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मानो या ना मानो

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हम कर बैठे हैं तुमसे प्यार तुम मानो या न मानो मैंने मन से तुमको अपना मान लिया तुम मानो या न मानो हमने तुमको पहचान लिया तुम पहचानो या न पहचानो बसती है तुम में ही जान तुम जानो या ना जानो कैसे तुम्हें बताऊं मैं तुम जान हो मेरी जब देखता हूँ आईना लगता है तुम पहचान हो मेरी मैंने तो तय कर लिया हर हाल मे तुमको पाना है, तुम मानो या न मानो रहना है मुश्किल बहुत बिन तेरे बस जा तू ह्रदय मे मेरे कर सब कुछ दिया तेरे नाम  तुम मानो या न मानो यादें वहुत सताती है, हर पल याद दिलाती है है कोई अपना तेरा खुद को एहसास कराती है मैंने तो अपना लिया तुमको तुम मानो या न मानो धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

तितली

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रंग बिरंगी प्यारी तितली  सबके मन को भाती तितली भिन्न-भिन्न रंगों में लगती,कितनी प्यारी तितली ईश्वर की अद्भुत कृति लोगों को हर्षाती तितली फूलो से है घनी दोस्ती काँटों को भी अपनाती तितली जीवन है सुख दुःख का संगम हम सबको जीना सिखाती तितली निरसता को दूर करो,अपने जीवन मे रंग भरो खुशियों को अपना लो तुम दुःख को खुद से दूर करो तितली के जैसे घूमते रहो मौज मस्ती भरपूर करो खुश रहो हर मुश्किल मे बस यही सीख सिखाती है तितली धन्यवाद सत्येन्द्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

धरती

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माँ शारदा के श्री चरणों  धन्य धरा यह भूमि पावन स्वर्ग से सुंदर अति मनभावन राम कृष्ण गौतम की धरती माँ गंगा नित श्रृंगार है करती धरा है मनोरम अति देख देव भी होते हर्षित अंबर से नित अमृत बरसे जन्म पाने को देव मुनि भी तरसे अनुपम छटा निराली है,  फैली चारों ओर हरियाली है अद्भुत दृश्य मनोरम है दिखती धरा स्वर्ग सम है क्या क्या सहती है धरती एक् सीख देती है हमको धरती सहनशक्ति और धैर्य का पाठ पढ़ाती है धरती त्याग समर्पण का एहसास कराती है धरती धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

तेरे इश्क में

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माँ शारदा के श्री चरणों मे नमन मैं खुद को ही भूला बैठा तेरे इश्क मे एक मजा है एक नशा है तेरे इश्क मे कभी सुबह की सुहानी किरण है इश्क कभी रातो की शीतल चांदनी है इश्क कभी जेठ की तपती लू है इश्क  कभी कार्तिक की कडकडाती ठंड है इश्क कभी सूरज की तेज तपिश है इश्क कभी पत्तों पर चमकती हुई शबनम है इश्क तेरे इश्क ने मुझे दीवाना बना दिया ना जाने मैं कहा खो गया  मुझे खुद से ही बेगाना बना दिया कुछ तो अलग है तेरे मोहब्बत का अंदाज तू शमां हो गई मुझे परवाना बना दिया मेरी जिन्दगी थी सूनी तेरे बिन तेरे आने से मुझे सारा जमाना मिल गया तेरे इश्क से मुझे एक नई जिन्दगी मिल  गई अब क्या कमी है मुझे,मुझे सारे जहाँ की खुशी मिल गई धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

मुक्ति

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करके कुछ कर्म निस्वार्थ भाव से  पा ले प्रभु की भक्ति कट जाएगा भव बंधन सब  मिल जाएगी जन्म-मरण से मुक्ति करता जा सत्कर्म तू सेवा ही बना ले अपना धर्म तू कर दे समर्पित स्वयं को,ईश्वर शरण पा लेगा ईश्वर का मर्म तू इस नश्वर संसार में कोई नहीं है तेरा, जीवन के अंतिम क्षण तक करते हैं सब मेरा-मेरा स्वर्ग यहां नर्क यहां सबकी होनी है दुर्गति मन लगा ईश्वर के भजन  हो जाएगी तेरी मुक्ति सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

दहलीज

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छोड़कर एक घर की दहलीज  दूसरे घर के दहलीज की ओर चली छूट गई उस घर की दहलीज  जहां थी मैं पली-बढ़ी कैसे छोड़ दूं मैं वह दहलीज  जहां जब जी चाहा मेरा, बिना पंख के ही उड़ी आंखों में लेकर आंसू  मन में कुछ कसक लिए  पकड़े अपने पिया का हाथ  मैंने सब से विदा लिए अब शुरू हुई मेरी नई कहानी नए रिश्ते नई जिम्मेदारी ईश्वर को करके प्रणाम मैंने दहलीज पार किया अब दो घरो की इज्ज़त थी मेरे हाथ, डरती थी खुद से कहीं बिगड़े ना कोई बात धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

बिखर रहा परिवार

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आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में, बिना बात के ही बिखर जाते हैं परिवार छोटी-छोटी बातों पर होता रहता है झगड़ा झगड़ा,झगड़ा ना होकर, बन जाता है कानूनी लफड़ा ना जाने कितने वर्षों का साथ  टूट जाता है बस एक ही पल में फिर ना कोई सोचता है आज के बारे में और ना ही सोचता है क्या होगा कल मे ज़िद और झूठे अहंकार के सामने होते हैं बेबस लाचार आखिर भला ऐसे कब तक चलेगा परिवार दोनों के मध्य स्वाभिमान अड़ा है  ना कोई छोटा है ना कोई बड़ा है झुकने में शर्माते हैं बात बात पर एक दूजे को चिल्लाते हैं मौका मिलते ही दोनों एक दूजे को गलत दिखाते हैं आज हर रिश्तो में मची हुई है खींचातानी हर घर की हालत है ऐसी, हर घर की है यही कहानी रिश्ते बचाना मुश्किल है उतना हाथ में लेकर जैसे पानी, झूठ और झूठे वादों की यहां पर भरमार है, तभी तो आज बिखर रहा परिवार है धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

आँगन

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घर की शोभा आँगन से है  घर की सारी खुशियाँ आँगन से है वो आँगन जहाँ हम सबसे पहला कदम चलें वो आँगन जहाँ खुशियों के दीप जले वो आँगन जहाँ हम पले बढ़े वो आँगन जहाँ हमने संस्कार के पाठ पढ़े वो आँगन जहाँ हमको प्यार मिला वो आँगन जहाँ मेरे जैसा रख फूल खिला वो आँगन जहाँ तुलसी की होती पूजा वो आँगन जहाँ से ना जाए कोई भूखा वो आँगन जहाँ अतिथि जैसे थे भगवन वो आँगन जहाँ होता था भजन कीर्तन अब ना घर मे आँगन है ना पहले जैसा अपनापन है धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

मुस्कान

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तुम मेरी पहचान बन जाओ  मेरे अधरों की मुस्कान बन जाओ तुमसे करता हूं मैं प्यार बेपनाह गुजारिश है तुमसे, तुम मेरी जान बन जाओ मन हो उठता है प्रफुल्लित तेरे आने से मुस्कान खुद ही तैरने लगती है  होठों पर बस तेरे खिलखिलाने से तेरी मुस्कुराहट ही वजह है मेरे जीने का देखकर तेरी मुस्कान ना ठिकाना मेरी खुशी का तेरी मुस्कान ही है जो मुझे,मुझसे मिलाती है तेरी मुस्कान ही है जो तेरी याद दिलाती है तेरी मुस्कान मेरे लिए ईश्वर का उपहार है तेरी मुस्कान मेरे लिए हर त्यौहार है तेरे मुस्कान के लिए मैं कुछ भी कर जाऊंगा बेचना पड़े यदि खुद को भी,  सरे बाजार बिक जाऊंगा तेरी मुस्कान ही मेरी मोहब्ब्त है तेरी मुस्कान ही मेरी इबादत है बस यू ही सदा तू मुस्कुराती रहे गीत खुशियों के हरदम तू गाती रहे धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

बचपन

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कितना सुन्दर था बचपन काश लौट आए फिर बचपन दिन भर की धमाल मस्ती, चुपके से खा लेना मिट्टी खेल पुराने बचपन के वो गीत सुहाने बचपन के याद आती है दादी नानी की कहानी कितना मधुर था कुएं का पानी दिन भर बैठना पीपल की छांव मे घूमते थे दिन भर जब हम नांव मे ना दिन की चिंता ना रात की परवाह अति मस्ती आनन्द उछाह ना सपने ना कोई काम खेलो खाओ भरपूर आराम कितना अच्छा होता है बचपन तन पर् होती थी मिट्टी पर साफ सुथरा था मन आज बहुत कुछ है अपने पास पर वो प्यारा बचपन नहीं बचपन ना सही,बचपन की यादें ही सही कोई ले ले सारा धन बस लौटा दे वो बचपन धन्यवाद सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश

आंखे

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बिना कहे बहुत कुछ कहती है आंखे यह जग है कितना सुन्दर, सौंदर्यता का वर्णन करती है आंखे प्रत्येक अंग है महत्वपूर्ण  पर सबसे प्यारी है आंखे आंखे जो खुद का आईना है आंखे ही शरीर का गहना है आंखे जो हमको दिखाती है दुनियां आंखे जो हमको दिखाती है कमियां आंखे जो प्रियतम का दीदार कराती है आंखे ही है जो दो दिलो को पास लाती है आँखों की मत पूछो बात  बिन आँखों के क्या दिन क्या रात आंखे है तो सपने है  आंखे है तो अपने है आंखे है तो सुंदर लगता है संसार बिन आँखों के जीना है बेकार आंखे भी जीवन की साथी तभी तो साथ मे अपने आंसू लाती है आंखे जीवन का दर्पण है आँखों से ही अपना सुंदर जीवन है सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प' गोंडा उत्तरप्रदेश