असंभव
जिंदगी सबकी उलझी पड़ी हैं संभव और असंभव के खेल में दिन सबके यूं बीत रहे , भय है सबके अंतर्मन में संभव है जो भय हैं वो बाहर निर्भय हो उस भय को निर्भय करना असंभव तो नहीं जो मन में विचरण करें सरल सुगम आचरण करें संभव हैं मन के बाहर उसका अस्तित्व न हो उस अस्तित्व को फिर जगाना असंभव तो नहीं हम जिस पर विश्वास करें और बदले में कुछ आस करें संभव है वो बाहर वैसा व्यक्तित्व न हो पुनः वही व्यक्तित्व बनाना असंभव तो नहीं जिसे अपना कहें ऐसे रिश्ते सब छूट गए खुशहाल परिवार वाले सपने अब टूट गए संभव है अब संसार में ऐसा परिवेश न हो सपनो अपनो संग पुनः परिवेश असंभव तो नहीं ✍️✍️✍️ थ्रीमा विनोद साहू