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समुद्र के पहरेदार

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समुद्र के पहरेदार सुनो तुम क्या इसकी रक्षा कभी कर पाओगे? ये तो विशाल अनंत इसकी नहीं तय सीमाएँ किस किस दिशा में तुम नज़र ऱख पाओगे? व्यापक जलनिधि का ये प्रतिनिधि तुम कैसे इसे बांध पाओगे? जलराशि में समाहित बहुमूल्य मोती रत्न इन्हें कहाँ छुपाओगे? समुद्र की लहरों सा उफ़नता डूबता ये मन क्या इसे कैद कभी तुम कर पाओगे? ज्वार भाटे की तरह ये अशांत ही रहता क्या तुम इसकी गति पर कभी भी रोक लगा पाओगे?? स्वरचित शैली भागवत "आस "✍️

"प्रेम की निशानी"

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जब ये लब कुछ भी न कह पाये  तब इनकी जबानी तुम पढ़ लेना।                 🌹 बालों में अनुभव की चांदी छाये तो इनकी कहानी तुम पढ़ लेना।                 🌹 कहीं धूप,कहीं छाँव से बीते दिन  एक शाम सुहानी तुम पढ़ लेना।                  🌹 मेरी बचकानी बातें याद करो तो  इनमें छुपी गहराई तुम पढ़ लेना।                   🌹 ये शब्द नहीं सब बयां कर सकते कभी ख़ामोशी भी तुम पढ़ लेना।                  🌹 जुड़ने टूटने के सिलसिले बहुत हुए इस ठहराव को बस तुम पढ़ लेना।                    🌹 तय न कर पायी जो दूरियां कभी वो लंबी मज़बूर राहें तुम पढ़ लेना।                    🌹 दुनिया मांगेगी हर चीज का हिसाब खोया पाया कितना तुम पढ़ लेना।               ...

"पर्यावरण दिवस "

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जब नहीं थे हम तुम प्रकृति तब भी थी परिवर्तन से इसके ही हुआ हमारा सृजन जीवन दिया इसी की सौगातों ने मानव ने आधुनिकता  एवं विकास की अंधीदौड़ में शामिल हो कर इसे भुला दिया और नियंत्रण इस पर अपना लगा दिया, फिर भी ये वसुंधरा चुपचाप देखती ही रहीं मानव की हर भूल को नज़रअंदाज इसने किया आधुनिकता की होड़ में जब स्वरुप को हर ओर  से छलनी किया इसने भी फिर रूप बदल मनुष्य पर प्रहार किया आँधी, तूफानों के कंपन से भी मानव ह्रदय नहीं हिला संकेत देती आपदाओं का संदेश भी नहीं सुना महामारी के कड़े प्रहार ने अब एक मौका और दिया किस तरह इसने हमें घरों में ही कैद किया अब मान ले बस ये बात  सिद्ध है सृजन इसका ऊपर इससे तू नहीं साथ लेकर चल इसे नहीं तो तेरा अस्तित्व नहीं  चेतावनी ये जाने ले और पर्यावरण संरक्षण को  अपनी जिम्मेदारी मान ले हरी भरी बनाने ये धरा वृक्षारोपण की मुहिम चला धरा को निखार दे और अस्तित्व अपना भी संवार ले। स्वरचित  शैली भागवत "आस" इंदौर

अक्सर देर रात

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अक्सर देर रात जब भी नींद खुल जाती है, जेहन में कैद कुछ बातें बाहर आ जाती है चेहरे पर कुछ हल्की मुस्कान जगाती कुछ आँखों में नमी दे कर जाती है वहम के साये अंधेरों में लहराते जान पड़ते सन्नाटे में से आती आवाज़े डर को नया आकार देती पर मन के अंदर का शोर इन सबसे परे एक अलग ही दुनिया का अक्स दिखाता किसी अपने को खोने का गम तो अपनों के दिये हुए ज़ख्मों का जखीरा लादे आँखों से नींद कोसों दूर हो जाती फिर इन्हीं आँखों से अविरल अश्रु धार बह निकल सूख कर   कई परतें चेहरे पर छोड़ जाती और भारी सी पलकों की डिबिया अपने आप बंद हो जाती अक्सर देर रात............ स्वरचित शैली भागवत "आस "✍️

मेरा शहर

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गरज गरज जोरों की थी हुआ था बहुत हो हल्ला स्वच्छ भारत अभियान का हाथ में थामे थे सब झंडा। सड़कें, गलियों, नालियों की सफाई कर सबने खींचे फोटो स्वच्छता के नाम पर बस कर दी थी खानापूर्ति। "मेरा शहर" तब ऐसा था जिसने हृदय से ये कदम उठाया स्वच्छता मिशन का सच्चा मॉडल बन विश्व में नाम कमाया। स्थानीय प्रशासन ने बागडोर अपने हाथों में दृढ़ता से थामी योजना दर योजना काम कर फिर स्वच्छता में बाज़ी मारी। सर्वप्रथम सफाई कर्मी और शहर वासियों की मानसिकता को बदला अभियान को क्रांति बनाकर जन जन तक पहुंचाया। मेहनत मेरे शहर की रंग लाई स्वच्छता अभियान में मिला शीर्ष स्थान एक नहीं, दो नहीं, पांच बार  स्वच्छता सर्वेक्षण में ये बना रहा सरताज ये हमारा स्वच्छतम शहर "इंदौर".... स्वरचित शैली भागवत "आस" इंदौर

"घर का चिराग"

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ओ! माँ के राज दुलारे लाल माँ भारती की रक्षा को हो जा तैयार.... अपने कुल के कुलदीपक तुम वीर सपूत इस देश के बन के जान अपनी हथेली पर रख के दुश्मन के हर वार को कर नाकाम ओ!सीमाओं पर डटकर खड़े प्रहरी महान माँ भारती की रक्षा को हो जा तैयार...... घर का चिराग जो होता है कंधे पे उसके भार भी होता है  दुख दर्द परिवार के निवारण करने को शनै: शनै: उसको जलना ही होता है ओ! वीर तेरी वीरता से प्रकाशित हो देश महान माँ भारती की रक्षा को हो जा तैयार.... मज़बूत हाथों में तेरे ही सदा  देश की सुरक्षा की ये डोर रहे सरहद पर जब तू खड़ा रहे देशवासियों को एक सुकून रहे ओ! सैनिक तेरी बाहों में सुरक्षित ये धरा महान माँ भारती की रक्षा को हो जा तैयार.... ओ! माँ के राज दुलारे लाल माँ भारती की रक्षा को हो जा तैयार.... स्वरचित शैली भागवत "आस"🖍️

बौद्ध जीवन दर्शन

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महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन महान है, जनजीवन पर आज भी इसकी अमिट छाप है। कर्म, ध्यान एवं प्रज्ञा इसके आधार रहे है, दुखों से मुक्ति इसका एकमात्र ध्येय रहे है। बौद्ध दर्शन के अपने कुछ विचार है, धर्म एवं नैतिकता का देते ये ज्ञान है। संपूर्ण अपेक्षाएं अपने से ही रखो, जलो और अपने दीपक स्वयं बनो। मध्यम मार्ग से संतुलित जीवन रखो, अतिवादी व्यवहार से बचकर रहो। दुख दूसरों के तुम सदा महसूस करो, संवेदनशील बन जीवन व्यतीत करो। त्याग अहंकार का कर बनो तुम समर्थ,  अनमोल जीवन कहीं बीत न जाये व्यर्थ। हर मानव के अंदर ईश का ही वास है, हृदय मैं अच्छाई का कोना सबके पास है। स्वरचित शैली भागवत "आस" इंदौर

"अभिमान"

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मिट जाता है वंश वो जो करता दूसरों का अपमान नहीं माने जो इस विश्व में अनमोल प्राणियों की जान दुर्योधन के साथ थी कृष्ण की नारायणी सेना विशाल परास्त हो गया ना पाया धन, वैभव, यश और मान। यूँ तो लंकेश्वर ने बनाया राजाओं में था उच्च स्थान ज्ञानी वेदों का, शास्त्रों से ग्रहीत किया अपार ज्ञान  महानता धरी रह गयी शैतान का धरा रूप विकराल अहंकार के मद में चूर समझ लिया स्वयं को महान। मांगे से मिलता नहीं यहां कभी किसी को सम्मान आज जो तेरा है कल बनेगा किसी और की शान सुविचारों से अपने जो जीत ले दुनिया का ताज  श्रेष्ठ जग में वहीं जिसे नहीं तनिक भी "अभिमान"। स्वरचित शैली भागवत 'आस'✍️

बिन पानी सब सून

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गरमी का मौसम रहे,तपन भयी है तेज भटक प्राणी तरस रहे, जल की करते खोज। तपती जब ये भू रहे, आग बरसे खगोल बूँद बूँद प्यासे रहे, जल लागे अनमोल। त्रस्त भये पक्षी उड़ रहे, दाने बिन निष्प्राण  शोध नीर की कर रहे, जल बिन त्यागे प्राण। दिवस तपे आकुल रहे,हलक भये बेहाल जन उपकार बना रहे, बदले इनका हाल। परोपकार मानव धरे, बच पाये ये निरीह बस दाना पानी रखे, ये भी रहे सजीव। नि:स्वार्थ सेवा जीव की, अगर करे है कोय सुकून मन में घर करें ,सार्थक जीवन होय। तनिक जल की आस रहे, जलदान कर असीम बिन पानी सब सून, कह गये संत रहीम। स्वरचित एवं मौलिक शैली भागवत "आस"✍️

"मज़दूर"

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बेबस बेहिसाब किस्सा है, जिसका बरकत के समंदर में नहीं कोई, हिस्सा हैसियत से नहीं रहता है, अंजान हसरतों का नहीं बनाता कोई, जाल हुनर की इनकी गरज सुनता नहीं आसमां हासिल नहीं हो पाती कभी हसीन हयात  फिर भी हैरत में डाल देता  इनके जीने का जज्बा फरियाद  फलक तक जाये ना जाये  फरिश्तों के फितूर के आगे होते नहीं फना रेशमी राब्ता जमीं से ही रखता है, गमों के परछाईयाँ भी हिला ना पाई जिसे नवाजिश भरी तुम्हारी निगाहों की गुंजाइश नहीं इसे ये मज़दूर तो मेहनत से अपनी तकदीर मुकर्रर करता है। शैली भागवत "आस"✍️

'नया दौर नया जमाना'

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नया दौर है,आया नया जमाना नर पर लगती अब भारी नारी है। अपने अधिकारों की बात करे ये नहीं रही ताड़न की अधिकारी है। चूल्हे चौके से बाहर निकल कर  इसने इक नयी पहचान बनाई है। पिसती नहीं प्रतिदिन घुन की तरह घर के सदस्यों से पापड़ बिलवाती है। खिला सबको न रहे भूखी प्यासी  फुरसत में मीठे अंगूर भी खाती है। आधुनिक युग के साथ बदले कायदे छल से बाहर जानती अपने ये फायदे। कदम मिला रही पुरुषों के साथ जब तो उन्हें अपने भी काम सिखाती है। स्वरचित शैली भागवत "आस" ✍️

स्वर्ग नरक

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अपने अपने कर्मों का फलदान   स्वर्ग नरक का यही होता भान सभी चाहते हम इसी जीवन में  कैसे क्यों न बन जाये श्रेष्ठ महान इच्छाओं की पूर्ति करने यहां बेचे भी देते सरे बाज़ार ईमान इंसानियत को रख ताक पर निःसंकोच ले भी लेते है जान अर्थ का अनर्थ बनाते व्यर्थ की  बातों में ही सदा उलझता ये जहान जो रखता दिल को पाक और साफ ये दुनिया उसे सदा ही लगती वरदान। स्वरचित शैली भागवत 'आस'

"छुट्टी की सुबह"

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छुट्टी की सुबह होती है अलसाई सी आँखों में नींद स्वप्न नये भर लाती इन नये सपनों के बिछोनो पर मुझे प्यार की हल्की सी थपकी दे सुलाती मीठी सी निदिया के मखमली एहसास में मैं इतना खो जाती लगता जैसे किसी परियों के संसार में जाकर मैं गुम हो जाती.. दिल बस यही चाहता न आज कोई हलचल हो मेरे आसपास ना बिखरे मेरा ये  सुनहरा ख़्वाब ये सफर सुहाना इस सुबह का  न कभी खत्म हो किसी मोड़ पर  हर चिंता से परे बस बढ़ती ही रहूँ इस सुहावनी डगर पर  पर पता नहीं ये सूरज क्यों हो जाता इतना उतावला छुट्टी के प्रतिक्षित दिन भी इसे शुरुआत करने की बेसब्री इतनी होती की व्योम पर चमक कर सुबह का शीघ्र आगाज़ करता चला जाता पता नहीं मेरी मीठी नींद का ये क्यों दुश्मन बन जाता? और इस अलसाई सी भोर का मेरा स्वप्न अधूरा ही रह जाता। स्वरचित शैली भागवत 'आस'

'मायाजाल'

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शब्दों को मापतोल कर महल बनाते है अब हम कोई गिराए तो भी देख चुप रह जाते है अब हम। घात लगाये बैठा है हर शख्स गलती गिनाने को तोहमतें हज़ार पाकर भी चुप रह जाते है अब हम। दुनिया के मायाजाल ने इस कदर उलझाया कि  तस्कीन -ए-दिल की चाह में भटक रहे है अब हम। ख़्वाब है, ख्वाहिशें है, मज़बूरी शामिल है बेहिसाब  खुद को तकसीम कर बेबसी में जी रहे है अब हम। लफ़्ज़ों को जबसे जब्त कर ऱख दिया संदूक में  खामोश तक़दीर के कोरे पन्ने पलटते है अब हम। परवाह से मिले ज़ख्म सजा संभल गये इतने कि  बेपरवाही से जमाने की दुखी नहीं होते है अब हम। तसल्ली है कि इक 'आस' आज भी है कायम उसीकी जुस्तजू में आगे बढ़े जा रहे है अब हम। स्वरचित शैली भागवत 'आस '✍️

'घूरती निगाहेँ '

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ये सीमाएँ है मेरी जिसे तय किया है मैंने शायद आज आखिरी बार कुछ कहाँ है मैंने। बेपरवाही का आलम रास आता भी नहीं  इसी गहरी बात को महसूस किया है मैंने। कदर मुझसे न होगी ये जानकर ही शायद रिश्तों को अपने से बहुत दूर पाया है मैंने। टूटे तो कोई न संभाल पायेगा यही जान  सोच को जमाने से अलग बनाया है मैंने। ज़मीर को मार  खुशियों को नहीं संवारा  इन्हीं हाथों से तो सब कुछ गँवाया है मैंने। रंगीनियाँ चाहत है जमाने भर की यहां पर  घूरती निगाहों में लगाव कहाँ पाया है मैंने। मेरी'आस'को जानने वाले भी यही कहते है इतनी शिद्द्त से कैसे जीवन निभाया है मैंने। स्वरचित शैली भागवत'आस'✍️

'अपरिचित'

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जन्म से मृत्यु तक कितना कुछ अपरिचित है कौन हूँ मैं क्या मेरा मकसद ये अपरिचित है। मेरे मन पर कब्ज़ा करना सबने चाहा मगर  मेरे दिल के जज्बातों से सब अपरिचित है। एक अंधी दौड़ है, ये क्षणभंगूर जीवन यहां जीने के तौर तरीकों से रहे सब अपरिचित है। अपनों हुए पराये तो कभी पराये लगते अपने जाने पहचाने नाते भी लगते कभी अपरिचित है। देखकर भी मुझे अनदेखा करती आयी है  ये दुनिया मेरी पहचान से भी अपरिचित है।  मिट जाते जो उसके ऊपर अपने को मानते  अपने अभिमान से सब रहते क्यों अपरिचित है। एक 'आस' ही सहारा बन उबर आती है,बाकी  अंजाम -ए -हयात से सब रहते अपरिचित है। स्वरचित शैली भागवत 'आस'

गौरैया :हमारे आसपास

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आज 20 मार्च 2022 गौरैया दिवस मनाया जा रहा है।आज सभी इसके संरक्षण की ओर चिंता जता रहे है। गौरैया एक ऐसा पक्षी है, जो मानव विकास के काफ़ी करीब रहा है या यूँ कहे की मानव जाति के साथ ही ये पनपा है, और हमारे घरों, छतों, आंगन में सदा फुदकता आया है। मुझे याद है, बचपन में जब भी दादी के घर जाना होता था,वहाँ घर में खुला आंगन होता था, जहां कि जूठे बर्तन रखने के लिए एक कोना था, तो थाली में बच गये, चावल, दाल के दाने और रोटी के छोटे टुकड़े ये अपनी चोंच में दबा कर छत की तरफ जाती सीढ़ियों और टिन के बने शेड पर बैठ जाती थी और उसे तसल्ली से खाकर फिर से नीचे आकर चोंच में थोड़े दाने भरकर ले जाती थी। इसके साथ ही आंगन में जल रखने का स्थान भी हुआ करता था वहाँ भी दादी इनके लिए सकोरे और पुराने टबों में पानी रोज़ सुबह भरकर रखती थी जिससे दिन भर ये उसके आसपास चहकती, फुदकती, गर्मी में पानी में पंखो को भिगो फड़फड़ करती रहती थी, और में पूरा दिन इनकी शरारतों पर नज़र रखती थी, बहुत ही अपनी सी लगती थी ये गौरैया। शहर जाकर पर ये कभी कभी ही दिखाई देती थी, इनकी कमी बहुत अखरती थी मुझे, क्यूंकि शहरों में आधुनिक शैली के बने रसो...

"आंधियां "

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वक्त की आंधियां इस कदर छाई है, गिरे तो मुश्किल से संभल पाई है, ज़िन्दगी की इस तेज़ रफ़्तार ने कई घरों से देखो छते तक उड़ाई है। बेवजह हमसे कुछ चाहतें चुराई है, नामुमकिन सी ख्वाहिशेँ जगाई है, हसरतें दिल में रख भूलाना ही सही  मुमकिन सफर की राह कब दिखाई है। यहाँ कब हमने अपनी मर्ज़ी चलाई है, जो मिला हमने तो उससे ही निभाई है, तक़दीर और चाहत कब एक हुए  जीवन में कठिन बस यही एक लड़ाई है। स्वरचित शैली भागवत 'आस'

"साजिश"

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थोड़ी गर्मी, थोड़ी सर्दी, थोड़ी बारिश है, मौसमों ने मिलकर रचाई नई साजिश है। खुशियों में ना सही गमों में गले लगाना, ज़माने से रही बस इतनी ही गुजारिश है। कामयाबी हमारे हिस्से एक दिन आएगी, हमें अब तलक जिन्दा रखे ये ख़्वाहिश है। महफूज़ है हम अपने दायरों में रहकर, रब ने हम तक पहुंचाई  इतनी  नवाजिश है। अपने परायों से झेल रहे कड़वाहट क्यूंकि,  मेरी तहजीब में शामिल मेरी परवरिश है। स्वरचित शैली भागवत 'आस'

'वर्तमान'

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विचलित मन है आज बहुत यही सोच रहा वर्तमान का भार उठाना कितना भारी लग रहा... मँहगाई का जमाना आया जीवन जिसमें पिस रहा... एक तरफ ये अम्बर संभाले अनगिनत तारों का भार... धरा पर तो गिने चुने इंसानों को इंसान ही भारी लग रहा... बढ़ती आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की आवाज़ हर तरफ... आदमी की आवाजों को गोला बारूद का धमाका बंद कर रहा.... तेल राशन की व्यवस्था करते सिकुड़ रही है हृदय की सीमाएं... अदृश्य कुछ सीमाओं को बचाने मनुष्य अपना ही भूगोल बदल रहा.. आधारभूत आवश्यकताएं पूरी करने  दल दल में फंसा ये मानव..... समय चक्र अपनी गति पकड़े चले  मौसम का बदलाव मुश्किल लग रहा.... धर्म, देश, मजहब के नाम की  गूंज छाई जुबानों पर इस क़दर  इंसानियत की अब न कोई पहचान कायम करता लग रहा ... स्वरचित शैली भागवत 'आस'✍️