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सौभाग्य का पर्व

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आज है सौभाग्य का व्रत, सज रही हैं गोरियाँ।  मुस्कराती   हैं  हृदय  में, नेह  की ले डोरियाँ। हार    साजे  है  गले  में, चमक  जाएं मोतियां। कान के झुमके सुहाने, फैलती है ज्योतियाँ। सोलहो श्रृंगार  कर  के, खनक कंगन बाजती। हाथ में पिय नाम लिख कर, मधुर मन वो लाजती। रूप को दर्पण निरख कर, खुश हुई जातीं घनी। समझतीं है आज खुद को, जगत की सबसे धनी। कर रही श्रृंगार नख शिख, रह न जाये कुछ कमी। आतुरा  सी  मार्ग  देखें,  द्वार   पर  आँखे थमीं। बादलों  की ओट में जा, चाँद छिप  जाये कहीं। सुंदरी  के  अधर  टेसू, शुष्क  पड़   जाए वहीं। थाल पूजा  सज गई है, पात्र जल भी  ले लिया। आयु लंबी  पति जियें ये,प्रार्थना  प्रभु  से किया। पति  खड़े हैं सामने ही, जल पिलाते हाथ से। देखते अति स्नेह भर कर, नयन हर्षित साथ से। ज्यूँ रहे चंदा गगन में, लालिमा ज्यूँ  रवि  रहे। त्यों रहे मुझ संग साजन, प्रेम की ये छवि रहे। नेह  की  य...

विरह

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उनके विरह की रात अब , कटती नहीं मैं क्या करूँ। प्रिय मिलन की आस लिए , जगती रही मैं क्या करूँ। बिंदी सजा के कैसे लगूं ,कोई न देखे  मन  व्यथा। बेला कली भायी नहीं ,चुभती रही मैं क्या करूँ। वेणी सजा ली केश में, प्रिय के विरह,के फूल से। अब दंश  बन चूसे मुझे ,खिलती  रही मैं क्या करूँ। चूड़ी चुभे कंगन चुभे , श्रृंगार भी भाते नहीं। पायल बजे गम्भीर स्वर, छलती रही मैं क्या करूँ। संगीत की धुन नहिं लुभाती, साज भी, सजते नहीं। इस पीर में  पीड़ा घुसी ,मन खुश नहीं मैं क्या करूँ। आँखे व्यथित थी देखकर ,उस दिन विदा होते हुए। मेरे लिए  तड़पन लिखा , ये ही सही मैं क्या करूँ। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह' 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿