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Showing posts with the label रंजना सोनी

दुश्मनी भाग-५ 'प्यार का इजहार'

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      स्पीच की चोरी करने के बाद मोहित आराधना के सामने जाने से डरने लगा था, साथ ही उसे यह अहसास हो गया था कि वह उससे कई ज्यादा होशियार और समझदार है, शायद उसका दिल आराधना की तरफ मुड़ चुका था, लेकिन अपनी झूठी शान और अकड़ उसे आराधना से माफी माँगने से रोक देती है......         कुछ दिन बाद कॉलेज में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता रखी जाती है, आराधना इस प्रतियोगिता को लेकर बहुत उत्साहित है, दूसरी तरफ मोहित को इसमें बिल्कुल भी रुचि नहीं होती, आराधना और उसके साथी कॉलेज के गार्डन में बैठे इसकी तैयारी कर रहे थे तभी मोहित और उसके कुछ दोस्त वहां आ गए.....!      आराधना को खुश देखकर मोहित बेवजह ही खुश हो जाता था लेकिन दिखावे के लिए वह उसको तंग करने का मौका ढूंढता रहता था, तभी उसने एक कागज पर लूज़र्स लिखकर आराधना और उसके साथियों के बीच फैंक दिया लेकिन आराधना से पहले बीच में ही सपना ने वह कागज उठा लिया और उसे खोल कर देखा तो वह अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाई और उसने सभी के सामने मोहित की कॉलर पकड़ ली।  दोनों के बीच बातचीत- सपना:- तुम अपने आप ...

दीपदंड रहे अखंड

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दीपदंड रहे अखंड, प्रज्वलित सदा अग्नि रहे...! कर्मशील रहे मनुज, धवलित सदा मति रहे...! बढ़ते रहे निज ध्येय पथ, मुखरित सदा दृष्टि रहे...! चढ़ते रहे लक्ष्यित शिखर पर, अचंभित सदा सृष्टि रहे...! रंजना सोनी चूरू, राजस्थान स्वरचित एवं मौलिक

दुश्मनी भाग -४(स्पीच की चोरी)

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          विद्यालय में कलेक्टर का प्रवेश होता है, सभी अपनी कक्षाओं से झांककर उनकी एक झलक देखने का प्रयत्न कर रहे है, प्रिंसिपल सर, विद्यालय के ट्रस्टी श्री विद्यासागर जी अपने पोते( मोहित) के साथ कलेक्टर मैडम की तरफ बढ़ रहे है| आराधना और रीतु मैडम भी उनके स्वागत के लिए पीछे चल रहे है|) सफेद साड़ी में सादगी भरे अंदाज में  कलेक्टर सुनीता जी का आगमन हो रहा है, 26-27 कि उम्र में इस पद पर पहुँच जाना उनके प्रतिभावान व्यक्तित्व कि निशानी थी| सभी उनको देखकर बहुत खुश होते है, दूसरी तरफ मोहित  किसी भी तरह आराधना की स्पीच को लेने के लिए अवसर की तलाश में है, औपचारिकताओं के बीच रीतु मैडम आराधना को तिलक करने का इशारा करती है जैसे ही आराधना आगे बढ़ती है, उसका पाँव फिसल जाता है और वह गिर जाती हैं, पास खड़े मोहित को तो जैसे इसी अवसर का इंतजार रहता है वह झट से उसे उठाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा देता है| यह सब आराधना समझ नहीं पाती है वह उसका हाथ थामकर खड़ी हो जाती है, उसे खबर ही नहीं रहती की कब उसके हाथ से स्पीच वाला कागज नीचे गिर जाता है, मोहित उसी मौके का फ...

मीराबाई चानू

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पर्वत को भी राख बना दे, ऐसी चिनगारी को आना था! स्वदेश की जग में शान बढ़ाए, ऐसी नारी को जग ने जाना था!! सदियों से जैसे नारी, घर का भार उठाती है! आज देश की बेटी बनकर, देश के गौरव का भार उठाना था!! मीराबाई चानू को आज, आम जनता ने पहचाना था! अनेक बेटियों ने उनको, अपना आदर्श भी माना था!! लाचारी में बीता बचपन, जवानी का न ठिकाना था! घर में न थी बैलगाड़ी, वन से लकड़ी का गट्ठर लाना था!! उसकी शारिरीक क्षमता का, गाँव में हर कोई दीवाना था! बड़े भाई ने हो अचंभित, उसे शक्ति का स्वरूप माना था!! तीरंदाजी का स्वप्न छोड़कर, कुछ नया कर दिखाना था! छुपी हुई प्रतिभा को समझा, अब भारोत्तोलन में जाना था!! सर्दी-गर्मी धूप-छाँव को, जिसने ना बिलकुल जाना था! लक्ष्य को करना है हासिल, उसने ये मन मैं ठाना था!! कुंजरानी से भेंट हुई जब, आदर्श उन्हीं को माना था! उनके बनाए रिकॉर्ड को तोड़, आशीष उन्हीं का जाना था!! भारत की बेटी बनकर अब, विश्व में नाम कमाना था! हम दुनियां में सर्वश्रेष्ठ है, यह लोहा मनवाना था!! पदक पर पदक जीते उसने, नतमस्तक हुआ जमाना था! जगत में भारत की बेटी का, अद्भुत वह कारनामा था!! भारोत्तोलन में...

'दुश्मनी'भाग:-३ (कलेक्टर का स्वागत)

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( उस गँवार के टॉपर होने की बात से हर कोई हैरानी से आराधना को देख रहा है, सपना को भी विश्वास नहीं होता है की जो लड़की इतनी डरी सहमी सी रहती है, लड़कों के सामने चुप रह जाती है वह इतनी प्रतिभावान है, अब उसे भी अपनी नई - नई दोस्ती पर गर्व महसूस हो रहा था|) सपना- यार, तुने मुझे बताया ही नहीं तुम ही वो आराधना हो,( मोहित को देखते हुए) नहीं तो आजकल कुछ लोग कुछ नहीं होने पर भी हवा में उड़ने लगते है| आज से मैं तुम्हारे साथ ही रहुँगी..... मोहित- हाँ, चिपकु बन्दरिया जो हो, शहद के पास मक्खी भिनभिनाती रहती है ना..... किशोर- अच्छा तो अब आराधना गँवार से शहद हो गई है क्या....?  मोहित- नहीं तो मैंने ऐसा तो नहीं कहा, वो देख उस तरफ चलते है रीतु मैडम आ रही है उनसे पूछते है कल के प्रोग्राम के बारे में|         (मोहित किशोर का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले जाता है, उधर आराधना अभी भी खुद को असहज महसूस कर रही है, वो मन ही मन सोचती है वह लड़का था कौन, और वह हमसे इतनी नफरत से बात क्यों करता है, हमने तो उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा|) (मोहित और किशोर रीतु मैडम के पास जाते है,और उनसे कल होन...

मेरी कलम से

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कुछ पल फुरसत के निकाल लेती हूँ, अपनी भावनाओं को शब्दों में उतार देती हूँ। फिर उनमें ही कहीं खो जाती हूँ, अपनी कविताओं को नया विस्तार देती हूँ। गृहिणी हूँ, ये भूल जाती हूँ, अब घर के साथ रचनाओं को भी सँवार देती हूँ। माँ हूँ, ये भी भूल जाती हूँ, अब बच्चों के साथ अपनी कविताओं को भी प्यार देती हूँ। मानती हूँ घरवालों को जरूरत है मेरी,पर अब खुद की जरूरतें भी जान लेती हूँ। कुछ पाठक करते है इंतजार मेरी रचनाओं का, इसका भी ख्याल रख लेती हूँ। कभी-कभी आईने में देखकर, कुछ पंक्तियां गुनगुना लेती हूँ। तो कभी-कभी सपनों के मंच पर, कुछ कविताएं बुदबुदा लेती हूँ। कभी-कभी पंखों में अपनी उड़ान भर देती हूँ, कभी खुद से खुद की पहचान कर लेती हूँ। विख्यात लेखिका बनने का स्वपन ये मेरा, मैं कभी-कभी खुली आँखों से देख लेती हूँ। रंजना सोनी (स्वरचित एवं मौलिक)

दुश्मनी भाग-२

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      (आराधना और मोहित की नजर आपस में मिलती है, मोहित उसे एकटक देख रहा था ओर आराधना के मन में एक अनजाना सा डर बैठता जा रहा था|) (प्रार्थना सभा समाप्त होती है सभी विद्यार्थी अपनी कक्षाओं में जाते है, तभी एक धड़ाम की आवाज से पूरा हॉल गूँज उठता है|) मोहित- अबे यार, ये लड़की है या कोई मोम का पुतला है? कभी भी कहीं भी टकरा जाती हो, आँखों पर पट्टी बांधकर आई हो क्या?  किशोर- छोड़ ना यार आज इसका पहला दिन होगा तो थोड़ी नर्वस होगी, तू क्यों गुस्सा हो रहा है, टेबल ही तो गिरी है, तेरा पैर बच गया वो ही काफी है|  मोहित- आज का दिन ही खराब है यार, गँवार की सूरत जो देख ली, चल यार अपनी क्लास में चलते हैं, देखते है कौन-कौन नई लड़कियाँ आई है क्लास में| किशोर- ( चलते हुए) कहीं ये लड़की भी आ गई तो अपनी क्लास में?  मोहित-  आ भी गई तो क्या हो जाएगा यार, इस गँवार लड़की को अच्छा सबक सिखाउँगा मैं| ( मोहित और किशोर का कक्षा में प्रवेश) किशोर- अबे यार, देख वही लड़की है न ये! और तेरी ही जगह पर बैठी है, चल कोई नहीं हम दूसरी जगह बैठ जाते है| मोहित- मेरी जगह मेरे सिवा और कोई नह...

दुश्मनी भाग १

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  यह धारावाहिक है आराधना के साधारण से जीवन में असंख्य उतार-चढ़ाव की, क्या आराधना इन मुसीबतों का सामना कर पायेगी! कहीं किसी से दुश्मनी मोल ले लेना आराधना के लिए जीवन भर के लिए पछतावा तो नहीं रह जाऐगा, जानने के लिए धारावाहिक से जुड़े रहे।                          *****************धन्यवाद**************        आराधना बहुत ही  सादगी और शालीनता से जीवन जीने वाली  मध्यम वर्गीय खानदान की इकलौती बेटी थी।  उसने अपने जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव देखे थे,  उसके पिता एक सरकारी विद्यालय में चपरासी की नौकरी करते थे, आराधना भी उसी विद्यालय में सातवीं में पढ़ती थी। उसके पिता को झाड़ू पोंछा करते हुए देखकर उसकी कई सहेलियां उसका मजाक उड़ाती,  एक चपरासी की बेटी होने के कारण आराधना कई बार अपने पिता  से गुस्सा हो जाया  करती थी। आराधना पढ़ने लिखने में बहुत होशियार थी,  वह अपने पिता को ऐसी नौकरी करते देखना कभी पसंद नहीं करती थी, वह जल्दी से बड़ी हो जाना चाहती थी और अपने...

दुल्हन की मौत

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      अभी पूरा विश्व कोरोना महामारी के चपेट में आया हुआ है, ऐसे में सरकार अपनी तरफ से हर एक कोशिश कर इस देश को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रही है, वहीं समाज के अधिकांश लोग सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की अनदेखी कर स्वयं के साथ अन्य लोगों को भी संकट में डाल रहे है |आज की कहानी इसी विषय पर है|          लाडली बिटिया के ब्याह के लिए उसके पिता न जाने कितने सालों से पाई पाई जोड़कर रखे थे, बिटिया की शादी में कोई कमी न रह जाऐ इसलिए खुद ही सारी तैयारियां करने में लगे थे| आज लड़के वालों की तरफ से बारात आने वाली थी, लड़के वालों की ही जिद्द थी कि शादी पहले से तय तारिख पर ही होनी चाहिए | लॉकडाउन भी खुल गया है तो अब धूमधाम से करेंगे अपने बेटे की शादी, सच ही तो है अब तक लोगों में सरकार का डर ही था जो उन्हें घरों में बंद रखे था कोरोना के कारण उनको कुछ नहीं होगा क्योंकि उनके हिसाब से शहर में अभी एक भी पॉजिटिव केस नहीं मिला था | अब शादी की तारिख पहले से तय थी, लड़की के पिता सरकारी अधिकारी होने के बाद भी लड़के वालों के सामने बेबस हो गये थे,सामने से रिश्ता तोड़...

ये हसीन वादियां

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रीतु और भावेश की पहली सालगिरह थी, पर उस वक्त रीतु अपने सास-ससुर के साथ गाँव में थी और उसका पति कोई काम से अहमदाबाद में थे.... दोनों के लिए पहली  सालगिरह थी तो वो उसे मिलकर यादगार बनाना चाहते थे लेकिन रीतु अपने सास-ससुर से यह बात कह ही नहीं सकी क्योंकि उसे पता था उसकी इस बात पर घर में बड़ा हंगामा खड़ा हो सकता था.. उस वक्त घर में सास अपने पीहर जाने की तैयारी कर रही थी क्योंकि उनके भतीजे ने जोधपुर में नया मकान लिया था और वह उनके घर प्रवेश में जाने के लिऐ सामान जमा कर रही थी।       रीतु आते-जाते उनको देखकर सोचती रही कि वो कैसे अपनी सास को बताए की कल उनकी पहली सालगिरह है और वह दोनों मिलकर उसे यादगार बनाना चाहते है.... तभी उसके पति भावेश का फोन आता है और वह अपनी माताजी से कहता है की उसके पास भी मामाजी का फोन आया था जोधपुर आने के लिए तो उसको आना पड़ेगा, आप रीतु को भी अपने साथ जोधपुर लेकर आ जाना.....इतने में सास बोल पड़ी-" इतने जनों का क्या काम है वहाँ..! मैं आ जाऊँगी सुबह जल्दी रवाना होकर, वह तो उठ ही नहीं सकती इतनी जल्दी मेरे से नहीं होगा उसको साथ में लेकर आना... औ...

प्राणायाम

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आंखें मूंद सुखासन में बैठें आओ कपालभाति हम सीखें नाक से सांस लो गहरी लेकिन  तनिक धीरे आराम से, फिर छोड़ो सांस को तुम  बलपूर्वक दमदार से। सर्दी और जुखाम को ये, जल्दी दूर भगायेगा, कफ भी बिलकुल दूर हुआ,  तुमको एहसास कराएगा।  अब है अनुलोम-विलोम की बारी  करनी है थोड़ी तैयारी,  बाएं हाथ की ज्ञान-मुद्रा हो दायां हो दाएं नथुने पर भारी बाएं नाक से श्वास भरो तुम दाएं नाक से छोड़ दो, अब दाएं नाक से श्वास भरो फिर बाएं नाक से छोड़ दो । सरल है प्राणायाम सभी क्यों किंचित आभास नहीं! प्राणवायु को शुद्ध ये रखता करते क्यों प्रयास नहीं? भ्रामरी प्राणायाम में दोनों हाथ का उपयोग हो, भ्रमर के गुंजन से,  दूर तनाव और क्रोध हो । अंगुष्ठ रखे हम कानों पर और उंगलियां आँख पर हो, गहरी सी हम सांस लेकर छोड़े तब ॐ उच्चार हो। प्राणायाम से स्वच्छ रहे अपने अन्तर की काया, श्वास को ये प्रबल बनाता समझ में हम सबको आया। नित्य उठ ध्यान लगाकर करेंगे हम सब प्राणायाम, दिनचर्या का हिस्सा बनाकर अपनाए हम प्राणायाम। रंजना सोनी चूरू,राजस्थान

मेरे प्यारे-प्यारे पापा

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कभी पति में देखती हूँ,  मेरी माँ के सुहाग को तो कभी भाई में देखती हूँ,  उस संघर्षशील इंसान को। बैठकर बगियां में अपनी,  कभी-कभी रोते है पापा, अपनी जवानी के दिनों में अक्सर,  जब खोए हुए होते है पापा। अब खुद में ही कहीं खो रहे है,  शायद अब कमाते नहीं है पापा, अब दिन में ही सो रहे है,  इसलिए किसी को भाते नहीं है पापा। संघर्षों में तपकर खुद को,  सोना जिसने बनाया पापा आज उसी सोने को हमने,  फिर से राख बनाया पापा माता से तो खूब जुड़े हम,  तेरा हाल ना जाना पापा कांधो पर तो खूब चढ़ाया,  रह-रह के खयाल आता है पापा। मन की अपार वेदनाओं को,  दिल में ही समाते हो पापा झूठी मुस्कान दिखाने की ताकत,  कहो कहाँ से लाते हो पापा। बुढ़ापा झलकता है आँखो से जिनकी,  नातिन को देख खिल जाते है पापा रोज शाम को ढूँढ के लाठी,  पोते को ले निकल जाते है पापा पापा पर कविता लखती हूँ,  तो आँसू रोक नहीं पाती उन्हीं की तरह जज्बात अपने,  किसी से बोल नहीं पाती खुशहाल हमारा बचपन इतना, तुम से ही तो था ना पापा अब ये सारा जीवन सुखमय, तुम से ही तो ...

स्वच्छ रहें परिवेश हमारा

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भारत माँ का आँगन हमको, विश्व में सबसे प्यारा है। 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा' जन-जन को यह नारा है-2 आओ शपथ ये खाएं मिलकर, देश को स्वच्छ बनाना है। कूड़ा-करकट कहीं न फैंके, सुंदर घर ये हमारा है-2 आज नहीं तो कल दिखेगा-2 जगमग ये नजारा है। 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा' जन-जन को यह नारा है-2 भारत माँ का.…........ सड़कों पर न डालें कचरा, आज ये भाव जगाना है। "मैं" नहीं तो कौन करेगा, यह विश्वास जगाना है-2 डाले कचरा हाथ पकड़ लो-2 मेरा वतन निराला है| 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा' जन-जन को यह नारा है-2 भारत माँ का............ जग में अपनी इस धरा को, सुंदर बाग बनाना है। हरा-भरा हो जग ये सारा, इक पौधा सबको लगाना है-2 भारत की पावन माटी को-2 फूलों सा महकाना है। 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा' जन-जन को यह नारा है-2 भारत माँ का….......... 'स्वच्छ रहे परिवेश हमारा....... रंजना सोनी

जाना भी आसान नहीं

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किसी को चाहना और जिन्दगी भर.. बस चाहते रहना,          हर किसी के बस की बात नहीं होती| जो कदर ना कर सके.. उनसे मिलने को बार बार,               दिल की फरियाद नहीं होती| मन करता है रिश्ता ही तोड़ ले.. उनसे जाकर अभी,            पर मैं ही हूँ जो उससे खफा नहीं होती| मान लिया परेशानियों से घिरे हो तुम.. पर देखो कभी,             मैं ही हूँ जो तुमसे बेवफा नहीं होती| वक्त खराब है तो कट जाएगा.. ये मुसीबत की घड़ी,                 हर पल हर रोज नहीं होती| मत जाओ यूँ छोड़कर मुझको अकेले.. अकेले रहने से,                जिन्दगी कभी आसान नहीं होती| प्यार गहरा है तो याद भी गहरी होगी.. जागती रातों की,                सुना है कभी सुबह नहीं होती| जख्म तो भर जाएंगे समय के मरहम से.. पर दु:खती               रगों की कोई दवा नहीं हो...

अंधा कानून

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यह कविता उस दलित किसान परिवार के लिए है, जिनको पुलिस द्वारा अमानवीय यातनाएं झेलनी पड़ी और जनता हमेशा की तरह मूकदर्शक  बनी रही|  सत्ता की मद में अंधा कानून......     शर्मसार है फिर से भारत,                             छुपे हुए गद्दारों से| मानवता भी चीखी है,                      खेत ओर खलिहानों से|| क्यों दलित का दर्द कभी,                      कानून नहीं समझता है|| क्यों अमीर की चाल कभी,                      कानून नहीं समझता है|| कैसे समझेगा कानून दलित को,                      वह तो भोला-भाला है| कैसे समझेगा कानून  अमीर को,                      वह तो उसी का पाला है|| शर्म बेच दी,दया बेच दी|     ...

बेटी है तू..

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       छोड़ न पीहर की परेशानी!!              तुझे क्या मतलब है,                      कहाँ, कुछ भी हो रहा!!    अब तो तू चिन्ता कर,           तेरे शौहर की!!                उसके घर की,                        ओर उसके बच्चों की!! यह घर अब नहीं है तेरा,         ना ही इसपर हक है तेरा!!              पराई अमानत है अब तो तू,                   अब ससुराल ही है घर तेरा!! मत सोच की माँ तेरी बीमार है,      बस ख्याल सास का रख लो तुम!!            मत सोच कि बाप तेरा लाचार है,                  बस मान ससुर का रख लो तुम!! अब मान भी ले,        यह घर नहीं...

सारी उम्र गुजारी हमने

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'सारी उम्र गुजारी हमने'  कुछ अपनों को मनाने में! ('कुछ उम्र गुजारी हमने' सब गैरों को भुलाने में)-२ (हालातों से होकर बेबस, कुछ टूटे हुऐ मकानों में)-२ 'सारी उम्र गुजारी हमने'  अपना महल बनाने में| 'सारी उम्र गुजारी हमने'  कुछ अपनों को मनाने में... (बस्ते के बोझ से लेकर,  कॉलेज की सीरीज़ों में)-२ 'सारी उम्र गुजारी हमने'  अपना ज्ञान बढ़ाने में| 'सारी उम्र गुजारी हमने' कुछ अपनों को मनाने में... (मोहल्ले की गलियों से लेकर, मंदिर, तीज के मेलों में)-२ 'सारी उम्र गुजारी हमने'  सच्चा आशिक बनाने में| 'सारी उम्र गुजारी हमने' कुछ अपनों को मनाने में... (माता के खिलाने से लेकर,  खुद हाथों से खाने में)-२ 'सारी उम्र गुजारी हमने'  अब बच्चों को खिलाने में| 'सारी उम्र गुजारी हमने'  कुछ अपनों को मनाने में... (उड़ते हुए सपनों को लेकर,  फिर हाथों से दफनाने में)-२ 'सारी उम्र गुजारी हमने'  फिर सपने सजाने में| 'सारी उम्र गुजारी हमने'  कुछ अपनों को मनाने में... (बाबुल के अँगना से लेकर,  पति के आशियाने में)-२ 'सारी ...