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Showing posts with the label प्रिया प्रसाद

क्योंकि मैं तुम्हें चाहती हूं.....

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दिन की तपिश के बाद मैं रात्रि की शीतलता में खिलती हूं मैं एकांत में जब तुमसे मिलती हूं व्यस्तता के बहाव से निकल कर कुछ क्षण मैं जीवित होती हूं  मैं सबसे दूर जब तुझमें होती हूं धीमी खुशबू के साथ सरल सी मैं अकेली खिलती हूं संगम नहीं, मैं मन से सिर्फ तेरी होती हूं मैं शाख पर हमेशा अकेली आती हूं मुझे नहीं पता मैं तुम्हें कितना चाहती हूं सुखी सी डालियां ,मृत हो चुके पत्तों पर मैं हरियाली चाहती हूं  उसे जीवित करने नित्य यहां  मैं अकेली आती हूं तन्हा सी अकेली खिली मैं मौन रह जाती हूं  मुझे नहीं पता की मैं तुम्हें इतना क्यो  चाहती हूं दिन की तपिश‌ के बाद मैं रात्रि की शीतलता में खिलखिलाती हूं मुझ में बसे तुम से मैं जब मिल जाती हूं  धीमी खुशबू के साथ सरल सी मैं अकेली मुस्कुराती हूं क्योंकि मैं तुम्हें चाहती हूं..... ............................................ प्रिया प्रसाद ✍️

वो खिड़की जो बंद रहती है

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वो खिड़की जो बंद रहती है रोशनी के लिए सिसकती है कुछ छेदों से झांकती रोशनी अंधकार को मिटाती है वो बंद कुड़ियां  जंग लगी हुई  बेजान सी अब तब दम तोड़ती मोटी सिकड़ फांस लगाए जर्जर दीवारें अधखुली  ढहती गिरती कई मनघड़ंत अफवाहों से घिरी  पर गुंगी कहें भी कैसे ? कोई सुनता ही नहीं अंधविश्वासों में अंधे हुए लोग उसकी मरम्मत नहीं  मौत को लिखते हैं बंद पड़ी वो खिड़की बस लाचार झांकती है कहती है खुद से हाय ये लोग ..... बस करो सारे ढकोसले                                     प्रिया प्रसाद  ✍️

चल ले चलूं तुम्हें मां सरस्वती की ओर

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लो थाम लो अंगुलियों से तुम डोर चल ले चलूं  तुम्हें मां सरस्वती की ओर चकाचौंध करेंगी तुम्हें उजाले मेरी आंचल तले शितलता है घनघोर चल ले चलूं  तुम्हें नई दुनिया की ओर डगमगाते पग धरो  क्षतिज की ओर चल ले चलूं तुम्हें संघर्ष भरी दुनिया की ओर लो थाम लो  अंगुलियों से तुम डोर निर्भय हो भरो उड़ान संग तुम्हारे है अभी ममता की डोर चल लें चलूं तुम्हें मां सरस्वती की ओर सुर संगीत करें स्वागत "ऐं" ध्वनि बोल  चलो मां सरस्वती की ओर लो थाम लो अंगुलियों से तुम डोर चल लें चलूं तुम्हें मां सरस्वती की ओर प्रिया प्रसाद ✍️

घर घर की कहानी

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कोरी पड़ी कागज लिखो बहता पानी जन्म दिवस सबके घर मृत्यु रचे अटल कहानी पग पग रखें संघर्ष धाराएं सबको है रीत इसकी निभानी सिया राम से गृहस्थ जीवन महाभारत कराता तीखी वाणी संयम सर्मपण सबके घर कलह क्लेश करता बेमानी बह रही है अब ‌भी धाराएं नहीं रुकता घर घर की कहानी भरता रहता कोरा कागज अनुभव लिखता कलम नादानी खुशीयां बटोरती थी गर्म रोटी बासी बचा खा कह रही कहानी बटोर ली ममता घर आंगन अकेला वृद्ध सुनाता कहानी ऐसे ही भर रहे कोरे कागज यही है घर घर की कहानी प्रिया प्रसाद ✍️

मेरी बिंदिया

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मांग सिंदूरी जुल्फों की है बद्री छाई चमक रही है बिंदिया वैसे लालिमा लिए खुबसूरती आई नाक नथनी पिया को भाए झूमका कानों में है संगीत गुनगुनाए आंखियन तो है पिया दर्श को ललाए खिला कमल सा मुखड़ा भाए लग कर काजल भी खिल जाए होंठ तो मधुरस का पान‌‌ कराए संग तेरे बैठ कर मैं  करुं ठिठोली बिखरे आभा और बन जाऊं मैं रुप की ज्योति संग मैं तेरे हो जाऊं पूरी बामांगी हूं और हूं  मैं पिया अलबेली कर आलिंगन में क्षितिज हो जाऊं पियाप्रेम में, मैं खुद को खो जाऊं सुबह शाम में बस सिंदुरी हो जाऊं प्रियतम की प्रिया बन खोती ही जाऊं                             प्रिया प्रसाद✍️

भम्रित थे

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भम्रित थे या भम्रित हो गये वो तस्वीरों में थे या हम यूं ही उनमें खो गये रात गुजरी और भोर हो गये वो खामोश ही रहे और हम तो उनमें खो गये भम्रित थे या भम्रित हो गये उन्हें निहारते निहारते हम यूं ही उनमें खो गये बहती हवाएं भी दिशा बदली और मौन हो गये ठहरे ठहरे से हम बस उनमें खो गये ना उसने नज़रें मिलायी बस कहीं ओर देखते रह गए रात गुजरी , रोशनी अश्को को चुरा ले गए  भम्रित थे या भम्रित हो गये हम तो उनकी तस्वीरों में ही  खो गये वो रुठे रुठे से ना जाने क्यो मौन रह गये? ना पलकें गिरी, ना नजरें मिली  ना जाने कैसे भोर हो गये भम्रित थे या भम्रित हो गये उन्हें चाहते चाहते हम  खुद को ही खो‌ गये।। प्रिया प्रसाद ✍️

सुनो प्रिये

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सुनो प्रिये ❤️ मैं नहीं निहारती हूं दर्पण मैं खुद को तुम्हारे आंखों में संवार लेती हूं तुम्हें देख तुम्हारे प्रेम का श्रृंगार सजा मैं खुबसूरत कहलाती हूं अपने ‌आंखों में , मैं तुम्हें बसा ,बस तुम्हें निहारती हूं गुनगुनाती है आलिंगन  और मैं मुग्ध हो जाती हूं मैं तुमसे प्रेम रचा तुम्हारे प्रेम से श्रृंगार सजाती हूं सुनो प्रिये ❤️ तुम्हें पलकों में बसा मैं काजल सजाती हूं मैं तुम्हें देख कर स्वत:  खुबसूरत हो जाती हूं नहीं निहारती हूं मैं दर्पण तुम्हारे आंखों से मैं खुद को संवारती हूं सुनो प्रिये ❤️ घने काले जुल्फों की बादल जब फैलाती हूं मधुर मधुर प्रेम बारिश में मैं ‌भींग जाती हूं प्रिया प्रसाद

मेरी झुकी पलकें

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मेरी झुकी पलकें गतिमान होना चाहती है सिर्फ तुम तक, और वहां कुछ पल ठहराव चाहती है पर तुम्हें बिना बताए एक आड़ लिए तुम्हें  जी भर देखना चाहती है, और फिर शांत हो बस हवा में विलिन हो जाना चाहती है ताकि कोई उसे ना रोक सके सीमाएं बता कर, सिर्फ संतुष्टि ही तो चाहती हूं  अपने मन की  जो सिर्फ वही जा रुकता है पर मैं उसे आभास नहीं कराना चाहती हूं कि मेरा मन उसे ढूंढता है और निगाहें उनके लिए गतिमान होना चाहती है शांत और एकांत में दो प्रहर वाले प्रदोष में सौम्यता को चाहती हूं पर कोई आश नहीं लगाती हूं जो टूट कर वियोग रच दे बस स्वत: बहाव बन जाना चाहती हूं जो तुम तक पहुंचे जिसमें "मैं" नहीं सिर्फ "हम" हो जो सदैव संग तुम्हारे  गतिमान हो प्रिया प्रसाद ✍️❤️

इतनी नाराजगी क्यों ?

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इतनी नाराजगी क्यों ?  बोलो मुझसे कोई गलती हुई है क्या? नहीं! कुछ नहीं ,पता नहीं  फोन रखो!  अच्छा ठीक है माफ कर दीजिए ना अब नहीं बोलेंगे कितनी बार कहूं,  एक बार में समझ नहीं आता क्या? तेज चल रही आंधी में लौ बहुत मध्धम था एक झोंका बार बार उसे बुझाता पर लौ सहम कर फिर जल जाता  उसे कहां पता था मनसा ,किसी और के आने का नासमझी में वो बार बार है मनाता मिथ्या आरोप से वो घिरता जाता पर लौ फिर भी है मुस्कुराता जाता समय का पर्दा जब थोड़ा लहराता पुरी कहानी तब उसे है समझ आता फिर हृदय जलता और आंखें भर आती इतनी जलन को सहेज वह देख उसे मुस्कुराता ,बस जलता और जलता फिर एक दिन स्थिर  हो कहीं बिखर जाता है  पर उसकी व्यथा उसी में रह जाता।। प्रिया प्रसाद

अंश्रुधारा है आंखों में कैसे दर्शन पाऊं मां

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आप  सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏 अंश्रुधारा है आंखों में कैसे दर्शन पाऊं मां, उतना ज्ञान नहीं है मुझमें जो तेरी महिमा गा पाऊं मां, दुःख संताप से अस्त व्यस्त हो रहा है जीवन सबका तो कैसे मुस्काऊं मां पांव में है बेड़ी मोटी,तुझ तक कैसे आऊं मां इस महामारी के भंवर में है सभी उलझे पड़े, अब तो बेड़ा पार लगा दो मां, कर रही हूं आस्था और श्रद्धा समर्पित अब तो मुझे अपनाओं मां कैसे करना है इतना तो नहीं जानती, पर धूप दीप कपूर से तेरी आरती गाऊं मां दुःख विपदा का नाश करो अब, सबके जीवन मे नई चेतना जगाओं मां, पाप पुण्य के असमंजस से दूर, बस कर्म का पाठ पढ़ाओ मां अंश्रुधारा लिए आंखों में बारंबार शिश नवाऊं मां सारी गलतियों को क्षमा कर तुम इस बेटी को अपनाओं मां     ‌‌                                                                  प्रिया प्रसाद✍️❤️

तुम्हारी आहट

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इंतज़ार होती थी हसीन जब एक आहट तुम्हारी होती थी खिलखिला उठती थी वादियां जब घूंघरु दौड़ बालकोनी पर आ रुकती थी इन प्यासी निगाहों को बस तुम्हारे दीदार से चैन आ जाता था रुक जाते थे शब्द और आंखें भर आता था  इश्क का तो पता ना था पर देख लूं तुम्हें तो बस चैन आ जाता था कोई रिश्ता ना था पर मन तो तुम तक जाता था इजहार ना था पर सुकून तो था पाया ही नहीं, पर खोने का कैसा डर था? इंतजार होती थी हसीन क्योंकि उसमें तुम्हारी आहट तो था बेवजह की बातें, पर मुझे प्रिये ,क्योंकि उसमें  तुम्हारी एक शब्द वाले  आवाज तो था खुलती थी मेरी खुशीयों का दरवाजा  दूर से देखूं तुम्हें , वैसा ही सही  पर दीदार तो था लंबी ही सही पर इंतज़ार होती थी हसीन क्योंकि उसमें तुम्हारी आहट तो था प्रिया ✍️❤️

नकाब

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प्रेम में नकाब नहीं होती वो तो बेहिसाब होती है लफ्ज़ ठहर भी गए फिर भी हृदय से संवाद होती है चूंकि प्रेम तो बेहिसाब होती हैं प्रत्यक्ष ना सही अप्रत्यक्ष भी दीदार होती है शांत रहता है लफ्ज पर हृदय में शैलाब रहती है अपूर्ण ही सही, पर प्रेम बेहिसाब रहती है शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं इंतजार भी बेहिसाब होती है प्रेम में नकाब नहीं बस हृदय बेहिसाब होती है प्रिया ❤️✍️

तुम मिले तो एक वजह मिली

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तुम मिले तो एक वजह मिली जीवन तो थी पर अनुभूति तो तुमने सौगात में दी जीवन तो तब भी था और अब भी है फिर झूठ क्यों कहूं पर तुम्हारे आने से एक आश सी जगी एक बंधन सा मन तुमसे बंधना चाहा तुम मिल कर भी न मिले फिर भी हृदय तुम्हें खोने से क्यों डरता रहा हम तो जैसे थे वैसे आज भी हैं न सांसें बदली,न भावनाएं मानों तो आज भी बहाव बंद नहीं बदल तो तुम गए मानों तुम्हारी धारा ने तो अपनी दिशा ही परिवर्तीत कर दिया हम जो थे पुरे सही थे पर तुम्हारी अनुभूति ने मुझे जैसे मुझे प्रेम डोर में बांध लिया एक खुबसूरत अहसास से एक रचनाकार बना दिया सही गलत की तो गुंजाइश थी ही नहीं फिर मन से ओझलता को क्यों दर्शा दिया                                                                         प्रिया

प्रेम ईश्वर है

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प्रेम को परखा नहीं प्रेम को तो समझा जाता है ये वो साथ भी हो सकता है जहां हम सिर्फ सारे गम भुला कर  दो पल साथ तुम्हारे हंस सके प्रेम वो डोर है जो दिमाग से बांधी नहीं जाती वहां तो हृदय को पढ़ा जाता है प्रेम ईश्वर है, प्रेम ज्ञान है, प्रेम अनुभूति है, प्रेम सत्य है , प्रेम पवित्र है, प्रेम सदमार्ग भी है, प्रेम अमिट है, और प्रेम ही जीवन है।।                                                     प्रिया ❤️✍️

पर्यावरण

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नारंगी सी चुन्नर ओढ़े देखों किरणें आई है, मधुर मधुर गुंजन लिए खग  ने सहनाई बजाई है बिछ गई है हरी कालिन उस पर ओश लगे मानों मोती की हार सजाई  है रंग बिरंगी पुष्पों ने रंगों की बहार लाई है नाच रही है तितलियां प्यारी लगता है प्रकृति दुल्हन बन आई है,झर झर झर के तानों से नीर ने भी संगीत बजाई हैं मीठे मीठे फलों से प्रकृति  मां स्वरुप बच्चों की भूख मिटाई है, चीर कर सीना अब फसल लहलहाने की बारी आई है देखों प्रकृति ने सांसों में आक्सीजन भर हम पर जीवन बरसाई है रुक जाओ इसे ना काटो मां स्वरूपा प्रकृति ने हम सब पर ममता बरसाई है।। प्रिया ❤️✍️

झिलमिलाती रोशनी की कर दूं तुम पर बौछार

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कैद कर लेते खुबसूरती को काश तो कर देते हम अमावस्य में झिलमिलाती रोशनी की बरसात काश ये निगाहें तुम तक पहुंच पाती तो हम कर पाते जी भर तुम्हारा दीदार हो जाते तब हम समुद्र के भी पार जब करा देते तुम पानी में  बन कर छवि खुद का दीदार झिलमिल झिलमिल सी देखो आ गई फुहार  कुछ ना आ रहा नजर  बस आ रही है तुम्हारी याद झिलमिलाती रोशनी अब जा तू  समुद्र के पार, कर दे उन भी प्रेम की बौछार।।  प्रिया  ❤️✍️

हमने प्रीत तुमसे ही लगाई है

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सो चुका है जग सारा मेरी अंखियां तुम्हारे अंखियन मैं समाई है आंसू झलक रहे हैं क्यों तो चैन मुझे भी ना आई है बरस रही है यहां घनघोर घटाएं नाम पुकार रही तुम्हारी पुरवाई है बजा दो ना कोई गीत मधुर सुनने को हृदय ललाइत है सो चुका है जग सारा पर मेरे आंखों में तुमने अभी प्रेम ज्योत जलाई है सहेज लूं मैं तुम्हें अपने मन में ,इससे ज्यादा का हक तुमसे नहीं मिल पाई है सो चुका है ‌जग सारा और हमने अब भी प्रीत तुमसे ही लगाई है। प्रिया  ❤️✍️

मत पूछो मेरी परिभाषा

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मत पूछो कोई मेरी परिभाषा जो लिखा बस हृदय से लिखा दिमाग की नहीं है इसमें भाषा, हृदय है शब्दों की झंकार और लेखनी देती है मेरे अथाह प्रेम की परिभाषा, क्यों बोते हो इसमें अपने दिमागी भाव? भावनाएं हैं यहां मन के संजोए है जिन्हें हमने कई बार, यदि हृदय दिमाग से चलता तो ना कविताएं होती  ना भावनाएं होती , ना एक खुबसूरत रिश्ता होता ना हम आज यहां पन्नों में होते, बस सच कहें तो हम भी तब निद्रा में होते, नींद भले तब पूरा होता पर जीवन मेरा अधूरा होता, ना हम प्रेम को समझ पाते सच कहें तो परिभाषा मेरा अधूरा होता।। प्रिया❤️✍️

शीतलता भरी संदेश

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झमाझम बारिश की बूंदों में मैं प्यार का पैगाम लिखूं तपती रेत में हो तुम शीतलता भरी संदेश एक, तुम्हारे नाम लिखूं गर्म नैनों के भंवर में, मैं ठंड़क भरी एक शाम बनूं, रोक ना लेना खुद को तुम झिलमिल सितारों संग जब मैं आसमान बनूं, उड़ती बादलों संग मैं तुमसे मिलने आऊंगी सारी तपन को मैं तुमसे दुर ले जाऊंगी, थोड़ा तुम संग हमारे सांस भर लेना फिर मैं, दुर कहीं पुनः हवाओं में खो जाऊंगी।। प्रिया ❤️✍️