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बादल चाचा क्यूं बरसे

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जनवरी माह में दिल्ली की कड़कडाती बारिश की  👩‍👧 बाल कविता👩‍👧 बादल चाचा बादल चाचा क्यूं बरसे इतने गरज़ गरज़ कर क्यूं बरसे कड़ कड़ बिजली बुआ बरसती क्या वो हम से कहने को कुछ है तरसती गड़ गड़ तुम क्या बतलाते घुमड़ घुमड़ रौब जताते कितना चिढ़ चिढ़ कर हमें डराते सर्दी में भी हर घण्टे पानी टपकाते  ठिठुरन इतनी ना बढ़ाओ थोड़ा हम पर दया दिखाओ जब सावन आये तब आजाना स्वागत करें तो मत इतराना अभी तो तुम घर जाओ मुझको सर्दी लगती है ओर पानी न बरसाओ।। मम्मा की लेखनी ज़िया की जुबानी👩‍👧 ( ज़िया )भारती प्रवीण...✍️💕

पर्यावरण और प्रदूषण

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पर्यावरण और प्रदूषण, जैसे रावण और विभीषण, कटते वृक्ष घटता है जीवन, दुखी है देखकर सब यह मन, संकल्प लें या कर ले वृक्षारोपण तपती तपिश, बढ़ता जा रहा है तर्पण, न जून 5 ही न हो विचाराधीन पर्यावरण, संकल्प प्रति व्यक्ति हो आत्मसमर्पण,  प्रत्येक वर्ष एक वृक्ष सृष्टि को अर्पण,  जन्मदिवस के कटे ना कटे, प्रत्येक आयोजन वृक्ष अवश्य बटे, होने को धरा में बीजारोपण, मैं भी लेती हूं इस बात का प्रण, आप सभी से भी करती हूं निवेदन,   है नित दिवस पर्यावरण,  ले संकल्प कर दे बीजारोपण ना होगा कठिन शुद्ध ही होगा अपना मन  शुद्ध भी हो सकेगा पर्यावरण।। -भारती प्रवीण..✍️💕

मौत हो जाती है

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चलते चलते जो रुके राह में ज़िंदगी थक अगर जाती है तो फिर से चलिये ज़नाब वरना हौंसलों की मौत हो जाती है।। निभा रहे हो ज़बरन, ऊबते हुये रिश्तों से तो मुलाक़ातें भी दूरी पर असर दिखाती हैं फिर... दिल बड़ा कीजिये ज़नाब वरना रिश्तों की मौत हो जाती हैं।। पैमाने लाख बनाएं रखों तरक़्क़ी में हक़ीक़त तो ईमानदारी बताती हैं, जो दबा डाला हक़ किसी का ऊंचाइयों को छूने के लिये तो...रुकिये ज़नाब... ज़िंदगी हैं, कभी तो आईना दिखाती हैं।। जब मानवता हमारे भीतर मरती जाती है फिर द्रौपदी की लाज़ भरी सभा में छीनी जाती है अब तो हर दिन सौ सौ निर्भया कुचल दी जाती है। मत ललकारो उनके धीरज को फिर वही सुदर्शन सँग माधव को बुलाती है अंततः क्रूर दुःशाषन की बलि  चढ़ा दी जाती है जब मानवता की मौत हो जाती हे तब बली चढ़ा दी जाती है

शाकाहारी बनो…!

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गर्व था भारत-भूमि को कि महावीर की माता हूँ।। राम-कृष्ण और नानक जैसे वीरो की यशगाथा हूँ॥ कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।। पोरस जैसे शूर-वीर को नमन ‘सिकंदर’ करते थे॥ चौदह वर्षों तक वन में जिसका धाम था।। मन-मन्दिर में बसने वाला शाकाहारी राम था।। चाहते तो खा सकते थे वो मांस पशु के ढेरो में।। लेकिन उनको प्यार मिला ‘ शबरी’ के झूठे बेरो में॥ चक्र सुदर्शन धारी थे गोवर्धन पर भारी थे॥ मुरली से वश करने वाले गिरधर’ शाकाहारी थे॥ पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम चोटी पर फहराया था।। निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥ सपने जिसने देखे थे मानवता के विस्तार के।। नानक जैसे महा-संत थे वाचक शाकाहार के॥ उठो जरा तुम पढ़ कर देखो गौरवमयी इतिहास को।। आदम से गाँधी तक फैले इस नीले आकाश को॥ दया की आँखे खोल देख लो पशु के करुण क्रंदन को।। इंसानों का जिस्म बना है शाकाहारी भोजन को॥ अंग लाश के खा जाए क्या फ़िर भी वो इंसान है? पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या कोई कब्रिस्तान है? आँखे कितना रोती हैं जब उंगली अपनी जलती है।। सोचो उस तड़पन की हद जब जिस्म पे आरी चलती है॥ बेबसता तुम पशु की देखो बचने के आ...

पर्यावरण और प्रदूषण

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विश्व पर्यावरण दिवस पर समर्पित एक कविता पर्यावरण और प्रदूषण, जैसे रावण और विभीषण, कटते वृक्ष घटता है जीवन, दुखी है देखकर सब यह मन, संकल्प लें या कर ले वृक्षारोपण तपती तपिश, बढ़ता जा रहा है तर्पण, न जून 5 ही न हो विचाराधीन पर्यावरण, संकल्प प्रति व्यक्ति हो आत्मसमर्पण,  प्रत्येक वर्ष एक वृक्ष सृष्टि को अर्पण,  जन्मदिवस के कटे ना कटे, प्रत्येक आयोजन वृक्ष अवश्य बटे, होने को धरा में बीजारोपण, मैं भी लेती हूं इस बात का प्रण, आप सभी से भी करती हूं निवेदन,  आ गया है विश्व दिवस पर्यावरण,  ले संकल्प कर दे बीजारोपण ना होगा कठिन शुद्ध ही होगा अपना मन  शुद्ध भी हो सकेगा पर्यावरण।। भारती प्रवीण..✍️💕