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बारिश की बूंदे

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बारिश की बूंदे धरती को नहला रहीं प्यासी है धरा उसकी प्यास बुझा रहीं नन्हीं नन्हीं बूंदे कर रहीं अटखेलियां पत्तों पर ठहर कर मोती की मानिंद चमक रहीं स्ट्रीट लाइट की रोशनी में डिस्को सी थिरक रहीं झूम रहे पेड़ पौधे खुशी से मानो कर रहे स्वागत लहराकर मोर नर्तन कर रहे पी यू पीयू बोल रहे पपीहा कोयल मधुर राग गा रही चातक भी प्यास बुझा रहा ओढ़कर धानी चुनर धरा भी शर्मा रही मानो सब मिल स्वागत कर रहे बूंदों का।

बहकते नोनिहाल

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   कैसी विडंबना है ये, क्या हालात हो गए? घर के ही चिराग ही अपने घर को जला रहे भटक गए हैं राह भ्रमित हो गए हैं अपना भला बुरा  नहीं पहचानते  हिंसा, क्रोध  को ही अपना हथियार मानते। कुछ मौका परस्त इनको गुमराह कर रहे आग को भड़काने में घी का काम कर रहे सेंक रहे रोटियां अपनी देश जल रहा है मूक दर्शक बन  सारे देख रहे। हर तरफ उठ रहीं लपटें  विनाश हो रहा बनना था जिनको रक्षक वह भक्षक बन गए हैं थामनी थी जिनको देश के रक्षा की बागड़ोर उनके ही हाथों  देश जल रहा है। किसकी बात सुनेंगे ये, कोन इनको समझाएगा ? कोन मार्गदर्शक बन, सही राह दिखायेगा ? हिमलेश वर्मा आगरा यू पी

छू लो आसमान

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सुनकर अपने मन की  पंख फैलाकर उड़ना है खुले आसमान मे ऊंची उड़ान भरना है परिन्दे को उड़ता देख मन भी चंचल हो गया पर मेरे भी कब खुले आसमान मे उड़ान भरेंगे बहुत रह लिए पिंजरे मे आजादी क्या है भूल गए आसान नही है तोड़ना पिंजरे की इस कैद को उड़ान भरने के लिए   इस  पिंजरे का मोह छोड़ना होगा पड़ी है बेड़ी  रिश्तों की जो उनको तोड़ना ही होगा मन की अपने सुनना नही सुनना जहां की पाने उन मुकामो को जो पीछे छूट गए देखे थे जो सपने वह भी टूट गए उन्ही की खातिर अब होसलो के साथ है उड़ना।।

ग्रहों की चाल

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ग्रहों के चक्कर में जो उलझ गयाb भूल गया राह अपनी मार्ग भटक गया नहीं  बक्शा सत्यवादी राजा हरीश चंद्र कोभी खुद ही सरे राह बिकवा कर दाने दाने को मोहताज बनाया चली जब ग्रहों की उल्टी चाल बनना था राजा जिसेवनवास कराया महलों की रानी को वन वन भटकाया अंत में भी धरती   मां की गोद मेंही स्थान पाया देनी पड़ी अग्नि परीक्षा सतीत्व के प्रमाण में देखा तो था  मिथिला नरेश ने अपनी सुता के लिए  उच्चकुल राज घराना किंतु ग्रहों की चाल ने उसेजंगल में ही  भटकाया।

छोटी सी आशा

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इक छोटी सी आशा जब दिल में जाग जाती उसी के सहारे जीवन  नैया पार लग जाती थाम कर दामन इसका कुछ कर गुजरने की होती चाह मन में यही तो जीने का हौंसला बढ़ाती जब चारों ओर छा जाता गहन अंधकार कोई राह  दिखाई ना देती  मन में घर बना लेती निराशा जीवन से ऊब जाता मन तब छोटी सी एक आशा डूबते को तिनके का सहारा बन दूर कहीं नजर आती वही छोटी सी आशा कुछ कर गुजरने  की प्रेरणा बन जाती जीने की राह है दिखाती।

चौदहवीं का चांद

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ये चौदहवीं का चांद  भी है आफताफ की तरह बहुत अजीज है सबका दिल के बहुत करीब है ना सर पर इसके घूंघट है ना चेहरा ढका है बुर्के से कभी ईद का चांद हो गया कभी करवा चौथ का कभी लग जाता ग्रहण इसको आसमां में छा जाता अंधकार बेकरारी  से करता  चांदनी से मिलनेकाइंतजार होता गर ज़मीं पर तो विवादों से याराना होता अदालतों में पेशी होती अखबारों की सुर्खियां बनता शुक्र है आसमां में है बादलों में आशियाना जिसका इसीलिए महफूज़ है कवियों की कल्पनाओं में।

भेद भाव

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भेद भाव क्यों करते सब बेटे और बेटी में मनाते  बेटे का जन्म दिन बड़ी धूम धाम से बेटी के जन्म पर चेहरे उनके लटक जाते पग पग पर बेटी को ही क्यों करना पड़ता भेद भाव का सामना अपने ही घर में  अपनो के बीच क्यों सहनी पड़ती  उपेक्षा,? क्यों एक एक सांस को संघर्ष उसे करना पड़ता? क्यों बेटे को मिलती दूध मलाई और बेटी को रोटी भी पड़ती मांग ना बात बात पर जताते अहसान क्यों कराते  होअहसास हो तुम पराई बेटे के जन्म पर बंटती मिठाई मानते तारण हार क्यों बेटी को मानते नर्क का द्वार अरे! मान दो उसे उसके हक का सम्मान दो वह भी तुम्हे गोरवान्वित कराएगी झुकने नहीं देगी सर तुम्हारा शान से ऊंचा कराएगी छोड़ दो ऐसी मानसिकता सड़े गले दकियानूसी विचार बेटी को भी दो समान अधिकार।

पर्यावरण दिवस

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पेड़ लगाओ धरा पर हरियाली से श्रंगार करो काट कर पेड़ों को धरती को यूं बंजर न करो मानव तुमने निज स्वार्थ  में हरे भरे पेड़ों को काटा ऊंची ऊंची बिल्डिग खड़ी करने को हरियाली को नष्ट किया वायु प्रदूषण फैला कर पर्यावरण को दूषित कर दिया तपती धूप में जब छांह कोपेड़ तलाशते दूर दूर तक कोई  पेड़ नजर नआते तब अपने किए कृत्य पर तुम जरा  भी ना पछताते जब पेड़ ही नही रहेंगे धरा पर पर्यावरण को केसे बचाओगे आने वाली पीढ़ी को क्या कह कर समझा ओगे।? केसे स्वार्थ के वशीभूत होकर धरती को बंजर किया अपने ही हाथो अपने सर्वनाश को न्योता दिया।

जुगल बंदी सास बहू की

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मां से मायका तो सास से ससुराल बिन सास ससुराल लगता फीका फीका कोन बहु को लाड़ लड़ाए कोन जलाए प्यार सास प्यार दिखाती  गलती पर डांटती भी कोई भी सास नही बनाती लक्ष्य अपना सिर्फ बहु को सताने का ना ही कोई बहु पहले ही सोच लेती घर को बांटने का लड़की को पहले ही सास का डर  दिखाया जाता डर तो सास के भी मन में रहता आने वाली बहु के वास्ते आयेगी तो घर मेरा तोड़ेगी या जोड़ेगी कठिनाई होती दोनो को ही दोनो को ही डर लगता एक को नएघर में जाना  जहां हैं सब दूसरी को एक अनजान  साथ सामंजस्य बिठाना थोड़ी सी समझदारी प्रेम और विश्वास से चलती जुगलबंदी  सास और बहु की सास बहू को सिखाती घर चलाना। स्व रचित

नया अवसर

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मिले जो असफलता जीवन में हार मा न कर रुकना नही चाहिए करो तलाश दूसरे मौके की एक बार हार जाने से जीवन खत्म नहीं हो जाता पहिया जीवन का थम तो नही जाता निराशा को छोड़ कर नए उत्साह के साथ त्तलाश में नए मौके की         जी जान से जुट जाओ कभी न कभी मिलेगा जरूर बस उसे पहचानने को नजर पारखी चाहिए जीवन है अनमोल व्यर्थ ना इसे गवाओं    तलाश कर नया अवसर सफलता की सीढ़ी चढ़ जाओ।

जीवन दायिनी दवाएं

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दवाएं हों कोई सी भी जीवन दान देती हैं मृत्यु के मुंह से वापिस बुला लेती हैं आयुर्वेद हो या एलोपैथी दवा चाहे कोई भी हो कष्ट निवारक होती हैं आयुर्वेद है प्राचीन पद्धति हमारे देश की शान एक से बढ़कर एक  आयुर्वेद आचार्य हुए महान जड़ी बूटियों और लेप से करते रोग का इलाज जड़ से रोग को करते दूर पड़ता नही शरीर पर कोई भी दुष्प्रभाव शने: शने: कटती पीड़ा दवा रोग भगाती शरीर में जाकर  धीरे धीरे अपना प्रभाव दिखाती किंतु असहनीय पीड़ा में एलोपैथी दवाएं ही काम आती भयंकर से भयंकर पीड़ा से तुरंत निजात दिलाती     हिमलेश वर्मा

असंभव

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असंभव कुछ भी नही इस जहां में सभी कुछ संभव है कुछ भी कर गुजरने का जज्बा होना चाहिए मेहनत और लगन हो तो क्या नही हो सकता कर सकते हैंआसमान में छेद भी बस एक पत्थर पूरी कोशिश से उछालना चाहिए पहाड़ों  के बीच भी निकलसकती है राह  बस एक लक्ष्य  निर्धारित होना चाहिए

मेरा शहर

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अब शहर मेरा सूनासूना लगता है मोहब्बत की निशानी है जिसमे दुनिया का आठवां अजूबा जिसकी एक झलक को देखने मेला सा लगता है महा कवि सूर दास  की जन्म स्थली महादेवी वर्मा ,गोपाल दास नीरज जेसेकवि  का शहर बड़ा अनजान बेगाना सा लगता है चारो तरफ ऊंची ऊंची  सीमेंट की बिल्डिग जिनके आगे सब बोने नजरआते हैं अपनी ही धुन में दौड़ते भागते सभी सड़को पर केवल जाम ही जाम लगता है मेट्रो की तैयारी में हर तरफ छाए धूल के अंबार जिससे ढक गया  सारा शहर देश विदेश में यहां के जूतो का है बड़ा नाम चमड़े की कतरनों के लगे यहां वहां ढेर जहां कभी बहती थी यमुना एक पतली सी लकीर दिखाई अब देती है रिश्तों से गायब हो गई मिठास इसीलिए  चाशनी में डूबा पेठा  भी फीका फीका लगता है।

निस्वार्थ सेवा

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निस्वार्थ भाव से सेवा है एक पूजा इससे बढ़कर जहां में नही काम दूजा निस्वार्थ की गई सेवा जरूर रंग लाती है मिलती जो दुआएं वो खाली कभी नहीं जाती हैं।

वृद्धाश्रम

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खुद भूख प्यास सहकर जिन बच्चों का पेट भरते उन्ही बच्चो को माता  पिता बोझ लगते जिनके लालन पालन में अपना जीवन वार दिया दिन रात कुछ नहीं देखा खुशियों को न्योछावर किया उन्ही संतानों की आखों में बन शूल चुभने लगे अपनी आजादी में  राह का कंटक उन्हे मानने लगे प्यार उनका बेड़ी समझते बंधने को कोई तैयार नहीं पाषाण हो गए दिल में प्रेम का कोई भाव नहीं आलीशान बंगलों में उनके जानवर पाते प्यार दुलार वहीं जन्मदाता होते अपनो की उपेक्षा का शिकार उनका दुख खाली पन संतान को नजर आता नही उनका प्यार टोका टाकी किसी को भाता नहीं प्यार देखभाल की चाह उनको ज्यादा कुछ नहीं चाहिए मा न सम्मान के भूखे हैं यह तो मिटनी चाहिए निर्मोही नाशुक्र हो गए दूध का फर्ज भी भूल गए बहला कर छोडा वृद्धा श्रम में जन्म दाता ही बोझ बन गए प्रेम कर्तव्य भूल गए सब संवेदनाओं से नाता तोड़ा भूल गए बूढ़ा पेड़  फल नही तो छांह तो देगा

घर का चिराग

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घर का चिराग ही घर को देता जला बनना था जिसे लाठी वही हाथ लेता छुड़ा सारी उम्मीदों को पल भर में देता तोड़ भेज देता वृद्धाश्रम अपने जीवन दाता को पाते जिसको बहुत मन्नतों के बाद ऐसा कोई मंदिर मस्जिद नही जहां न माथा टिकाते जन्म के समय डॉक्टर देते जवाब नाजुक हालत है एक ही बचेगा जनाब मां चाहिए या फिर घर का चिराग वही चिराग कहता आज अपनी आंखें तरेर कर किया क्या ऐसा तुमने अलग मेरे लिए जो भी किया वह तो तुम्हारा फर्ज था करते सभी अपने बच्चो की खातिर  याद नहीउसे अपना फर्ज भूल गया वो दूध का कर्ज जिसका वो ऋणी है फर्ज क्या वो तो  मानवता भी तो भूल गया जिसने उसके जहांको किया रोशन उन्ही के जीवन को अंधकार मय कर दिया।।

रक्त की बूंद

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रक्त बूंद की है अनमोल कोई लगा नहीं सकता जिसका मोल एक एक बूंद देती जीवन इसकी कीमत वही जानता जो इसकी एक एक बूंद को मौत से जूझ रहा होता अपने रक्त का करके दान व्यक्ति बन जाता दानी महान जरूरत मंद को जीवन देकर बन जाता ईश समान मृतपाय  शरीर में फूंकता जीवन देकर अपना रक्त दान। हिमलेश वर्मा

बाबुल का आंगन

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बहुत याद आता मुझे  बाबुल तेरा आंगन जहां गुजारा मैने अपना अलबेला बचपन    जहांचिड़िया की भांति  ची ची मैं करती तेरे आंगन फुदकती मैं फिरती उसके लिए अब भी तरसता मेरा मन वो नीम का  पेड़ और वो झूला झूली जहां तेरी बांहों में झूला आज भी मेरा मन वहीं पर भटकता रचाते जहां गुड्डे  गुड़िया की शादी जिसमे सारे बच्चे बनते थे बाराती करता मेरा मन फिर से तेरे आंगन में घूमूं एक बार फिर से अपना बचपन  जी लूं।।

भाग दौड़ भरी जिंदगी

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भाग रहा है जीवन हांफ रहा है दो पल का चैन नहीं ना जाने कैसी अंधी दौड़ है सबको पीछे छोड़ देगा आगे आगे दौड़ लेगा जाने कोन सी वो मंजिल है जिसकी उसे तलाश है आपाधापी मची हुई है मशीनीकरण हो गया जीवन का रिश्ते नातों की हुई हत्या संवेदनाएं मर गई है दो पल की फुर्सत नहीं बैठ कर सुस्ता ले कहीं डरता है कही पिछड़ न जाऊं नंबर वन बनना मुझे आगे बढ़ने की चाह में अपनो से मुंह मोड़ लिया सीएम जरूरत पड़ने पर उनको ही  सीढ़ी बना  बढ़ गए।।

कहाँ ढूँढूँ

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एक बेटे का खत माँ के नाम                                कल था तेरी कोख में फिर कलेजे लगा और पका तेरी गोद में बचपन मे दुलारा और प्यार दिया। शादी का मुझे आशीर्वाद दिया। अंतिम समय पर सिर्फ एक बार पूछा।  कहाँ है बेटा। पर तूने न इंतजार किया।  भूल गई तु मुझे बिना मिले चली गई।।  हमने भी तो तुझे मिटाने के लिए। चिता पर लिटा दिया जलाने के लिए।। अस्थियाँ भी विसर्जित कर दीं। और मिटा दिया तेरे निशां को। पर याद आती है तो सोचता हूँ मै। ढूँढूँ कहाँ अब तुमको माँ।।