अक्सर देर रात



अक्सर देर रात
जब भी नींद खुल जाती है,
जेहन में कैद कुछ बातें बाहर आ जाती है
चेहरे पर कुछ हल्की मुस्कान जगाती
कुछ आँखों में नमी दे कर जाती है
वहम के साये अंधेरों में
लहराते जान पड़ते
सन्नाटे में से आती आवाज़े
डर को नया आकार देती
पर मन के अंदर का शोर
इन सबसे परे एक अलग
ही दुनिया का अक्स दिखाता
किसी अपने को खोने का गम
तो अपनों के दिये हुए ज़ख्मों
का जखीरा लादे आँखों से
नींद कोसों दूर हो जाती
फिर इन्हीं आँखों से अविरल
अश्रु धार बह निकल सूख कर 
 कई परतें चेहरे पर छोड़ जाती
और भारी सी पलकों की डिबिया
अपने आप बंद हो जाती
अक्सर देर रात............

स्वरचित
शैली भागवत "आस "✍️

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