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"हे भारत के वीर जवान"

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हे ! भारत के वीर जवान, तुझसे है जिंदा यह हिंदुस्तान पिता तेरा यह खुला आकाश, सरहद की भूमि तेरी मात समान। हे ! भारत के वीर जवान। तेरी रग-रग में बहता लहू दर्प का, ह्रदय तेरा राष्ट्रप्रेम से है भरा, माथे पर चमक रहा सूर्य शौर्य का, भुजाओं में अदम्य साहस है भरा, किन शब्दों से करूं तेरा गुणगान। हे ! भारत के वीर जवान। वंदे मातरम् स्वर के गर्जन से, देश के हर दुश्मन थर्राते, नमन करता उस माटी को माथा, तेरे कदम जहां-जहां तक जाते, तू ही इस मातृभूमि की शान। हे ! भारत के वीर जवान। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"हे! देश के अग्निवीरों"

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कहां जा रहे हो, हे देश के अग्निवीरों, तनिक ठहरो! और झांकों अपने अंतर्मन में, तुम्हीं हो शक्ति पुंज, इस राष्ट्र के निर्माण के, फिर क्यों भटक रहे हो, पतित गलियों में। यह देश देख रहा है अब तुम्हारी तरफ, तुम ही बनोगे आजाद, शेखर और भगत, जागो, आगे बढ़ो, बनो देश का संबल, फिर क्यों सो रहे हो, अब तक चिरनिद्रा में। देश के निर्माता हो, विनाश तेरा कार्य नहीं, मातृभूमि का गौरव बनो, राह भूला राही नहीं, राम, कृष्ण, बुद्ध की भूमि के हे वीर सपूतों, फिर क्यों भूल रहे हो खुद को पहचानने में। तुम चाहो तो मोड़ दो धारा नदी का, लड़ो आलस दंभ से विवेकानंद हो इस सदी का, हां, तुम कर सकते हो भारत का नवनिर्माण, फिर क्यों उलझ रहे हो, व्यर्थ की बातों में। उखाड़ फेंको उस चौसर को,  जो भविष्य दांव पर लगाती है, रुख मोड़ दो उस हवा का, जो साथ बहा ले जाती है, सही दिशा दो उर्जा को, कि फैले चहूं ओर सुरभि, फिर क्यूं जला रहे हो खुद को, अंगार लिये हाथों में। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"वनों की पुकार"

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जिसकी छाया में तू है खड़ा, उसी पर ऐसा कठोर प्रहार, मत काट मुझे ऐ निष्ठुर प्राणी, मैं हूं तेरे जीवन का आधार। रेगिस्तान बन जाएगी यह धरा, पानी के लिए मचेगी हाहाकार, मत काट मुझे ऐ निष्ठुर प्राणी, मैं हूं तेरे जीवन का आधार। प्राणवायु मुझसे हीं हो पाते, मेरे बिना नहीं ये जीवन संसार, मत काट मुझे ऐ निष्ठुर प्राणी, मैं हूं तेरे जीवन का आधार। मेरी गोद में पल रहे हैं वन्य प्राणी, मत छीन उनसे उनका घर-बार, मत काट मुझे ऐ निष्ठुर प्राणी, मैं हूं तेरे जीवन का आधार। ईश्वर ने भेजा मुझे धरती पर, तेरे लिए बनाकर सुंदर उपहार, मत काट मुझे ऐ निष्ठुर प्राणी, मैं हूं तेरे जीवन का आधार। रंजना लता (ए.एन.एम) समस्तीपुर, बिहार

"तेरे जाने के बाद"

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फिर से वही सर्द तन्हाई, फिर से वही बरसात है, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। फिर से वही पतझड़ के दिन, फिर वही भींगी सी रात है, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। फिर से वही तारों का गिनना, फिर वही चांद से मुलाकात है, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। फिर से मेरी सांसों का थमना, फिर वही अनजानी आहट है, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। फिर से दिल में हूक सी उठना, फिर वही अधरों पर सवालात हैं, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। फिर से खाली शाम का आना, फिर वही सुबह के हालात हैं, जो तेरे आने से पहले था, अब तेरे जाने के बाद है। रंजना लता समस्तीपुर बिहार

"शहर"

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शोर में भी मौन यह शहर, अपनों में अजनबी यह शहर, रोशनी से चौंधिया देती आंखें, मन के अंधेरों से घिरा यह शहर। किसी रिश्तों में मिठास नहीं है, अपनेपन का एहसास नहीं है, मेले में ढूंढ रहा हर कोई अपना, भीड़ में भी तन्हा यह शहर। बढ़ रही दूरियां, छूट रहे अपने, सब लगे हैं पूरा करने में सपने, नहीं किसी को किसी की परवा, अपनों में ढूंढे अपना यह शहर। क‌ईं मुखौटे अपने चेहरे पर लगाएं, खुद से ही अपनी पहचान छुपाए, तलाश रहा मन का कोई कोना, क्षण भर ठहरे भागता यह शहर। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"बुजुर्ग"

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आंधी-तूफानों से लड़ना सिखाते, हर मुश्किल में जो साथ निभाते, सौभाग्यशाली वह जिसने है पाया, हर मुश्किल में मिलती बड़ों की छाया। धैर्य की प्रतिमा, अनुभव की खान, देते सदा खुश रहने का वरदान, जड़ बिन तरु कहां ऊंचाई को पाया, हर मुश्किल में मिलती बड़ों की छाया। मत करो अपमान दो उन्हें सम्मान, देवतुल्य उनके चरण जिसमें चारों धाम, उनसे ही तुमने यह जीवन है पाया, हर मुश्किल में मिलती बड़ों की छाया। रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"बीता हुआ कल"

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जगी-जगी सी आंखों में, सजते हैं खूबसूरत लम्हें, कभी गुजरे हुए पल के, कभी आने वाले कल के। इस भागती-दौड़ती जिंदगी से, ठहरने को जी करता है, चलूं बचपन की गलियों में, जहां निश्छल हंसी बसता है, मां के गले में बाहें डाल, झूलूं झूला सब भूल के, कभी गुजरे हुए पल के, कभी आने वाले कल के। जगी-जगी सी आंखों में, सजते हैं खूबसूरत लम्हें। म‌असलों को ताक पर रखकर, अल्हड़ बचपन को जी लूं मैं, सखियों संग मस्ती में घूमूं, नीले आसमां को छू लूं मैं, कर लूं थोड़ी सी शैतानी, आंगन में अपने बाबुल के, कभी गुजरे हुए पल के, कभी आने वाले कल के। जगी-जगी सी आंखों में, सजते हैं खूबसूरत लम्हें। आने वाले कल की फ़िक्र में, खूबसूरत लम्हें बस छूटते हैं, चलो अपने हर पल को, खूबसूरत लम्हों से जोड़ते हैं, खुशी नहीं बिन गम के मिलती, फूल नहीं बिन शूल के, कभी गुजरे हुए पल के, कभी आने वाले कल के। जगी-जगी सी आंखों में, सजते हैं खूबसूरत लम्हें। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"बेरोजगारी"

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पूछो ना उनसे हाल जीवन का, जिनके पास कोई रोजगार नहीं, मारे-मारे फिरते हैं सड़कों पर, घर में भी उनका सम्मान नहीं। रहते हैं सदा वो बुझे-बुझे से, जीवन को बस कंधों पर ढोते हैं, दिन और रात उनके लिए बराबर, पर, सबसे छुप कर वो रोते हैं, मन की व्यथा कहें तो किससे, इस भीड़ में भी कोई अपना नहीं, पूछो ना उनसे हाल जीवन का, जिनके पास कोई रोजगार नहीं। मन की लालसा मन में ही दबाए, कुत्सित विचारों से घिरने लगते हैं, कुंठा हताशा और निराशाओं के, जटिल चक्रव्यूह में फंसने लगते हैं, फिर चलने लगते हैं उस पथ पर, जिस पथ की कोई दिशा नहीं, पूछो ना उनसे हाल जीवन का, जिनके पास कोई रोजगार नहीं। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"अभिमान"

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कुरुक्षेत्र बना यह ह्रदय-स्थल, हार-जीत का परिणाम लिए, धर्म का ध्वज लिए खड़ा युधिष्ठिर, दुर्योधन खड़ा अभिमान लिए। हृदय-स्थल के इस कुरुक्षेत्र में, दोनों ही योद्धा बड़े बलवान, आत्मा चुनती सत्य का पथ, चंचल मन भागे गुमान लिए। मन जानता है जीत होगी उसी की, जिस ओर है कृष्ण का वरदान हाथ, लालसा के चक्रव्यूह में फंसा ये मन, चल पड़ा अधर्म को साथ लिए। क्या नहीं जानता यह मानव मन, है अधर्म, अनीति पतन की राह, बढा जा रहा है फिर भी निरंतर, सुख की खोज में अनंत चाह लिए। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"बाबुल का आंगन"

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मैं बाबुल के बगिया की कली हूं, हंसते मुस्कुराते अभी आधी खिली हूं, न दुनिया का गम न रिश्तों का झमेला, अपनी हीं धुन में गुनगुनाती अलबेली हूं। यह धरती भी मेरी अंबर भी है मेरा, आसमान को मुट्ठी में लिए फिरती हूं, महकाती रहती हूं बगिया को खुशबू से, पैरों में खुशी के घुंघरू बांधे चली हूं। उषा की किरणें जब नहाती हैं तन को, मां की मखमली आंचल को ढूंढती हूं, गोधूलि की बेला में अलसाई सुमन सी, सपनों की गोद में सोने को मचली हूं। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"भागती हुई जिंदगी"

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इस भागती हुई जिंदगी से, कुछ वक्त चुराया जाए, बुझती हुई आंखों में, एक दीप जलाया जाए। कहने को जब अपने हैं,अपनों की तरह मिला जाए, औरों को अपना बनाए,खुद को अपना बनाया जाए है दो दिन की ये जिंदगी, हंसकर तो गुजारा जाए, छोड़कर कल की फिक्र,  बस आज में जिया जाए। सुना रहा हर कोई अपना, औरों की भी सुना जाए, किसी मुरझाए चेहरे पर, एक हंसी तो लाया जाए। हर दिन भले हो अपना, एक शाम ऐसा भी जाए, किसी कांपते हाथों को, अपने हाथों से थामा जाए। इंसानियत ही एक मजहब, इस मजहब को अपनाया जाए, किसी आंखो के मोती को,  अपने हाथों से चुना जाए। हर रात हो जैसे दिवाली, हर दिन ईद जैसे आए, दीप जले हर आंगन में, सबको गले लगाया जाए। है 'लता' की यही ख्वाहिश,  नफरत को मिटाया जाए, अमन-शांति के फूल खिले, प्रेम का बगिया सजाया जाए। स्वरचित मौलिक रचना, रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"प्यारी मां"

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सर्दी की धूप, गर्मी में शीतल छांव है मां, हरी-भरी खेतों सी, एक सुंदर सा गांव है मां। दिल का सुकून, रातों की गहरी नींद है मां, कांधे की थपकी, आंखों के नमी की आंचल है मां। रसोई की सुगंध, गमले में लगी तुलसी है मां, घर की आभा, आंगन में जलता दीपक है मां। कंगन की खनक, नूपुर का बजता रुनझुन है मां, साड़ी का सितारा, माथे पर सजी सुर्ख बिंदी है मां। आंचल में बंधा चावल, चुपके से दी गई सौगात है मां, पैरों की अलता,  स्नेहालेप, प्रेमालिंगन है मां। पीहर की पगडंडी, चौखट पर सजी रंगोली है मां, मां ही तो पीहर, द्वार पर टकटकी बांधे प्रतीक्षा है मां। विधाता का उपहार, इस जीवन का आधार है मां, जिंदा है बचपन, जिस किसी के भी पास है मां। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"परिंदों की प्यास"

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गर्मी पड़ रही, प्यास बढ़ रही, चलो हम कुछ काम कर आएं, परिंदे खोज रहे हैं पानी, थोड़ा सा जल हम उन्हें पिलाएं। रख कटोरे में दाना और पानी, आंगन के मुंडेर पर रख आएं, वो भी जीव हैं हमारी तरह ही, उनकी आत्मा की प्यास बुझाएं। थोड़ा सा समय, थोड़ा सा स्नेह, उनके प्रति भी दिल में जगाएं, वो भी हिस्सा हैं इस धरती का, चलो उनके जीवन को बचाएं। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"मैं मजदूर हूं"

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मैं भी विधाता की रची तस्वीर हूं तेरी तरह, सींचकर पसीने से ईंट को, दीवारें बनाता हूं, पर खेल तो देखिए, हमारी भी किस्मत का, दो घड़ी भी घर में आराम कहां पाता हूं। तोड़ता हूं पत्थड़, भव्य मंदिर निर्माण के लिए, पर ईश्वर की कृपादृष्टि से वंचित रह जाता हूं, मेरे जीवन में नहीं, भौतिक सुखों का आडंबर, जीवन के चुनौती को, स्वीकार कर जाता हूं। मैं खेतों से लेकर, हर कारखानों तक, अप्रत्यक्ष अपना अस्तित्व छोड़ आता हूं, परवाह नहीं करता खुरदुरे हाथ, नंगे पैरों की, तुम्हें काँटा न चुभे, इसलिए पथ को सजाता हूँ। कम पढ़ा-लिखा, पर दूर हूं छल-प्रपंच से, छोटे से घर में, हर रिश्तों को समेटे रखता हूं, युगों-युगों से निर्माण और विकास का साक्षी हूँ,  फिर क्यों मजदूर कहलाता हूँ। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"कलयुग"

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कैसा यह कलयुग है आया, सबके मन को है भरमाया, सोफा पर श्वान को बैठाए, मानव दर-दर ठोकर खाया। कैसा यह कलयुग है आया। पहले पति ही थे परमेश्वर, अस्तित्व उनका खतरे में आया, बाहर तो करे रोटी का जुगाड़, घर का भी भार उठाया। कैसा यह कलयुग है आया। भौतिकता सर चढ़कर बोले, कोई किसी को समझ न पाया, भूले सब रिश्तों की गरिमा, बस एक-दूजे पर आरोप लगाया। कैसा यह कलयुग है आया।

"मतदान"

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हे मतदाता जानो अपना अधिकार, अपने विवेक से ही चुनना सरकार, झांसे में मत आना, लोभ में मत पड़ना, देना मत उसको, जो सुने तेरी पुकार। तेरे लिए है लोकतंत्र, करना इसका सम्मान, सही नेता को चुनकर बढ़ाना भारत की शान, तुम्हारे ही हाथों में, है भारत का भविष्य, अब तेरी बारी है, ले भारत को संवार। उसको ही देना मत, जो देशभक्त सच्चा हो, जन-जन की पीड़ा सुने, जो वादों का पक्का हो, चुनाव एक उत्सव है मनाओ सोच-समझकर, स्वार्थ से परे रहकर, बनो इसका भागीदार। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"स्वर्ग-नरक"

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स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है, यहीं है सब जीवन के रंग, सुख में जीवन स्वर्ग सा लगे, नर्क लगे जब दुख हो संग। है खटखटा रहा नर्क का द्वार, मानव स्वयं अपने कुकृत्यों से, त्याग रहा मात-पिता की छाया, यह देखकर विधाता भी है दंग। दौड़ रहा मानव उस पथ पर, जिस पथ की कोई मंजिल नहीं, छोड़ दी सुननी मन की आवाज़, खुद के संग लड़ रहा है जंग। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

"साहस"

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हार को जीत में बदलता है साहस, आसमां में भी सुराख करता है साहस, सीख चींटी से पर्वत उठाने की कला, तूफानों में दरिया पार कराता है साहस। मुश्किलें तो हिस्सा है इस जिंदगी का, पर मुश्किलों से लड़ना सिखाता है साहस, जीवन के कठिन से कठिन दौर में भी, मुस्कुराहटों के साथ जीना सिखाता है साहस। स्वरचित रचना समस्तीपुर, बिहार

"नवरात्रि"

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मांण दुर्गा के नौ रूप हैं,  नौ रूपों की महिमा अपनी, इच्छित वर है देने वाली,  दुष्ट, पापियों की है विनाशिनी। प्रथम रूप है शैलपुत्री,  पर्वतराज हिमालय घर जन्मी, बनी आभा मां के आंचल की,  गौरव बन पिता का मस्तक दमकी। ब्रह्मचारिणी दूसरा रूप है मां का,  शिव पाने को भीष्म तप किया, किया विवश शिव के ब्रह्मचर्य को,  हर विघ्न सहर्ष स्वीकार किया। अर्ध चंद्र मस्तक पर धारे,  तीसरा रूप चंद्रघंटा कहलाई, दश हस्त शस्त्रों से सुसज्जित,   कनक के समान वर्ण है पाई। इषत् हास्य से ब्रह्मांड रचने वाली,  कूष्माण्डा चौथा रूप है मां का, भानू सम कांति काया की,  सिंह है वाहन इस देवी का। स्कंदमाता देवी का पांचवा रूप,  कमल-आसन पर है विराजती, काली को बनाया कवि-शिरोमणि,  भक्तों का जीवन है संवारती। महर्षि कात्यायन की पुत्री,  कात्यायनी मां का छठा रूप, ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी,   इनकी छटा सुंदर, अद्भुत,  अनूप। सातवीं शक्ति कालरात्रि रूप में,  दानव कांपते नाम से जिनके, त्रिनेत्र धारणी, गर्दभ वाहिनी,   रात्रि समान वर्ण हैं इनके। चंद्र सम...

खिलौना

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आदमी खिलौना वक्त के हाथों का, कभी हंसता तो कभी रोता है, जिस ओर भी ले चले पवन, उस ओर ही बह जाता है। विधाता ने जो पटकथा है लिखी, कहां कोई उससे बच पाता है, रोकर जियो या हंसकर जियो, जीना तो सभी को पड़ता है। कभी आंधी, कभी तूफानों से, कभी बगिया से गुजरना पड़ता है, रास्ते भले हों अलग-अलग, मंजिल सबका एक हो जाता है। छोड़ो अहंकार, घृणा में जीना, यह कुछ नहीं दे पाता है, मिलकर जी लो साथ सभी के, कुछ नहीं तो सुकून दे जाता है। स्वरचित रचना समस्तीपुर, बिहार