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ग़ज़ल

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कतरा - कतरा   पानी  का  बरसाना  होगा यानी  बादल  को  भी कर्ज़  चुकाना  होगा उसकी आंखों में खोया हूं सब कुछ अपना इश्क़ किया है अब इतना तो जुर्माना होगा मसला ये  है  मैं घर  से खाली  निकला था गम ये है अब  घर  फिर खाली जाना होगा लैला  के  ख़्वाब  मरे  हैं  महलों  में लेकिन मजनू  को  सड़कों  पर  पत्थर खाना होगा तुम ही बतलाओ  कब तक दोगे साथ मिरा मुझको  तो   राहों  में   चलते  जाना  होगा यानी  पल  भर के  लब  छूने के  बदले  में  सारी   उम्र  मुझे   अब  शेर  सुनाना  होगा ~ विवेक विस्तार | दतिया, मध्यप्रदेश

गज़ल

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कि कहने को महज़ हैं प्यार की बातें तुम्हें लगती हैं बस बेकार की बातें हमारे साथ सबका साथ दोगे अब तुम्हीं करने लगे सरकार की बातें  यहाँ हमने सँभाला होश है जबसे तभी से हो रहीं रफ़्तार की बातें भरोसा इस ज़माने में करें किस पर टके में बिक रहीं अख़बार की बातें तुम्हें मालूम अब हमने यूँ ही दिल से लगाना छोड़ दी दिलदार की बातें मियाँ तुम इस तरह सुन तो रहे हो पर डुबा देंगी तुम्हें विस्तार की बातें - विवेक विस्तार

जगनुओं को रोशनी

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जगनुओं को रोशनी का यूं पता देता हूं मैं जल रहे कमरे की बत्ती को बुझा देता हूं मैं है मुझे मालूम तेरा दिल जलाता हूं फिर भी बुझ सके ना आग दिल की सो हवा देता हूं मैं आपके गुरूर में कोई खलल ना पड़ जाए शोर दिल का इसलिए दिल में दबा देता हूं मैं इस ज़माने से मिरे रिश्ते अलग हैं थोड़े से लोग देते हैं दगा तो मुस्कुरा देता हूं मैं यार कहते हैं सुनाओ इश्क के किस्से अपने  और अपनी एक दो गज़लें सुना देता हूं मैं ***** विवेक विस्तार