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ज़हरीला पानी

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जहरीला पानी कहें शराब कहें कड़वी चाय कहें या फिर  कुछ और क्या पता कितने  नाम है इसके । सबने अपने -अपने हिसाब से इसका नामकरण कर रखा हैं । पर क्या फर्क पड़ता है इससे काम तो एक ही है इसका..... जिंदगी का खात्मा । पीने वालों की भी और उसके आसपास रहने वाले लोगों की भी  । कहने को हर रोज इस पर बैन लगता है पर फिर भी मिलता हर जगह हैं । और पीने वालों का तर्क- हमने ही तो देश को  चला रखा है । आखिर हमारे पीने से ही तो अर्थव्यवस्था व्यवस्थित रहती है । सरकार और पीने वाले दोनों को ही  आखिर क्यूं नहीं  समझ आती ये बात ..... क्या फायदा ऐसी आमदनी, अर्थव्यवस्था का जो किसी के घर की नींव पर खड़ी हो । जो बचपन और इंसानियत के टुक्ड़े कर दे....... यहीं है  जहरीला पानी । मुकेश दुहन" मुकू" सोनीपत हरियाणा

सुहानी शाम

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दिल ही जानता हैं बस ये कितनी दुवाओं के बाद मिली हैं जिंदगी को ये एक सुहानी शाम...... जिस शाम को हुआ पूरा सदियों का इंतजार...। मिल बैठे हैं दो दिल थाम कर एक -दूजे का हाथ किया है वादा निभाएंगे हर पल साथ राह कैसी भी हो हमदम चलेंगे हम साथ-साथ कोई लाख जतन करलें जुदा न होगे  अब हाथ ........ मुकेश दुहन "मुकू" सोनीपत हरियाणा

बंधन ----साथी

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ओ साथी ....... ये तेरे प्यार का बंधन...... जो ना किसी डोर से बंधा बंधा हैं तो बस प्यार भरे विश्वास से....... ओ साथी... तेरा ये बंधन रोकता है मुझको तुझसे दूर जाने के ख्याल से...... ओ साथी..... तेरा ये बंधन कभी मन करता है तुझे बताऊं कि मैं क्या सोचता हूँ.... क्या चाहता हूँ.... पर ओ साथी फिर रोक लेता है तेरा ये बंधन..... कहता है प्यार तो यही है कि  मैं कुछ न कहूं कुछ न चाहूं तुम हो न...... तुम हो न,,,, और बस तुम हो न ..... और तुम्हारा ये बंधन ।।।।।।।।।।।।। मुकेश दुहन "मुकू" सोनीपत, हरियाणा

सर्द भरी काली रात

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कुछ बीत गई और  कुछ बीतने वाली हैं ये काली सर्द भरी रातें........ घर में रहने और सोने वालों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता  रातों के गर्म या सर्द होने का..... ये तो सिर्फ वही जानता है.... जिसके सिर पर छत नहीं जो बिना कपड़ों के फुटपाथ पर सोता है नंगे बदन नंगे पांव रहता है उन्हें नसीब नहीं होती गरमा गरम चाय ना अंगीठी की आग ये सर्द भरी काली रात न जानें कितनों को लील लेती हैं खुद में..... मुकेश दुहन" मुकू" सोनीपत हरियाणा

बहादुरी

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बहादुरी हमको  अब दिखानी होगी, अपनी अस्मिता खुद ही अब बचानी होगी ‌‌, आखिर कब तक तलाश करेंगे सहारे बहादुर हैं हम ये बात सबको समझानी होगी । नारी है हम ,हम हैं शक्ति का आधार, सजा है हमसे ही दुनियां का हर आंगन और द्वार, आखिर कब तक खुद को कम आंकोगी जब हमारी ही माया है ये सारा संसार । नहीं बनना हैं मुझको अहिल्या, नहीं सीता सा त्याग हैं मुझमें, बन कर रहना हैं अब इस जग का हिस्सा बेशक प्रेम का एहसास है मुझमें । क्यूं हूं जाते हो तुम मेरा इतिहास, रानी पद्मावती, लक्ष्मीबाई,नीरजा हूं मैं ,मैं ही चीनूबाई देना होगा जवाब अब तुमकों ए दुनियां के ठेकेदारों दूध पर आंच जो अबकी जरा सी भी आईं । मुकेश दुहन" मुकू"

नवरात्रि -सांझी माता

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नवरात्रि...... नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न रूपों में पूजन ‌‌। हमारे भारत देश के हर क्षेत्र में नवरात्रि का त्योहार अलग-अलग तरह से मनाया जाता हैं । हर क्षेत्र हर जगह की अपनी अलग परंपराएं हैं । कहीं माता का शक्ति के रूप में पूजन होता हैं,कहीं गरबा और कहीं डांडिया नृत्य किया जाता हैं ।   हमारे हरियाणा में बिल्कुल इस त्योहार को अलग तरीके से मनाया जाता हैं हालांकि आजकल लोग अपने घरों के मंदिर में ही कलश और देवी की स्थापना करते हैं और नौ दिनों तक विधिवत् पूजा अर्चना करते हैं ।  अलग तरीके की बात करें तो आज भी कई जगहों पर माता की सांझी  माता के रूप में पूजा जाता है  और इसकी तैयारियां महीनों पहले ही शुरू हो जाती हैं । सबसे पहले चिकनी मिट्टी लाई जाती हैं , मिट्टी को छानकर उसे गूंथ लिया जाता हैं और इसके बाद बनाएं जाते माता के कपड़े और साजों श्रृंगार का सारा सामान ..... लहंगा चोली, चूड़ियां, कंगना,झुमकी बाली, झांझन पायल,कड़ी छड़कले,नेवरी और अन्य आभूषण । फिर इन सब चीजों को कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता हैं । इसके बाद रंग से रंगा जाता हैं  । नवरात्रि के पहले दि...

कौन है वो

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रहता है जो हरपल साथ, थाम रखा है हाथों में हाथ, हैं वो जाना पहचाना सा अब तुम्हीं बताओं  कौन है वो ? तिनके तिनके में भार है जिसका, ये सारा संसार है जिसका, हैं वो सबका अपना सा अब तुम्हीं बताओं कौन हैं वो ? हंसता है फूलों में छुपकर, देखता हैं सबको अंदर रहकर हैं वो प्राणों में श्वास सा अब तुम्हीं बताओं कौन हैं वो ? मुकेश दुहन" मुकू" सोनीपत हरियाणा

भक्ति

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तू जो कर दे इशारा मेरे कान्हा तेरे रंग में रंग जाऊं मैं, बंद कर लूं आंखें सदा के लिए तेरी भक्ति में रम जाऊं मैं । माखन संग चुराऊं तेरे ग्वाला भी बन जाऊं मैं, बांध लें अपने बंधन में मुझको तुझ संग गईयां फिर चराऊं मैं । प्यार करूं मनुहार करूं तेरी राधा सी बन जाऊं मैं, जमुना तट राह तकू मैं तेरी तेरी मुरली फिर बन जाऊं मैं । तू जो कर दे इशारा मेरे कान्हा तेरे रंग में रंग जाऊं मैं, बंद कर लूं आंखें सदा के लिए तेरी भक्ति में रम जाऊं मैं । भजन करूं ध्यान धरूं तेरी मीरा सी बन जाऊं मैं, धारण कर फिर विष का प्याला किसी को नजर न आऊं मैं । भक्ति करूं वि धरूं तेरा सुदामा सा बन जाऊं मैं आंखें बंद कर जब ख्वाब बुनूं बस तुझको ही पाऊं मैं । तू जो कर दे इशारा मेरे कान्हा तेरे रंग में रंग जाऊं मैं, बंद कर लूं आंखें सदा के लिए तेरी भक्ति में रम जाऊं मैं । तू ही खिवैया रास रचईयां इस भंवर से तर जाऊं मैं, सिर सजू तेरे मैं मोर पंख सी हर छांव धूप संग तूझे ही पाऊं मैं । कान्हा कान्हा मेरे कान्हा  सबको ही ये बतलाऊं मैं, कोई भी पूछे जब नाम तेरा बस गीत यही दोहराऊं मैं । तू जो कर दे इशारा मेरे कान्हा तेरे र...

मईयां तेरे द्वार

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मईयां तेरे द्वार, आज खड़ा सारा संसार । खुद में क्यूं नहीं झांकता, तेरा इंसान बस एक बार । बस अब कुछ दिनों तक ही सब कोई तुमको पूजेंगे, हर बेटी हर औरत में सब तुमको ही देखेंगे । मूर्तियां तेरी मिलेगी फिर कूड़ेदान में, देख कर बहू बेटियों को फिर आंखों आंखों में ही नोचेंगे । मां इन नौ दिनों के बाद तुम भी बदल जाओगी क्या, मौन होकर देखोगी सबकुछ फिर अस्त्र शस्त्र नहीं उठाएंगी क्या । तुम तो मां ,मां हो इस जग की तुम तो सबकुछ जानती हो, किसके वेश में कौन छुपा हैं तुम सबको पहचानती हो । हे मां जगदम्बा..... हे मां काली..... नजर बस  तुम बनाएं रखना, छूने ना पाएं अबसे  मां, बहनों का आंचल कोई बस इंसानियत को तुम बचाएं रखना ‌‌ मुकेश दुहन" मुकू" (आप सभी को शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं)

पढ़ा -लिखा बेरोजगार

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आज का सच..... आज के युवा पढ़ें-लिखे बेरोजगार पढ़ लिख तो बहुत लिया पर कोई कौशल नहीं आता पढ़ाई की एवज में सभी को नौकरी मिलती नहीं हैं आजकल और कोई काम करके खुश नहीं है आज का युवा नौकरी होतो बड़े ओहदों वाली छोटी मोटी नहीं ये नौकरी करेगें हम  जुबां पर यही बात फिर  बड़ी मिलती नहीं छोटी करते नहीं तो और क्या करे घूमते फिर रहे है  पढ़े लिखे बेरोजगार..... आज की पीढ़ी.... मुकेश दुहन "मुकू"

अधूरी प्रेम कहानी

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क्या लिखूं मैं वो अनजानी अधूरी कहानी ,  दो दिलो में सिमटी वो प्रेम कहानी । बेखबर बेपरवाह बीते वो पल , कब सिमट गयी वो उसमे उन लम्हों कि रवानी । वो भी क्या दिन था जिस दिन मिला था मैं उस अनजानी से, छिपकर तकती वो कहती नजरे , आस पास रहकर सब कुछ  समेटती वो नजरे । गुम होते वो पल ,बढते वो अरमान , नया जीवन जीने को वो चढ़ते परवान । वो भी तो थे बिल्कुल  अनजान , हँसते थे मिलते थे करते थे वो बातें तमाम । मिलते ही खो जाते,  शायद  कभी न पुरे होने वाले सपनो में । पर घूमा जब वो समय का पहिया , कर कुछ न सके , हुए मजबूर हर किसी के लिये, छोड़ दिए वो  सपने तमाम । थे मजबूर वो एक दूसरे की कही बातों से, समझा न सके किसी को वो  अपने दिल के वो जज्बात  । बीतते गये पल ,बन गये वो पल से दिन दिन से महीने और महीनों से बन गये साल । थे मजबूर ,हावी थे हालात , छोड़ सारी मिलने कि आस , चल पड़े थे मिलाने जीवन से ताल । आज भी समझ नही आती ‌  वो अनजानी अधूरी , दो दिलो में सिमटी वो प्रेम कहानी .............. मुकेश दुहन "मुकू"