Posts

Showing posts with the label सर्वेन्द्र मिश्र

युवा

Image
इंतजार पर इंतजार करते रहे। रोजगार को हर पल तरसते रहे। मांगा जो हक मेहनत पसीने का। डंडे पर डंडे हम पर बरसती रहे। डिग्री पे डिग्री जुटाते रहे। मां बाप का पैसा लुटाते रहे। बड़ी कोचिंग में पढ़ने हम जाते रहे। भूखे दर दर की ठोकर खाते रहे। बाबू जी आस पे आस धरते रहे। रोजगार को हर पल तरसते रहे। किताबों पर किताबें हम रटते रहे। ज्ञान के समंदर से खुद को भरते रहे। वंशवाद ही सत्ता में छाता रहा। हीरो का बेटा हीरो पसंद आता रहा। गरीबी के दलदल में हम धसते गए। रोजगार को हर पल तरसते रहे। वादों का दौर चलता रहा। मध्यमवर्ग हाथ मलता रह। गरीबों की आशा निराशा हुई। पूंजी पतियों की कमाई बेतहाशा हुई। चुनाव का दौर आता जाता रहा। अपनी जाति का बंदा ही भाता रहा। धर्म की लड़ाई भी चलती रही। जनता आस में ही जलती रही। रोजगार की लड़ाई भी चलती रहेगी। सत्ता की दौर बदलती रहेगी। ज्ञान विज्ञान का दौर भी चलता रहेगा। युवाओं का जोश मचलता रहेगा। दौर पे दौर जाते रहेंगे‌। नेताजी के चाटुकार नेताजी को भाते रहेंगे। युवा रोजगार के इंतजार का पहिया चलाते रहेंगे। डंडे पे डंडा खाते रहेंगे।             ...

जब से आए हो साथ मेरे

Image
जब से आए हो साथ मेरे यूं ही बेवजह मुस्कुराने लगा हूं आदत नहीं है यूं कही झूमने की पर न जाने क्यूं झूम- झूम गाने लगा हूं कितना शांत रहता था  गरजते बरसते बदरा में भी  अब बिन बदरा भी भींग जाने लगा हूं जब से साथ आए हो मेरे  यूं बेवजह मुस्कुराने लगा हूं कभी निहारता नहीं था  यूं ही आसमानों को अब तारों को गिन गिन कर  रातें पूरी बिताने लगा हूं  जब से साथ आए हो मेरे  यूं बेवजह मुस्कुराने लगा हूं शरद ऋतु के पतझड़ सी थी जिंदगी मेरी वसंत की कुमुदिनी सा ललहाने लगा हूं जब से साथ आए हो मेरे  यूं बेवजह मुस्कुराने लगा हूं जब से साथ आए हो मेरे  यूं बेवजह मुस्कुराने लगा हूं यूं तो ना जानता था तूझे न जाने क्यूं तेरी ओर खींचा जाने लगा हूं  डरता हूं तुझे खोने से  पर तेरे नाम से ही  अब यह जीवन बिताने लगा हूं इजहारे इश्क के समय ना जाने कितना डरा था मैं तेरे हां से ही इश्क के लहरों में डूब जाने लगा हूं जब से साथ आए हो मेरे  यूं बेवजह मुस्कुराने लगा हूं