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योग का महत्व

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योग एक आध्यात्मिक प्रकिया है जिसके अंतर्गत शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है अर्थात् योग के द्वारा एकाग्रचित्त होकर तन और मन को आत्मा से जोड़ते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योगः कर्मसु कौशलम्‌' अर्थात् योग से कर्मो में कुशलता आती है। हमारे देश का प्राचीन इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है, हमारा देश ऋषि-मुनियों का देश रहा है और उस समय ऋषि-मुनि नित्य योग क्रिया करते थे, कदाचित् इसीलिए वर्तमान समय में बहुत से लोग इसे धर्म से जोड़कर देखते हैं और इसका विरोध करते हैं किन्तु इसे धर्म से जोड़ना सर्वथा गलत ही है और धर्म से जोड़कर इसे न अपनाने के सिर्फ दो ही कारण हो सकते हैं, एक तो अज्ञानता और दूसरा राजनीतिक कारण। यदि इन दो कारणों को छोड़ दिया जाए तो योग का विरोध करने या इसे न अपनाने का कोई औचित्य नहीं।  वर्तमान समय में रोजमर्रा के भागमभाग भरे जीवन, प्रदूषण से युक्त वातावरण, अशुद्ध और अनियमित आहार, अनियमित जीवनशैली के कारण लोग मानसिक तनाव, शारीरक व मानसिक अस्वस्थता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, हर दस में से छः व्यक्ति मोटापे का शिकार दिखाई देता है। ऐसी परेश...

मैं ही साँझ और भोर हूँ..

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अबला नहीं बेचारी नहीं मैं नहीं शक्ति से हीन हूँ, सभी शक्ति के स्रोत हमारे मैं नहीं कभी भी दीन हूँ। खुद के खींचे दायरों के मैं घूम रही चहुँओर हूँ खुद उलझी उन दायरों में मैं अनसुलझी सी डोर हूँ। मैं ही अबला मैं ही सबला मैं ही साँझ और भोर हूँ। पुत्री भगिनी भार्या जननी सबको सीमा में बाँध दिया, दिग्भ्रमित किया खुद ही खुद को ये मान कि मैं कमजोर हूँ। तोड़ दिए यदि दायरे तो फिर शक्ति का सूरज उदय होगा, मिटा निराशा का अँधियारा विजयी आशा की डोर हूँ। मैं ही अबला मैं ही सबला मैं ही साँझ और भोर हूँ। मैं ही रण हूँ मैं ही शान्ती मैं ही सुसंधि की डोर हूँ, वरदान और वरदानी मैं कोमलांगी हूँ कठोर हूँ। बंधन मैं ही आज़ादी मैं मैं ही रिश्तों की डोर हूँ, जब अपने पर आती हूँ तो मैं तूफानों सा शोर हूँ। मैं ही अबला मैं ही सबला मैं ही साँझ और भोर हूँ। रचनाकार- मालती मिश्रा 'मयंती'