की है छाँव सी वो, मुकम्मल जहाँ है उसका नहीं है मोहताज सी वो, आधुनिक नारी और पूर्णता की है सटीक परिभाषा सी वो, मुश्किलों का सामना करती है तूफानों में कश्ती सी वो, हार ना मान ने देती कभी है सोच सकारात्मक सी वो, इस तेज धूप के शहर में, है गाँव की छाँव सी वो, आसमानों में उड़ानें उसकी है जमीं से जुड़े पाँव सी वो, अपनत्व से ओत-प्रोत हृदय है रिश्ते निभाती डोर सी वो, दिक्कतों के घोर अंधेरों में है उम्मीद की भोर सी वो, व्यवहार में सामान्य है है विचारों में गहरी सी वो, मेरे लिये तो वो कहानी है मगर है खुद शायरी सी वो....। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

भाई दिवस पर विशेष

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        अक्सर भाईयों के बारे में बहनें लिखती हैं और बेहतरीन लिखती है। अपने भाईयों के प्यार,त्याग, सुरक्षा के बारे में बहुत कुछ लिख जाती हैं कि हम जब पढ़ते हैं तो हृदय भावविभोर हो उठता है। यही हमारी भारतीय संस्कृति भी है कि दूसरे के त्याग व अपनत्व को हमेशा वरीयता दे और निश्चित ही ये हमारे परिवार के बौध्दिक स्तर की व्यापकता को भी दर्शाता है।        मैं आज राष्ट्रीय भाई दिवस पर अपने भाईयों का जिक्र करना चाहूँगा। आप अगर इसे मेरे भाईयों का महिमा मंडन समझे तो भी समझ सकते हैं क्योंकि भाई मेरे हैं तो मैं तो गुणगान करूँगा ही, इतना तो अधिकार रखता ही हूँ। अपने माँ-बाप की तीन संतानों में हम तीनों ही लड़के हैं,मतलब कोई सगी बहन नहीं है हमारी। बड़े भाईया हमेशा से ही बड़े ही मिले हमें। मतलब 7-8 साल की उम्र में ही वो बड़े हो गये थे। हम दोनों छोटे भाईयों को स्कूल ले जाना,लाना और स्कूल में हमारे लोकल परिवारिजन की भूमिका निभाना ये बड़े भईया ने सहज ही स्वीकार कर लिया था। मेरा मुहँ पकड़कर मेरे बाल काढ़ना, कॉलर के बटन लगाना और स्कूल की पूरी ड्रेस ठीक करना ये सब ...

संगीत मन का

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जो भा जाये वही संगीत मन का, जो दिल गुनगुनाये वही गीत तरन्नुम का, जो आत्मिक शांति दे जाये वही योग जहाँ का, जो आगे बढ़ने से रोके वही रोग मस्तिष्क का, जो अपने धन से हो वही शौक वास्तविक सा, जो खुद उठा सको वही बोझ जीवन का, निभा सको सबसे गर यही मंत्र शिक्षा का, बनाकर चल सको  वही मुकाम इच्छा का, सफल होना न होना है परिणाम मेहनत का, कोशिश भी न करना ये हारना है चित्त का, निभाये चलो बस अपनों से यही रास्ता है रीत का, बनाये रहो मोहोब्बत सतत् यही रिश्ता है प्रीत का, जो भा जाये वही संगीत मन का, जो दिल गुनगुना जाये वही गीत तरन्नुम का.....। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा

मुठ्ठी भर प्रकाश

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खुद सोचो की जीवन से क्या चाहिये, सुकूँ का आज या चमकता कल चाहिये, फैसला ये उतना भी मुश्किल नहीं है बस मुट्ठी भर आशा का प्रकाश चाहिये...। सीखने को उदाहरण बहुत हैं, लड़ने को यहाँ रण बहुत हैं, देखो, तुममें कितनी ललक है, उस ललक को थोड़ी सी आग चाहिये फैसला ये उतना भी मुश्किल नहीं है बस मुट्ठी भर आशा का प्रकाश चाहिये...। गिरकर उठोगे तो नायाब बनोगे, कमरबंद विचारों का तब कसोगे, सोच लोगे तो जरूर सफल होगे, राह मंजिल की बस होनी साफ चाहिए फैसला ये उतना भी मुश्किल नहीं है बस मुट्ठी भर आशा का प्रकाश चाहिये...। तसल्ली मन में हो,कर्मों में नहीं, धैर्य सोच में हो,कोशिश में नहीं, प्रयास वास्तविक हो,आभासी नहीं, सोने न दे जो बस ऐसा ख्वाब चाहिए फैसला ये उतना भी मुश्किल नहीं है बस मुट्ठी भर आशा का प्रकाश चाहिये...। ठान लोगे तो चमक जाओगे, बात मान लोगे तो उभर जाओगे, मेहनत स्वीकार लोगे तो बन जाओगे, नसीब पर नहीं,कर्म पर विश्वास चाहिए फैसला ये उतना भी मुश्किल नहीं है बस मुट्ठी भर आशा का प्रकाश चाहिये...। स्वरचित व मौलिक✍ सुमित सिंह पवार "पवार" उत्तर प्रदेश पुलिस आगरा