मेरी झुकी पलकें

मेरी झुकी पलकें
गतिमान होना चाहती है
सिर्फ तुम तक,
और वहां कुछ पल ठहराव चाहती है
पर तुम्हें बिना बताए
एक आड़ लिए तुम्हें 
जी भर देखना चाहती है,
और फिर शांत हो
बस हवा में विलिन हो जाना चाहती है
ताकि कोई उसे ना रोक सके
सीमाएं बता कर,
सिर्फ संतुष्टि ही तो चाहती हूं 
अपने मन की 
जो सिर्फ वही जा रुकता है
पर मैं उसे आभास नहीं कराना चाहती हूं
कि मेरा मन उसे ढूंढता है और
निगाहें उनके लिए गतिमान होना चाहती है
शांत और एकांत में
दो प्रहर वाले प्रदोष में
सौम्यता को चाहती हूं
पर कोई आश नहीं लगाती हूं
जो टूट कर वियोग रच दे
बस स्वत: बहाव बन जाना चाहती हूं
जो तुम तक पहुंचे
जिसमें "मैं" नहीं सिर्फ
"हम" हो जो सदैव संग तुम्हारे 
गतिमान हो

प्रिया प्रसाद ✍️❤️

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