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पतंग

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मेरी पतंग है मेरे ठाकुर जी के हाथ। मेरे ठाकुर जी रहते हैं मेरे साथ साथ ।। मन मर्जी उनकी चलती  मै जोडे़ रहती हाथ। कभी ऊँची गगन उडा़ते कभी धरा पर जात।।  मेरी तो लगती अर्जी और ठाकुर जी की मर्जी सब कुछ उनके हाथ। आशा की जीवन डोरी राघव चरनन सें जोरी  हैं साथ साथ रघुनाथ।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

लक्ष्मी बाई 18 जून बलिदान दिवस

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वीर भूमि बुंदेलखंड है बड़े लड़इया जे सरदार। दुश्मन से कबहु ना डरते लोहा लेबे को तैयार।। आन बान और शान के लाने धरे हथेली रहते प्रान। बैरी आओ चढ़ के जोनै ऊको  दीन निशान मिटाए। थरथर कापे बैरी सगरे जस दुनिया में फैलो आय ।  झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जिनको बल को पावो   ने पार।।  जब गोरे ने झांसी छीनी रानी ने तब दै ललकार। झांसी मोरी है ना दे हो चाहे जान चली है जाए।। जब रणचंडी रण में  उतरी लहे कालिका को अवतार।। दोऊ हात तरवार चला रईं बैरी छाँडि़ भगे मैदान।  तेईस बरस की उमर मा रानी बैठी सरग सिंहासन जाय।।  आशा जस गाबे रानी को  साका  चलो अँगारू जाय। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

अहिल्या बाई

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सनातन धर्म की रक्षक। भोलेनाथ की भक्त अहिल्या बाई शत् शत् नमन।।  किया धर्म हित अथक प्रयास शत् शत् नमन।  जन जन की सेवा मे रत हर शत् शत् नमन।।  न्याय किया अपराधी को दण्ड  दिया  शत् शत् नमन।  है ऋणी राष्ट्र आपका शत् शत् नमन।।  मालवा की माटी काममान बढ़ाया शत् शत् नमन।  आशा की कामना यश कीर्ति गाएँ हम शत् शत् नमन।।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

पना

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पीलो पीलो पना मोरी जिज्जी की  भोतई नोनो बनो।  बगिया सें अमियाँ बीन के लाई गुरसी में भूँजीं दओ गुर औ पुदीना डार की जिज्जी भोतई नोनो  बनो।।  मटका को सीरो पानी डारो कारी मिरच औ जीरा डारो स्वाद लैके देखो एक बार की जिज्जी भोतई नोनो   बनो। जिज्जी संगे अम्मा दद्दा सोई पीके करौ गरमी सेन फिर आर पार की  जिज्जी  भोतई नोनो बनो।। आशा ने बनाई सबखों पिबाई सबने कर दई है पास हर बेर की जिज्जी भोतई नोनो बनो।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर श्रीवास्तव जबलपुर

एकादशी

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नारायण को प्यारी एकादशी।।  भक्तों की हितकारी एकादशी।।  भक्ति भाव बढा़ती एकादशी।  सद्गुरू मिलन कराती एकादशी।  मुक्ति का मार्ग  दिखाती एकादशी।।  आशा चाहो जीवन में प्रेम राम से मिलाती एकादशी।।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

नशे को कहें न

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नशे को कहें न जीवन को कहें हाँ।  दुखदर्द को मिटा के खुशियों को कहें हाँ।।  विषाद को हटा के आनंद को कहें  हाँ।  सरल हो जीवन  सूखमय भविष्य को कहें  हाँ।।  आशा की आस नशे से रहें दूर सब प्रेम को कहें हाँ।  जीवन आनंदित हो हर क्षण सुरभित परोपकार को कहें  हाँ।।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

आँख में नमी सी है

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देख कर हाल मौसम का आँख में नमी सी है।  तपती धरती घटता धीरज देख कर आँख में नमी सी है।।  प्यासे पौधे, पक्षी, राही देख कर  आँख में नमी सी है।  रोज रोज बढ़ते अपराध देख कर आँख में नमी सी है।।  बहकता यौवन सिसकता  बचपन देखकर आँख में नमी सी है।  धधकता दावानल रोती मानवता देखकर आँख़ में नमी सी है।।  लगाते पेड़ बिखरती हरियाली देखकर  आँख में नमी सी है।  आशा है विभोर धरा कितनी  सहनशील देखकर आँख में नमी सी है।।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

जीने की राह

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जीने की राह सबको गले लगाकर प्रेम भाव फैलाकर। जीने की राह बनाएँ।। दंभ द्वेष पाखंड छोड़कर।  जन जन में समभाव फैलाएँ।। जीवन छोटा राह कठिन है।  मिलकर नई रीति चलाएँ।। हिंसा ,झगडा़ करना छोड़कर। जियो और जीने दो की राह सुझाएँ।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

हमदर्द

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जीवन में मिला इतना दर्द । ढूंढते रह गए हमदर्द। दर्द इतना था कि भूल गए । कि कोई इसे बांट भी सकता है।। जार जार रोए कि आंसू सूख गए । ना मिला फिर भी हम दर्द।। पोर पोर दर्द से बेहाल । पानी भी मिलने का नहीं सवाल।। छूटा मायका छूटा मां पिता का हाथ।  जिसे समझा हमदर्द वह निकला बेदर्द।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

युद्ध एवं शाँति

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जब बढा़ अहंकार मानव ने युद्ध रचाया। मानवता पर संकट छाया।। झोंक दिए जन युद्ध कुण्ड में। दावानल दहकाया।। हथियारों के व्यापारी ने । वक्त सुनहरा पाया।। तार तार होती अस्मिता। मृत्यु ने ताण्डव मचाया।। सूनी कोख माँग भी सूनी। समय ये कैसा आया।। अब हथियार छोडो़ कहे नारी । बहुत विनाश कराया।। शाँति की राह निकालो मिलकर। यही स्वधर्म कहाया।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

देवी भजन

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सुमिरन करके नारायन को औ सारद के चरन मनाय। सुमिरों काली कलकत्ते की जो असमय में होय सहाय।। हात जोर बिनती मोरी माता महामारी  करो बंटाढार। जनता सुखी होय गुन गाबे निशदिन तोरे जगदाधार।। रकतबीज सी जा बीमारी ईको करौ समूल बिनास। खप्पर धरो महामाई मोरी तोसें इतनी है अरदास।। अरजी मोरी मरजी तोरी मईया अब तो मोहिं उबार। घर परवार सबई तोरो है रच्छा सबकी कारन हार।। बेगि हरौ अब दुख भवानी तोरो नाम जपौं दिनरात। हात पकर लेव अब तौ मईया कबहुँ न तुमरो छूटै साथ।। आसा की बिनती है माता भारत खाँ अब लेव बचाय। सबके सुख खाँ तुमईं बढा़ने जासों सब रहबें हरषाय।। स्वरचित प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

🌹🙏🏻मैया शीतला🌹🙏🏻

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मैया शीतला को कर लो पूजन ध्यान।  काम तोरे बन जैहें।। रोग सोक बे हरबे बारी। सुख के साधन देबे बारी भर दैहें तोरे भंडार।। सीरो भोग मैया के मन भाबे। सीरो हात मैया सिर पे फेरें किरपा करतीं अपार।। मैया के मंदिर नोने बने हैं। कंचन कलसा शिखर पे सोहें कट जैहें कलेस अपार।। मैया के दोरे भगत जन ठाँडे़। दरस आस लय आये सारे सोरह चढा़बें सिंगार।। आसा की आस लगी मैया तोसें। जीबन नैया तोरे भरोसे कर दईयो बेडा़ पार।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशाश्रीवास्तव जबलपुर

दाना पानी

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पंक्षियों को डाल दो दाना और पानी। गर्मी की ऋतु आई चारों ओर उडे़ धूल।। बूँद -बूँद सहेजो मत जाना भूल। प्यासे जीवों के लिए पानी भरकर रखना।। अपना काम कभी न भूलना।। जल का उपयोग करना। सबके लिए पानी बचाना।। भोलेनाथ की पिण्डी के ऊपर जल भरा कलश बाँधना। जलधार बहे पौधों पर ध्यान रखना। बूँद बूँद  सबके लिए  सहेजना। आने वाली पीढि़यों की धरोहर बचाना।। जल ही जीवन है संरक्षण संवर्धन करना।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

नारी

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ईश्वर की अनुपम सृष्टि न्यारी। विधाता की रचना है नारी।। प्रेम करुणा मर्यादा सहनशीलता रखकर। करती सबकी हर पल रखवारी। सजगता से करती हर काम अपना। नहीं देखती अब है किसकी बारी।। लगी कर्तव्य पथ पर सतत्। उठाया कर में बोझ भारी।। मिले कितना धोखा न छोडे़ वो हँसना। इसी गुण पे रीझी है दुनिया सारी।। समस्त महिलाओं को समर्पित स्वरचित मौलिक प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

बिन्दु

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बिन्दु का सिन्धु से मिलना तय ही तो है। क्यों न प्यासों की प्यास बुझाता चले।। रूखे चेहरों को चाहत है इक बूंद की। क्यों न उनकी वो रौनक बढा़ता चले।। दौड़कर आयेगा सिन्धु उसके निकट। काम अपना अगर वो करता चले।। लौट कर आना है इस धरा पर उसे। क्यों न उसका वो दामन भिगोता चले।। जीवन है बिन्दु सम ईश्वर ही सिन्थु है। नाम उसका निशदिन जपता चले।। आशा की आस है बिन्दु सबको मिले। यात्रा पूरी हो सब सिन्धु तक ही चलें स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

बेटी

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दिल की जमीन पर उगा  पूनम का चाँद बेटी। उमंग,उल्लास, उत्साह जीवन को मधुरिम बनाती बेटी।। पूनम के चाँद सी हर पल प्रगति पथ पर बढ़ती बेटी। तमाम गमों को दफन कर खुशियाँ बिखेरती बेटी।। चाँद सी निर्मल धवल यश बढा़ती बेटी। तेरी मेरी ही नहीं सबकी संबल होती बेटी।। बेटों को भी सही राह पर लाती बेटी। रोशनी की मशाल बनकर जीवन राह दिखलाती बेटी।। आशा के दिल की जमीन पर चाँद सी चमकती बेटी। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

ऋतुराज स्वागत

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आया बसंत लेके उमंग। मचा है रसरंग अब क्या कहिए।। कोकिल की तान भौंरों का गान। फागुन मलंग अब क्या कहिए।। मद भरे नैन मुखरित हैं बैन। चल रही फाग अब क्या कहिए।। दहके टेसू महके महुआ। बज रही चंग अब क्या कहिए।। विकसित प्रसून सुरभित दुकूल । बाजे मृदंग अब क्या कहिए।। ऋतुराज पधारे जग करे पहुनाई । धरा गगन रंगे बसंती रंग अब क्या कहिए।। निखरा है रुप खिल रही धूप।। धरा है प्रसन्न अब क्या कहिए।। गरे डार हार निकरो तो यार। फिर मचे हुड़दंग अब क्या कहिए।। लेखनी थाम कवि करें प्रणाम। वाणी असीस अब क्या कहिए।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

🌹✍🏻बसंत पंचमी✍🏻🙏🏻

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माँ शारदे का जन्मदिन। प्रकृति का आनंदोत्सव।। कण कण में उल्लास। कला और कलाकार।। सृजन वागीश्वरी के चरणों में। गाते होली मनाते वाणी उत्सव।। कलम और तूलिका हँसते उत्साह भर। आई बसंत पंचमी धरा हरषाई।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

नरबदा परकम्मा

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नरबदा परकम्मा रेवा मैया बहें कल कल धार। चलो परकम्मा खों चलिये।। पईसा ने लईयो रूपैया ने लईयो। भाव भक्ति से भर लो मन खों आज।। अमरकंटक सें चलनो परहै। मैया की धारा खों पार ने करने।। खैबो रहबो सब मैया के भरोसे। बे हैं सबकी पालनहार।। तन मन धन सें संकलप कर लेव। बे तो नईया लगा दैहें पार।। आसा कय रई कर लेव भरोसो। जीबन हो जैहे आनंद पार।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित  डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

पतंग

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पतंग उड़ी उड़ी खुशियों की पतंग लेके तिल गुड़ संग। झूमे नाचे सब मिल गाएँ संग संग।।  आई संक्रांति लेके खिचड़ी दही संग।  बड़े ,मुंगौड़े, पुआ,पापड़,खुरमा,कचौरी संग।।  माई नरबदा में बुड़की लगा के करे दीपदान खिचड़ी लड़ुवा संग।  भरके उमंग सब होके मगन चलें संग  संग।।  स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर